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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३१८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ सितम्बर, १८८३

आता था। यहीं से नमस्कार करना सीखा था। एक दिन मैंने कहा, साधुओं को इस तरह से नमस्कार नहीं करना चाहिए। एक दिन ईशान के साथ मैं गाड़ी पर कलकत्ता जा रहा था। उसने मुझसे केशव सेन की सब बातें सुनीं। हरीश अच्छा कहता है – यहाँ से सब चेक पास करा लेने होंगे, तब बैंक में रुपये मिलेंगे।” (सब हँसते हैं।)

मणि निर्वाक् रहकर सब बातें सुन रहे हैं। उन्होंने समझा, गुरु के रूप में सच्चिदानंद स्वयं चेक पास करते हैं।

श्रीरामकृष्ण – विचार न करना। उन्हें कौन जान सकता है? न्यांगटा कहता था, मैंने सुन रखा है, उन्हीं के एक अंश से यह ब्रह्माण्ड बना है।

“हाजरा में बड़ी विचारबुद्धि है। वह हिसाब करता है, इतने में संसार हुआ और इतना बाकी रह गया! उसका हिसाब सुनकर मेरा माथा ठनकने लगता है। मैं जानता हूँ, मैं कुछ नहीं जानता। कभी तो उन्हें अच्छा सोचता हूँ और कभी उन्हें बुरा मानता हूँ। उनको मैं क्या समझूँगा?”

मणि – जी हाँ, क्या कोई उन्हें समझ सकता है? जिसकी जैसी बुद्धि है, उतनी ही से वह सोचता है, मैं सब कुछ समझ गया। आप जैसा कहते हैं, एक चींटी चीनी के पहाड़ के पास गयी थी, उसका जब एक ही दाने से पेट भर गया तब उसने कहा, अब की बार आऊँगी तो पहाड़ का पहाड़ उठा ले जाऊँगी!

क्या ईश्वर को जाना जा सकता है? उपाय – शरणागति

श्रीरामकृष्ण – उन्हें कौन जान सकता है? मैं जानने की चेष्टा भी नहीं करता। मैं केवल माँ कहकर पुकारता हूँ। माँ चाहे जो करें। उनकी इच्छा होगी तो वे समझाएँगी और न इच्छा होगी तो न समझाएँगी। इससे क्या है? मेरा स्वभाव बिल्ली के बच्चे की तरह है। बिल्ली का बच्चा केवल ‘मिऊँ मिऊँ’ करके पुकारता है। इसके बाद उसकी माँ जहाँ रखती है वहीं रहता है। कभी कण्डौरे में रखती है और कभी बाबूसाहब के बिस्तरे पर। छोटा बच्चा बस माँ को ही चाहता है। माता का कितना ऐश्वर्य है, वह नहीं जानता। जानना भी नहीं चाहता। वह जानता है, मेरे माँ है, मुझे क्या चिन्ता है? नौकरानी का लड़का भी जानता है, मेरे माँ है। बाबू के लड़के के साथ अगर लड़ाई हो जाती है तो वह कहता है, ‘मैं अपनी माँ से कह दूँगा। मेरे माँ है कि नहीं?’ मेरा भी सन्तान-भाव है।

श्रीरामकृष्ण अकस्मात् अपने को दिखाकर, अपनी छाती में हाथ लगाकर, मणि से कहते हैं – “अच्छा, इसमें कुछ है – तुम क्या कहते हो?”

मणि निर्वाक् भाव से श्रीरामकृष्ण को देख रहे हैं। शायद सोच रहे हैं – श्रीरामकृष्ण के हृदय में साक्षात् जगन्माता हैं। क्या जीवों के कल्याण के लिए माँ स्वयं देह धारण कर आयी हुई हैं?

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar