भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 387

३६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ९ दिसम्बर, १८८३

मूर्ति की पूजा किया करते थे। अपने पूजन में वे इतने दृढ़निश्चय थे कि चाहे राज्य और धन का नाश हो जाए, चाहे वज्रपात हो, तथापि पूजा के समय किसी दूसरी ओर ध्यान न देते थे।

“इस बात की खबर उनके एक दूसरे प्रतिस्पर्धी राजा के पास पहुँची। उसने सोचा, यह तो शत्रु को पराजित करने का एक उत्तम उपाय हाथ आया। जिस समय राजा जयमल पूजन के लिए बैठे थे उसी समय उसने उनके राज्य पर आक्रमण कर युद्ध की घोषणा कर दी। राजा की आज्ञा बिना सेना युद्ध नहीं कर सकती। अतः राजा जयमल की सेना उनकी आज्ञा की राह देखती रही। तब तक शत्रुओं ने उनका किला घेर लिया। तथापि इन्होंने उस समय युद्ध की ओर ध्यान ही नहीं दिया, निरुद्वेग होकर पूजन करते रहे। इनकी माता सिर पटकती हुई पास आकर उच्च स्वर से रोदन करने लगी। विलाप करते हुए उसने कहा कि अब जल्दी उठो, नहीं तो सब कुछ चला जाएगा; तुम तो ऐसे हो कि तुम्हारा इधर ध्यान ही नहीं है - शत्रु चढ़ आया - अब किला तोड़ना ही चाहता है। महाराज जयमल ने कहा, ‘माता! तुम क्यों दुःख कर रही हो? जिसने यह राज-पाट दिया है, वह अगर छीन ले तो हमारा इसमें क्या! और अगर वह हमारी रक्षा करे, तो वह शक्ति किसमें है जो हमसे ले सके? अतएव हम लोगों का उद्यम तो व्यर्थ ही है।’

“इधर श्यामलसुन्दर ने घोड़े पर सवार हो अस्त्र-शस्त्र लेकर युद्ध की तैयारी कर दी। अकेले ही भक्त के शत्रुओं का संहार करके घोड़े को अपने मन्दिर के पास बाँधकर श्यामलसुन्दर जहाँ के तहाँ हो रहे।

“पूजा-अर्चना समाप्त होने पर राजा जयमल बाहर आकर देखते हैं कि सामने उनका घोड़ा पसीने से तर हो हाँफता खड़ा हैं। वे पूछने लगे, ‘मेरे घोड़े पर कौन सवार हुआ और इसे यहाँ बाँध गया?’ सभी कहने लगे कि यह तो हम कुछ भी नहीं जानते। राजा के मन में सन्देह हुआ और यही सोचते हुए वे सेनासहित युद्धभूमि की ओर बढ़े। जाकर उन्होंने देखा कि सारी शत्रुसेना रणभूमि में लोट रही है - केवल शत्रुपक्ष का राजा भर बचा है। विस्मित होकर राजा जयमल इसका कारण पूछने लगे। इतने में वह प्रतिस्पर्धी राजा उनके समीप आया और हाथ जोड़कर विनती करने लगा। वह बोला, ‘आपके एक सिपाही ने अकेले ही इतना आश्चर्यजनक युद्ध किया कि उनके सामने कोई टिक न सका। वह अवश्य ही त्रिलोकविजयी है। महाराज, मैं आपका धन या राज्य नहीं चाहता। बल्कि आप चलकर मेरा भी राज्य ले लें। परन्तु मुझे आप इतना बताइये कि वह साँवला सिपाही कौन था? केवल एक बार दर्शन देकर उसने मेरा मन हर लिया है।’

“जयमल को समझने में देर न लगी कि यह सब श्यामलसुन्दरजी का ही खेल है। यह मर्म जानते ही प्रतिद्वन्द्वी राजा जयमल के चरण पकड़कर स्तव करने लगे और कहने लगे कि जिनके कारण मुझ पर कृष्ण की कृपा हुई उन आपके चरणों में मैं शरण लेता हूँ