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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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परिच्छेद ५४

दक्षिणेश्वर में राम आदि भक्तों के साथ

श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ बैठे हैं। राखाल, मास्टर, राम, हाजरा आदि भक्तगण उपस्थित हैं। हाजरा महाशय बाहर के बरामदे में बैठे हैं। आज रविवार, २३ सितम्बर १८८३, भाद्रपदी कृष्ण सप्तमी है।

नित्यगोपाल, तारक आदि भक्तगण राम के घर पर रहते हैं। उन्होंने उन्हें आदर-सत्कार के साथ रखा है।

राखाल बीच बीच में अधर सेन के मकान पर जाया करते हैं। नित्यगोपाल सदा ही भाव में विभोर रहते हैं। तारक की भी स्थिति अन्तर्मुखी है। आजकल वे लोगों से विशेष वार्तालाप नहीं करते।

श्रीरामकृष्ण अब नरेन्द्र की बात कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (एक भक्त के प्रति) – आजकल नरेन्द्र तुम्हें भी 'लाईक' (like - पसन्द) नहीं करता। (मास्टर के प्रति) अधर के घर पर नरेन्द्र नहीं आया?

"एक साथ ही नरेन्द्र में कितने गुण हैं। गाने-बजाने में, लिखने-पढ़ने में, सभी में प्रवीण है। उस दिन यहाँ से कप्तान की गाड़ी से जा रहा था। गाड़ी में कप्तान भी बैठे थे। उन्होंने उससे अपने पास बैठने के लिए कितना कहा। पर नरेन्द्र अलग ही जाकर बैठा; कप्तान की ओर ताककर देखा तक नहीं।

"केवल पाण्डित्य से क्या होगा? साधन-भजन चाहिए, इन्देश का गौरी पण्डित विद्वान् था और साधक भी। शक्ति-साधक। माँ के भाव में कभी कभी पागल हो जाता था। बीच बीच में कह उठता था, 'हा रे रे रे, निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम्!' उस समय सब पण्डित निष्प्रभ हो जाते थे। मैं भी भावाविष्ट हो जाता था। मेरा भोजन देखकर पूछता, 'तुमने भैरवी लेकर साधना की है?'

"एक कर्ताभजा सम्प्रदाय के पण्डित ने निराकार की व्याख्या करते हुए कहा, 'निराकार अर्थात् नीर का आकार!' यह व्याख्या सुनकर गौरी बहुत क्रुद्ध हुआ।

"पहले-पहल कट्टर शाक्त था; तुलसी का पत्ता दो लकड़ियों के सहारे उठाता था – छूता न था! (सभी हँसे।) इसके बाद घर गया। घर से लौट आने के पश्चात् फिर वैसा नहीं करता था।