श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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| २३ सितम्बर, १८८३ | परिच्छेद ५४ | ३११ |
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“मैंने कालीमन्दिर के सामने एक तुलसी का पौधा लगाया था। पर कुछ समय में वह सूख गया। कहते हैं, जहाँ पर बकरों की बलि होती है, वहाँ पर तुलसी नहीं रहती।”
“गौरी सभी बातों की सुन्दर व्याख्या करता था। रावण के दस सिरों के बारे में कहता था, दस इन्द्रियाँ! तमोगुण को कुम्भकर्ण, रजोगुण को रावण और सतोगुण को विभीषण कहता था। इसीलिए विभीषण ने राम को प्राप्त किया था।”
श्रीरामकृष्ण मध्याह्न के भोजन के बाद थोड़ी देर विश्राम कर रहे हैं। कलकत्ते से राम, तारक (शिवानन्द) आदि भक्तगण आकर उपस्थित हुए। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर वे जमीन पर बैठ गए। मास्टर भी जमीन पर बैठे हैं। राम कह रहे हैं, “हम लोग मृदंग बजाना सीख रहे हैं।”
श्रीरामकृष्ण (राम के प्रति) – नित्यगोपाल ने भी कुछ सीखा है?
राम – जी नहीं, वह कुछ ऐसा ही मामूली बजा सकता है।
श्रीरामकृष्ण – और तारक?
राम – वह अच्छा बजा सकेगा।
श्रीरामकृष्ण – तो फिर वह मुँह उतना नीचा किए न रहेगा। किसी दूसरी ओर मन अधिक लगा देने पर फिर ईश्वर पर उतना नहीं रह जाता।
राम – मैं समझता हूँ, मैं जो सीख रहा हूँ, वह केवल संकीर्तन के लिए है।
श्रीरामकृष्ण (मास्टर के प्रति) – सुना है तुमने गाना सीखा है?
मास्टर (हँसकर) – जी नहीं, यों ही ऊँ आँ करता हूँ।
श्रीरामकृष्ण – तुम वह गाना जानते हो? जानते हो? जानते हो तो गाओ न। ‘आर काज नाइ ज्ञानविचारे, दे माँ पागल करे।’*
देखो, यही मेरा असली भाव है।”
हाजरा को उपदेश – घृणा व निन्दा छोड़ दो
हाजरा महाशय कभी कभी किसी के सम्बन्ध में घृणा प्रकट करते थे।
श्रीरामकृष्ण (राम आदि भक्तों के प्रति) – कामारपुकुर में किसी मकान पर मैं अक्सर जाया करता था। उस घर के लड़के मेरी ही बराबरी के थे, वे लड़के उस दिन यहाँ आए थे और दो-तीन दिन रहे भी। हाजरा की तरह उनकी माँ सब से घृणा करती थी। अन्त में उसके पैर में न जाने क्या हो गया। पैर सड़ने लगा। कमरे में इतनी दुर्गन्ध हुई कि लोग अन्दर तक नहीं जा सकते थे।
“इसीलिए मैंने हाजरा से यह बात कही और उसे चेतावनी दे दी कि किसी की निन्दा न करो।”
* ‘अब मुझे ज्ञान-विचार से काम नहीं है, हे माँ, मुझे तू पागल बना दे।’
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar