श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६ सितम्बर, १८८३ परिच्छेद ५५ ३२१
महेन्द्र – संसार में क्या केवल निर्धनता ही दुःख है? इसके अतिरिक्त छः रिपु भी हैं और फिर उनके ऊपर रोग-शोक।
श्रीरामकृष्ण – फिर मान-मर्यादा, लोकमान्य बनने की इच्छा।
“अच्छा, मेरा क्या भाव है?”
महेन्द्र – नींद खुल जाने पर मनुष्य का जो भाव होता है वही। उसे स्वयं का होश आ जाता है। ईश्वर के साथ सदा योग है।
श्रीरामकृष्ण – तुम मुझे स्वप्न में देखते हो?
महेन्द्र – हाँ, कई बार!
श्रीरामकृष्ण – कैसा? कुछ उपदेश देते देखते हो?
महेन्द्र चुप रह गए।
श्रीरामकृष्ण – जब जब मैं तुम्हें शिक्षा देता दिखायी दूँ तो यही समझो कि स्वयं सच्चिदानन्द ही यह कार्य कर रहे हैं।
इसके बाद महेन्द्र ने स्वप्न में जो कुछ देखा था सभी कह सुनाया। श्रीरामकृष्ण ने मन लगाकर सभी सुना।
श्रीरामकृष्ण (महेन्द्र के प्रति) – यह सब बहुत अच्छा है। तुम और तर्क-विचार न लाओ! तुम लोग शाक्त हो!
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