श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३०० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ९ सितम्बर, १८८३ |
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तरह है बताऊँ – जैसे पानी का...। ये सब बातें साधना करने पर समझ में आती हैं।
“रूप पर विश्वास करना। जब ब्रह्मज्ञान होता है, अभेदता तब होती है। ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं। जैसे अग्नि और उसकी दाहिका शक्ति। अग्नि को सोचने पर साथ ही उसकी दाहिका शक्ति को भी सोचना पड़ता है; और दाहिका शक्ति को सोचने पर अग्नि को भी सोचना पड़ता है; जैसे दूध और दूध की धवलता, जल और उसकी हिमशक्ति।
“परन्तु ब्रह्मज्ञान के बाद भी अवस्था है। ज्ञान के बाद विज्ञान है। जिसे ज्ञान है, जिसे बोध हो गया, उसमें अज्ञान भी है। शत पुत्रों के शोक से वशिष्ठ को भी रोना पड़ा था। लक्ष्मण के पूछने पर राम ने कहा, भाई, ज्ञान और अज्ञान के पार जाओ; जिसे ज्ञान है, उसे अज्ञान भी है। पैर में अगर काँटा चुभ जाय, तो एक दूसरा काँटा लेकर वह निकाल दिया जाता है, फिर उसके साथ दूसरा काँटा भी फेंक दिया जाता है।”
मणि – क्या अज्ञान और ज्ञान दोनो फेंक दिये जाते हैं?
श्रीरामकृष्ण – हाँ, इसीलिए विज्ञान की आवश्यकता है।
“देखो न, जिसे उजाले का ज्ञान है, उसे अँधेरे का भी है; जिसे सुख का बोध है, उसे दुःख का भी है; जिसे पुण्य का विचार है, उसे पाप का भी है; जिसे भले का स्मरण है, उसे बुरे का भी है; जिसे शुचिता का अनुभव है, उसे अशुचिता का भी है; जिसे ‘अहं’ का ध्यान है, उसे ‘तुम’ का भी है!”
“विज्ञान – अर्थात् उन्हें विशेष रूप से जानना। लकड़ी में आग है; इस बोध – इस विश्वास – का नाम है ज्ञान, और उस आग से खाना पकाना, खाना खाकर हृष्ट-पुष्ट होना, इसका नाम है विज्ञान। ईश्वर हैं, हृदय में यह बोध होना इसका नाम हैं ज्ञान और उनके साथ वार्तालाप, उन्हें लेकर आनन्द करना – चाहे जिस भाव से हो, दास्य या सख्य या वात्सल्य या मधुर से – इसका नाम है विज्ञान। जीव और यह प्रपंच वे ही हुए हैं, इसके दर्शन करने का नाम है विज्ञान। एक विशेष मत के अनुसार कहा जाता है कि दर्शन हो नहीं सकते, कौन किसके दर्शन करे? वह तो अपने ही स्वरूप के दर्शन करता है। कालेपानी में जहाज जब चला जाता है, तब लौट नहीं सकता, लौटकर खबर नहीं दे सकता।”
मणि – जैसा आप कहते हैं, मानूमेण्ट के ऊपर चढ़ जाने पर फिर नीचे की खबर नहीं रहती कि गाड़ी, घोड़े, मेम, साहब, घर-द्वार, दूकाने, आफिस कहाँ है।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, आजकल कालीमन्दिर मैं नहीं जाया करता, कुछ अपराध तो न होगा? नरेन्द्र कहता था, ये अब भी कालीमन्दिर जाया करते हैं?
मणि – जी, आपकी नयी नयी अवस्थाएँ हुआ करती हैं। आपका भला अपराध क्या है!
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, हृदय के लिए उन लोगों ने सेन से कहा था, ‘हृदय बहुत