श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५५ ३१९
(३)
साकार-निराकार। कर्तव्यबुद्धि
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर में कालीमन्दर के सामने चबूतरे पर बैठे हैं। कालीप्रतिमा में जगन्माता के दर्शन कर रहे हैं। पास ही मास्टर आदि भक्तगण बैठे हैं।
थोड़ी देर पहले श्रीरामकृष्ण ने कहा है, “ईश्वर के सम्बन्ध में अनुमान आदि लगाना व्यर्थ है। उनका ऐश्वर्य अनन्त है। बेचारा मनुष्य मुँह से क्या प्रकट कर सकेगा! एक चींटी ने चीनी के पहाड़ के पास जाकर चीनी का एक कण खाया। उसका पेट भर गया। तब वह सोचने लगी, ‘अब की बार आऊँगी तो पूरे पहाड़ को अपने बिल में उठा ले जाऊँगी!’
“उन्हें क्या समझा जा सकता है? इसीलिए मेरा बिल्ली के बच्चे का-सा भाव है। माँ जहाँ भी रख दे, मैं कुछ नहीं जानता। छोटे बच्चे नहीं जानते, माँ का कितना ऐश्वर्य है!”
श्रीरामकृष्ण कालीमन्दिर के चबूतरे पर बैठे स्तुति कर रहे हैं, - “ओ माँ! ओ माँ ओंकाररूपिणि! माँ! ये लोग कितना सब वर्णन करते हैं, माँ! - कुछ समझ नहीं सकता! कुछ नहीं जानता हूँ, माँ! शरणागत! शरणागत! केवल यही करो माँ! जिससे तुम्हारे श्रीचरणकमलों में शुद्धा भक्ति हो! अब और अपनी भुवनमोहिनी माया में मोहित न करो माँ! शरणागत! शरणागत!”
मन्दिर में आरती हो गयी। श्रीरामकृष्ण कमरे में छोटे तख्त पर बैठे हैं। महेन्द्र जमीन पर बैठे हैं।
महेन्द्र पहले-पहल श्री केशव सेन के ब्राह्मसमाज में हमेशा जाया करते थे। श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के बाद फिर वहाँ नहीं जाते हैं। श्रीरामकृष्ण सदा जगन्माता के साथ वार्तालाप करते हैं यह देखकर वे बड़े विस्मित हुए हैं और उनकी सर्वधर्मसमन्वय की बात सुनकर तथा ईश्वर के लिए उनकी व्याकुलता को देखकर वे मुग्ध हो गए हैं।
महेन्द्र लगभग दो वर्ष से श्रीरामकृष्ण के पास आया-जाया करते हैं और उनका दर्शन तथा कृपा प्राप्त कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें तथा अन्य भक्तों से सदा ही कहते हैं, “ईश्वर निराकार और फिर साकार भी हैं। भक्त के लिए वे देह धारण करते हैं।” जो लोग निराकारवादी हैं उनसे वे कहते हैं, “तुम्हारा जो विश्वास है उसे ही रखो। परन्तु यह जान लेना कि उनके लिए सभी कुछ सम्भव है। साकार और निराकार ही क्या, वे और भी बहुत कुछ बन सकते हैं।”
श्रीरामकृष्ण (महेन्द्र के प्रति) - तुमने तो एक को पकड़ लिया है - निराकार!
महेन्द्र - जी हाँ, परन्तु जैसा कि आप कहते हैं, सभी सम्भव है। साकार भी सम्भव है।