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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२७ दिसम्बर, १८८३परिच्छेद ७१४१३

श्रीश – संसार में रहते हुए उनकी ओर जाना बड़ा कठिन है।

अभ्यास-योग और निर्जन में साधना

श्रीरामकृष्ण – क्यों? अभ्यास-योग है। उस देश में बढ़ई की औरतें चिउड़ा बेचती हैं। वे कितनी ओर ध्यान देकर कितने काम सम्हालती हैं, सुनो। एक तो ढेंकी चल रही है, हाथ से वह धान सरका रही है, और एक हाथ से बच्चे को गोद में लेकर दूध पिला रही है। ऊपर के जो खरीदार आते हैं, उनसे मोल-तोल कर रही है, इधर ढेंकी का काम भी चल रहा है। खरीदार से कहती है, ‘तो तुम्हारे ऊपर जो बाकी पैसे हैं, वे सब दे जाना, तब और चीज ले जाना।’ देखो, लड़के को दूध पिलाना, ढेंकी चल रही है उसमें धान सरकाना और कूटे हुए धान निकालना, और इधर खरीदार के साथ बातचीत करना, ये सब एक साथ कर रही है। इसे ही अभ्यास-योग कहते हैं; परन्तु उसका पन्द्रह आना मन ढेंकी पर लगा हुआ है; क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि ढेंकी हाथ पर गिर जाय; और एक आना मन लड़के को दूध पिलाने और खरीदार से बातचीत करने में है। इसी तरह जो लोग संसार में हैं उन्हें पन्द्रह आना मन ईश्वर को देना चाहिए। न देने से सर्वनाश हो जाएगा – काल के हाथ पड़ना होगा। और एक आने से दूसरे काम करो।

“ज्ञान हो जाने पर संसार में रहा जा सकता है, परन्तु पहले तो ज्ञानलाभ करना चाहिए। संसार-रूपी जल में मन-रूपी दूध रखने पर दोनों मिल जाएँगे। इसलिए मन-रूपी दूध का दही बनाकर निर्जन में उसे मथकर, उससे मक्खन निकालकर, तब उसे संसार-रूपी पानी में रखना चाहिए। इससे यह स्पष्ट है कि साधना चाहिए। पहली अवस्था में निर्जन में रहना जरूरी हैं। पीपल का पेड़ जब छोटा रहता है, तब उसके चारों ओर घेरा लगाना पड़ता हैं; नहीं तो बकरे और गौएँ उसे चर जाती हैं। परन्तु उसकी पेड़ी मोटी हो जाने पर घेरा खोल दिया जा सकता है। तब तो हाथी बाँध देने पर भी उस पेड़ का कुछ नहीं बिगड़ता।

“इसीलिए प्रथम अवस्था में कभी कभी निर्जन में जाना पड़ता है। साधना आवश्यक है। भात खाओगे – बैठे बैठे कह रहे हो लकड़ी में आग है और उसी आग से चावल पकता है। इस तरह कहने से ही क्या भात तैयार हो जाएगा? एक और लकड़ी ले आकर दोनों को रगड़ना चाहिए; आग तभी तैयार होगी।

“भंग खाने से नशा होता है, आनन्द होता है। न तुमने खाया, न कुछ किया – बैठे बैठे केवल ‘भंग भंग’ कर रहे हो! क्या इससे कभी नशा या आनन्द होता है?

मनुष्यजीवन का उद्देश्य – 'दूध पियो'

“पढ़ना-लिखना चाहे लाख सीखो, ईश्वर पर भक्ति हुए बिना – उन्हें प्राप्त करने की इच्छा हुए बिना – सब मिथ्या है। केवल पण्डित है, परन्तु यदि विवेक-वैराग्य नहीं