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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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९ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ६०३६३

राखाल आया। जो जो आत्मीय हैं, उनमें कोई अंश है और कोई कला।”

श्रीरामकृष्ण फिर पंचवटी की ओर जा रहे हैं। केवल मास्टर साथ हैं, और कोई नहीं। श्रीरामकृष्ण प्रसन्नतापूर्वक उनसे विविध वार्तालाप कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण (मास्टर से) – देखो, मैंने एक दिन कालीमन्दिर से पंचवटी तक एक अद्भुत मूर्ति देखी! इस पर तुम्हारा विश्वास होता है?

मास्टर आश्चर्य में आकर निर्वाक् हो रहे।

वे पंचवटी की शाखा से दो-चार पत्ते तोड़कर अपनी जेब में रख रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – यह डाल गिर गयी है, देखते हो? मैं इसके नीचे बैठता था।

मास्टर – मैं इसकी एक छोटीसी डाल तोड़ ले गया हूँ। उसे घर में रख दिया है।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – क्यों?

मास्टर – देखने से आनन्द होता है। सब समाप्त हो जाने पर यही जगह महातीर्थ होगी।

श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – किस तरह का तीर्थ? क्या पानीहाटी की तरह का?

पानीहाटी में बड़े समारोह के साथ राघव पण्डित का महोत्सव होता है। श्रीरामकृष्ण प्रायः हर साल यह महोत्सव देखने जाया करते हैं और संकीर्तन के बीच में प्रेम और आनन्द से नृत्य किया करते हैं, मानो भक्तों की पुकार सुनकर श्रीगौरांग स्थिर नहीं रह सकते – संकीर्तन में स्वयं जाकर अपनी प्रेममूर्ति के दर्शन कराते हैं।

(३)

हरिकथा-प्रसंग

सन्ध्या हो गयी। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में छोटे तख्त पर बैठे हुए जगन्माता का चिन्तन कर रहे हैं। क्रमशः मन्दिर में देवताओं की आरती होने लगी। शंख और घण्टे बजने लगे। मास्टर आज रात को यही रहेंगे।

कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण ने मास्टर से 'भक्तमाल' पढ़कर सुनाने के लिए कहा। मास्टर पढ़ रहे हैं।*

“जयमल नाम के एक शुद्धचित्त राजा थे। भगवान् श्रीकृष्ण पर उनकी अचल प्रीति थी। नवधा भक्ति के यजन में वे इतने दृढ़निष्ठ थे कि पत्थर पर खिंची हुई रेखा की तरह उसका ह्रास न हो पाता था। वे जिस विग्रह का पूजन करते थे उसका नाम श्यामलसुन्दर था। श्यामलसुन्दर को छोड़ वे और अन्य किसी देवी-देवता को मानो जानते ही न थे उन्हीं पर उनका चित्त लगा रहता था। सदा दृढ़ नियमों से वे दस दण्ड दिन चढ़ते तक उस


* यह बंगला का भक्तमाल है। छन्दोबद्ध है। यहाँ इसका हिन्दी अनुवाद दिया गया है।