श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२० श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ सितम्बर, १८८३
श्रीरामकृष्ण – बहुत अच्छा, और यह भी जानो कि वे चैतन्य रूप में चराचर विश्व में व्याप्त हैं।
महेन्द्र – मैं समझता हूँ कि वे चेतन के भी चेतयिता हैं।
श्रीरामकृष्ण – अब उसी भाव में रहो। खींचतान करके भाव बदलने की आवश्यकता नहीं है। धीरे धीरे जान सकोगे कि वह चेतनता उन्हीं की चेतनता है। वे ही चैतन्यस्वरूप हैं।
“अच्छा, तुम्हारा धन-दौलत पर मोह है?”
महेन्द्र – जी नहीं! परन्तु हाँ, इतना अवश्य सोचता हूँ कि निश्चिन्त होने के लिए – निश्चिन्त होकर भगवान् का चिन्तन करने के लिए धन की आवश्यकता होती है।
श्रीरामकृष्ण – वह तो होगी ही!
महेन्द्र – क्या यह लोभ है? मैं तो ऐसा नहीं समझता।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, ठीक है। नहीं तो तुम्हारे बच्चों को कौन देखेगा?
“यदि तुम्हें 'मैं अकर्ता हूँ' यह ज्ञान हो जाए तो फिर तुम्हारे लड़कों का क्या होगा?”
महेन्द्र – सुना है, कर्तव्य का बोध रहते ज्ञान नहीं होता। कर्तव्य मानो प्रखर सूर्य है।
श्रीरामकृष्ण – अब उसी भाव में रहो। इसके बाद जब यह कर्तव्यबुद्धि स्वयं ही चली जाएगी तब फिर दूसरी बात है।
सभी थोड़ी देर चुप रहे।
महेन्द्र – केवल थोड़ा ही ज्ञानलाभ होने से तो संसार और भी कष्टप्रद है। यह तो ऐसा होता है मानो होशसहित मृत्यु। जैसे – हैजा!
श्रीरामकृष्ण – राम! राम!
सम्भवतः इस कथन से महेन्द्र का तात्पर्य यह है कि मृत्यु के समय होश रहने पर अत्यधिक यन्त्रणा का अनुभव होता है, जैसे हैजे में होता है। थोड़े ज्ञानवाले का सांसारिक जीवन बड़ा दुःखमय होता है; क्योंकि वह यह समझ गया है कि संसार भ्रमात्मक है। अविद्या का संसार मानो दावाग्नि के सदृश है। सम्भव है इसीलिए श्रीरामकृष्ण 'राम! राम!' कह रहे हैं!
महेन्द्र – और दूसरी श्रेणी के लोग, जो पूर्ण अज्ञानी हैं, वे मानो मियादी बुखार से पीड़ित हैं। वे मृत्यु के समय बेहोश हो जाते हैं और इससे उन्हें मृत्यु की यन्त्रणा का अनुभव नहीं होता।
श्रीरामकृष्ण – देखो न, धन रहने से भी क्या! जयगोपाल सेन कितने धनी हैं, परन्तु हैं दुःखी, लड़के उन्हें उतना नहीं मानते।