श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
२७ दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७१ | ४१३
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श्रीश – संसार में रहते हुए उनकी ओर जाना बड़ा कठिन है।
अभ्यास-योग और निर्जन में साधना
श्रीरामकृष्ण – क्यों? अभ्यास-योग है। उस देश में बढ़ई की औरतें चिउड़ा बेचती हैं। वे कितनी ओर ध्यान देकर कितने काम सम्हालती हैं, सुनो। एक तो ढेंकी चल रही है, हाथ से वह धान सरका रही है, और एक हाथ से बच्चे को गोद में लेकर दूध पिला रही है। ऊपर के जो खरीदार आते हैं, उनसे मोल-तोल कर रही है, इधर ढेंकी का काम भी चल रहा है। खरीदार से कहती है, ‘तो तुम्हारे ऊपर जो बाकी पैसे हैं, वे सब दे जाना, तब और चीज ले जाना।’ देखो, लड़के को दूध पिलाना, ढेंकी चल रही है उसमें धान सरकाना और कूटे हुए धान निकालना, और इधर खरीदार के साथ बातचीत करना, ये सब एक साथ कर रही है। इसे ही अभ्यास-योग कहते हैं; परन्तु उसका पन्द्रह आना मन ढेंकी पर लगा हुआ है; क्योंकि कहीं ऐसा न हो कि ढेंकी हाथ पर गिर जाय; और एक आना मन लड़के को दूध पिलाने और खरीदार से बातचीत करने में है। इसी तरह जो लोग संसार में हैं उन्हें पन्द्रह आना मन ईश्वर को देना चाहिए। न देने से सर्वनाश हो जाएगा – काल के हाथ पड़ना होगा। और एक आने से दूसरे काम करो।
“ज्ञान हो जाने पर संसार में रहा जा सकता है, परन्तु पहले तो ज्ञानलाभ करना चाहिए। संसार-रूपी जल में मन-रूपी दूध रखने पर दोनों मिल जाएँगे। इसलिए मन-रूपी दूध का दही बनाकर निर्जन में उसे मथकर, उससे मक्खन निकालकर, तब उसे संसार-रूपी पानी में रखना चाहिए। इससे यह स्पष्ट है कि साधना चाहिए। पहली अवस्था में निर्जन में रहना जरूरी हैं। पीपल का पेड़ जब छोटा रहता है, तब उसके चारों ओर घेरा लगाना पड़ता हैं; नहीं तो बकरे और गौएँ उसे चर जाती हैं। परन्तु उसकी पेड़ी मोटी हो जाने पर घेरा खोल दिया जा सकता है। तब तो हाथी बाँध देने पर भी उस पेड़ का कुछ नहीं बिगड़ता।
“इसीलिए प्रथम अवस्था में कभी कभी निर्जन में जाना पड़ता है। साधना आवश्यक है। भात खाओगे – बैठे बैठे कह रहे हो लकड़ी में आग है और उसी आग से चावल पकता है। इस तरह कहने से ही क्या भात तैयार हो जाएगा? एक और लकड़ी ले आकर दोनों को रगड़ना चाहिए; आग तभी तैयार होगी।
“भंग खाने से नशा होता है, आनन्द होता है। न तुमने खाया, न कुछ किया – बैठे बैठे केवल ‘भंग भंग’ कर रहे हो! क्या इससे कभी नशा या आनन्द होता है?
मनुष्यजीवन का उद्देश्य – 'दूध पियो'
“पढ़ना-लिखना चाहे लाख सीखो, ईश्वर पर भक्ति हुए बिना – उन्हें प्राप्त करने की इच्छा हुए बिना – सब मिथ्या है। केवल पण्डित है, परन्तु यदि विवेक-वैराग्य नहीं
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है, तो उसकी दृष्टि कामिनी-कांचन पर अवश्य रहेगी। गीध बहुत ऊँचे उड़ते हैं, परन्तु उनकी दृष्टि मरघट पर ही रहती है।
“जिस विद्या के प्राप्त करने पर मनुष्य उन्हें पा सकता है, वही यथार्थ विद्या है, और सब मिथ्या है। अच्छा, ईश्वर के सम्बन्ध में तुम्हारी क्या धारणा है?”
श्रीश – जी, इतना बोध हुआ है कि कोई एक ज्ञानमय पुरुष हैं। उनकी सृष्टि देखने पर उनके ज्ञान का परिचय मिलता है। एक बात कहता हूँ – जिन देशों में जाड़ा ज्यादा होता है, वहाँ मछलियों और दूसरे जल-जन्तुओं को बचा रखने के लिए ईश्वर ने यह कुशलता दिखायी है कि जितना ही अधिक जाड़ा पड़ता है उतना ही पानी सिमटता जाता है, परन्तु आश्चर्य यह है कि बर्फ बनने से पहले ही पानी कुछ हलका हो जाता है, और उस समय पानी का फैलाव ज्यादा हो जाता है। तालाब के पानी में वहाँ जाड़े में मछलियाँ अनायास ही रह सकती हैं। पानी के ऊपरी हिस्से में बर्फ जम गयी है, परन्तु नीचे के हिस्से में ज्यों का त्यों पानी बना रहता है। अगर खूब ठण्डी हवा चलती है, तो वह हवा बर्फ पर ही लगती है, नीचे का पानी गरम रहता है।
श्रीरामकृष्ण – वे हैं यह बात संसार देखने से ही मालूम हो जाती है। परन्तु उनके सम्बन्ध में कुछ सुनना एक बात है, उन्हें देखना और बात, और उनसे वार्तालाप करना और बात है। किसी ने दूध की बात सुनी है, किसी ने दूध देखा है, और किसी ने दूध पिया है! आनन्द तो देखने से होगा, पर पीने से देह सबल होगी, तभी तो लोग हृष्टपुष्ट होंगे। ईश्वर के दर्शन जब होंगे, तभी तो शान्ति होगी। जब उनसे वार्तालाप होगा, तभी तो आनन्द होगा और शक्ति बढ़ेगी।
मुमुक्षुत्व समयसापेक्ष
श्रीश – उन्हें पुकारने का अवसर मिलता ही नहीं।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – यह ठीक है; समय हुए बिना कुछ नहीं होता। किसी लड़के ने सोने के पहले अपनी माँ से कहा था, ‘माँ, जब मुझे टट्टी की इच्छा हो, तब उठा देना।’ उसकी माँ ने कहा, ‘बेटा, टट्टी की इच्छा तुम्हें स्वयं उठाएगी, मुझे उठाना न होगा।’
“जिसे जो कुछ देना चाहिए, यह उनका पहले से ही ठीक किया हुआ है। घर की एक पुरखिन अपनी बहुओं को एक बर्तन से नापकर चावल बनाने के लिए देती थी, पर उतना चावल उन लोगों के लिए कम पड़ता था। एक दिन वह नापनेवाला बर्तन फूट गया; इससे बहुएँ बहुत खुश हुईं। पर उस पुरखिन ने कहा, ‘तुम्हारे नाचने-कूदने या खुशी मनाने से क्या हुआ; मैं चावल अपनी मुट्ठी से नाप सकती हूँ, मुझे अन्दाज मालूम है!’
(श्रीश से) – “क्या करोगे, पूछते हो? उनके श्रीचरणों में सब कुछ समर्पित कर
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दो, उन्हें आम मुखत्यारी दे दो! वे जो कुछ अच्छा समझें, करें। बड़े आदमी पर अगर भार दे दिया जाय, तो वह कभी बुराई नहीं कर सकता।
“साधना की भी आवश्यकता है। परन्तु साधक दो तरह के होते हैं। एक तरह के साधकों का स्वभाव बन्दर के बच्चे जैसा होता है, दूसरे तरह के साधक का बिल्ली के बच्चे जैसा। बन्दर का बच्चा किसी तरह खुद अपनी माँ को पकड़े रहता है। इसी तरह कोई साधक सोचते हैं, हमें इतना जप करना चाहिए, इतनी देर तक ध्यान करना चाहिए, इतनी तपस्या करनी चाहिए, तब कहीं ईश्वर मिलेंगे। इस तरह के साधक अपने प्रयत्न से ईश्वर-प्राप्ति की आशा रखते हैं।
“परन्तु बिल्ली का बच्चा खुद अपनी माँ को नहीं पकड़ सकता। वह पड़ा हुआ बस ‘मीऊँ मीऊँ’ करके पुकारता है। उसकी माँ चाहे जो करे। उसकी माँ कभी उसे बिस्तर पर ले जाती है, कभी छत पर लकड़ी की आड़ में रख देती है, और कभी उसे मुँह में दबाकर यहाँ-वहाँ रखती फिरती है। वह स्वयं अपनी माँ को पकड़ना नहीं जानता। इसी तरह कोई कोई साधक स्वयं हिसाब करके साधन-भजन नहीं कर सकते कि इतना जप करूँगा, इतना ध्यान करूँगा। वह केवल व्याकुल होकर रो-रोकर उन्हें पुकारता है। उसका रोना सुनकर वे फिर रह नहीं सकते। आकर दर्शन देते हैं।”
(२)
ईश्वर कर्ता हैं, तथापि कर्मों के लिए जीव उत्तरदायी है।
दिन चढ़ आया है। घर के मालिक ने भोजन के लिए घर में कच्ची रसोई का सामान तैयार कराया है। वे बड़े व्यस्त हैं। वे घर के भीतर जाकर भोजन का प्रबन्ध कर रहे हैं।
दिन बहुत हो गया है, इसीलिए श्रीरामकृष्ण भोजन के लिए जल्दी कर रहे हैं। वे उसी कमरे में टहल रहे हैं। मुख पर प्रसन्नता झलक रही है। कभी कभी केशव कीर्तनिया से वार्तालाप कर रहे हैं।
केशव कीर्तनिया – वही करण और वही कारण हैं; दुर्योधन ने कहा था,
‘त्वया हृषीकेश हृदिस्थितेन, यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।’
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – हाँ, वही सब कराते हैं; यह ठीक है। कर्ता वही हैं, मनुष्य तो यन्त्र-स्वरूप है।
“और यह भी ठीक है कि कर्मफल भी है। मिर्च खाने पर पेट जलता रहेगा। पाप करने से उसका फल अवश्य भोगना होगा।
“जिसे सिद्धि हो गयी है, जिसने ईश्वर को पा लिया है, वह फिर पाप नहीं कर सकता। उसके पैर बेताल नहीं पड़ते। जिसका सधा हुआ गला है, उसके स्वर में सा रे ग म बिगड़ने नहीं पाता।”
४१६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ दिसम्बर, १८८३
भोजन तैयार है। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ मकान के भीतर गए और उन्होंने आसन ग्रहण किया। ब्राह्मण का मकान है व्यंजन कई तरह के तैयार कराये गए हैं, ऊपर से अनेक प्रकार की मिठाइयाँ भी लायी गयी हैं।
दिन के तीन बजे का समय होगा। भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण ईशान के बैठकखाने में आकर बैठे। पास में श्रीश और मास्टर बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण श्रीश के साथ फिर बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – तुम्हारा क्या भाव है? सोऽहं या सेव्य-सेवक?
“संसारियों के लिए सेव्य-सेवक का भाव बहुत अच्छा है। सब सांसारिक काम तो कर रहे हैं, ऐसी अवस्था में ‘मैं वही हूँ’ यह भाव कैसे आ सकता है? जो कहता है, ‘मैं वही हूँ’, उसके लिए तो संसार स्वप्नवत् है; उसका अपना शरीर और मन भी स्वप्नवत् है, उसका ‘मैं’ भी स्वप्नवत् है; अतएव संसार का काम वह नहीं कर सकता। इसीलिए सेव्य-सेवक भाव, दास-भाव बहुत अच्छा है।
“दास-भाव हनुमान का था। श्रीराम से हनुमान ने कहा था ‘राम, कभी तो मैं सोचता हूँ, तुम पूर्ण हो – मैं अंश हूँ, तुम प्रभु हो – मैं दास हूँ, और जब तत्त्व का ज्ञान हो जाता है, तब देखता हूँ, मैं ही तुम हूँ, और तुम्हीं मैं हो।’
“तत्त्वज्ञान के समय सोऽहम् हो सकता है, परन्तु वह दूर की बात है।”
श्रीश – जी हाँ, दास-भाव से आदमी निश्चिन्त हो सकता है। प्रभु पर सब कुछ निर्भर है। कुत्ता बड़ा स्वामिभक्त है, इसीलिए स्वामी पर सब भार देकर वह निश्चिन्त रहता है।
साकार निराकार – नाममाहात्म्य
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, तुम्हें साकार ज्यादा पसन्द है या निराकार? बात यह है कि जो निराकार है, वही साकार भी है। भक्त की आँखों को वे साकार रूप से दर्शन देते हैं। जैसे अनन्त जलराशि, महासमुद्र, जिसका न ओर है न छोर; उसी जल में कहीं कहीं बर्फ जम गयी है; ज्यादा ठण्डक पहुँचने पर पानी जमकर बर्फ हो जाता है। उसी तरह भक्ति-हिम द्वारा साकार रूप के दर्शन होते हैं। फिर जिस तरह सूर्योदय होने पर बर्फ गल जाती है – ज्यों का त्यों पानी हो जाता है, उसी तरह ज्ञानमार्ग या विचार-मार्ग से होकर जाने पर साकार रूप के दर्शन नहीं होते, फिर तो सब निराकार ही निराकार दीख पड़ता है। ज्ञान-सूर्योदय होने पर साकार बर्फ गल जाती है।
“परन्तु देखो, जिसकी निराकार सत्ता है, उसी की साकार भी है।”
शाम होने को है। श्रीरामकृष्ण उठे। अब दक्षिणेश्वर को लौटनेवाले हैं। बैठकखाने के दक्षिण ओर जो बरामद़ा है, उसी पर खड़े होकर ईशान से बातचीत कर रहे हैं। वहीं
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कोई कह रहे हैं, “यह तो मैं नहीं देखता कि ईश्वर का नाम लेने से प्रत्येक समय फल होता है।”
ईशान ने कहा, “यह क्या ? बट का बीज कितना छोटा होता है, परन्तु उसके भीतर कितना बड़ा पेड़ छिपा रहता है पर वह पेड़ देर से दिखायी देता है।
श्रीरामकृष्ण – हाँ हाँ, फल देर से होता है।
ईशान का मकान उनके ससुर स्वर्गीय श्री क्षेत्रनाथ चटर्जी के मकान के पूर्व ओर है। दोनों मकानों में आने-जाने का रास्ता है। श्रीरामकृष्ण चटर्जी महाशय के मकान के फाटक के पास आकर खड़े हुए। ईशान अपने बन्धु-बान्धवों को साथ लेकर श्रीरामकृष्ण को गाड़ी पर चढ़ाने के लिए आए हैं।
श्रीरामकृष्ण ईशान से कह रहे हैं, “तुम संसार में ठीक ‘पाँकाल’ मछली की तरह हो। वह रहती तो है तालाब के बीच में, पर उसकी देह में कीच छू नहीं जाती।
“माया के इस संसार में विद्या और अविद्या दोनों ही हैं। परमहंस वह है, जो हंस की तरह दूध और पानी के एक साथ रहने पर भी पानी छोड़कर दूध निकाल लेता है; चींटी की तरह बालू और चीनी के मिले रहने पर भी बालू में से चीनी निकाल ले सकता है।”
( ३ )
समन्वय और निष्ठा भक्ति। अपराध और ईश्वर-कोटि
शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण भक्त रामचन्द्र के घर आए हुए हैं। यहाँ से होकर दक्षिणेश्वर जाएँगे।
रामचन्द्र के बैठकखाने को आलोकित करते हुए भक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। श्री महेन्द्र गोस्वामी से बातचीत कर रहे हैं। गोस्वामीजी उसी मोहल्ले में रहते हैं। श्रीरामकृष्ण इन्हें प्यार करते हैं। जब श्रीरामकृष्ण रामचन्द्र के यहाँ आते हैं तब गोस्वामीजी आकर इनसे मिल जाया करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – वैष्णव, शाक्त सब के पहुँचने की जगह एक है; परन्तु मार्ग और और हैं। जो सच्चे वैष्णव हैं, वें शक्ति की निन्दा नहीं करते।
गोस्वामी (सहास्य) – हर-पार्वती हमारे माँ बाप हैं।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – Thank You (थैंक यू) – माँ बाप हैं।
गोस्वामी – इसके सिवाय किसी की निन्दा करने से, खास कर वैष्णवों की निन्दा से, अपराध होता है – वैष्णवापराध। सब अपराधों की क्षमा है, परन्तु वैष्णवापराध की क्षमा नहीं है।
श्रीरामकृष्ण – अपराध सब को नहीं होता। जो ईश्वरकोटि हैं, उनको अपराध नहीं होता। जैसे श्रीचैतन्यसदृश अवतारी पुरुषों को।
४१८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २७ दिसम्बर, १८८३
“बच्चा अगर बाप का हाथ पकड़कर चलता हो, तो वह गड्ढे में गिर सकता है, परन्तु अगर बाप बच्चे का हाथ पकड़े हुए हो तो बच्चा कभी नहीं गिर सकता।
“सुनो, मैंने माँ से शुद्धा-भक्ति की प्रार्थना की थी। माँ से कहा था, 'यह लो अपना धर्म, यह लो अपना अधर्म; मुझे शुद्धा-भक्ति दो। यह लो अपनी शुचि, यह लो अपनी अशुचि, मुझे शुद्धा-भक्ति दो। माँ, यह लो अपना पाप यह लो अपना पुण्य, मुझे शुद्धा-भक्ति दो।'”
गोस्वामी – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – सब भक्तों को नमस्कार करना। परन्तु 'निष्ठाभक्ति' भी है। सब को प्रणाम तो करना, परन्तु हृदय का उमड़ता हुआ प्यार एक ही पर हो। इसी का नाम निष्ठा है।
“राम-रूप के सिवाय और कोई रूप हनुमान को न भाता था। गोपियों की इतनी निष्ठा थी कि उन्होंने द्वारका में पगड़ीवाले श्रीकृष्ण को देखना ही न चाहा।
“स्त्री अपने देवर-जेठ आदि को पैर धोने के लिए पानी और बैठने को आसन आदि देकर सेवा करती है; परन्तु पति की जैसी सेवा करती है, वैसी वह किसी दूसरे की नहीं करती। पति के साथ उसका सम्बन्ध कुछ दूसरा है।”
रामचन्द्र ने कुछ मिठाइयाँ देकर श्रीरामकृष्ण की पूजा की।
अब वे दक्षिणेश्वर जानेवाले हैं। मणि से उन्होंने बनात लेकर शरीर ढक लिया और टोपी पहन ली। अब भक्तों के साथ वे गाड़ी पर चढ़ने लगे। रामचन्द्र आदि भक्त उन्हें चढ़ा रहे हैं, मणि भी गाड़ी पर बैठे, वे भी दक्षिणेश्वर लौट जाएँगे।
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परिच्छेद ७२
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परिच्छेद ७२
दक्षिणेश्वर में राखाल, राम, केदार प्रभृति के साथ
ब्रह्मज्ञान के सम्बन्ध में वार्तालाप
(१)
श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठ रहे हैं। कालीमाता के दर्शन के लिए कालीघाट जाएँगे। श्री अधर सेन के घर होकर जायेंगे वहाँ से अधर भी साथ जायेंगे। आज शनिवार, अमावस्या है २९ दिसम्बर, १८८३। दिन के एक बजे का समय होगा।
गाड़ी उनके कमरे के उत्तर के तरफ के बरामदे के पास आकर खड़ी है। मणि गाड़ी के द्वार के पास आकर खड़े हुए।
मणि (श्रीरामकृष्ण से) – क्या मैं भी चलूँ?
श्रीरामकृष्ण – क्यों?
मणि – एक बार कलकत्ते के मकान से होकर आता।
श्रीरामकृष्ण (चिन्तित होकर) – फिर जाओगे? क्यों? यहाँ अच्छे तो हो।
मणि घर लौटेंगे, कुछ घण्टों के लिए; परन्तु श्रीरामकृष्ण की इसके लिए सम्मति नहीं है।
(२)
आज रविवार, ३० दिसम्बर, पूस की शुक्ला प्रतिपदा है। दिन के तीन बजे होंगे। मणि पेड़ के नीचे अकेले टहल रहे हैं। एक भक्त ने आकर कहा, “प्रभु बुलाते हैं।” कमरे में श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। मणि ने जाकर प्रणाम किया और जमीन पर भक्तों के बीच बैठ गए।
कलकत्ते से राम, केदार आदि भक्त आये हुए हैं। उनके साथ एक वेदान्तवादी साधु भी आए हैं। श्रीरामकृष्ण जिस दिन रामचन्द्र का बगीचा देखने गए थे उस दिन उस साधु से भेंट हुई थी। साधु पासवाले बगीचे में एक पेड के नीचे अकेले एक चारपाई पर बैठे हुए थे। राम आज श्रीरामकृष्ण की आज्ञा से उस साधु को अपने साथ लेते आए हैं। साधु ने भी श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने की इच्छा प्रकट की थी।
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४२० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३० दिसम्बर, १८८३
श्रीरामकृष्ण उस साधु के साथ आनन्दपूर्वक वार्तालाप कर रहे हैं। उन्होंने अपने पास छोटे तख्त पर साधु को बैठाया है। बातचीत हिन्दी में हो रही है।
श्रीरामकृष्ण – यह सब तुम्हें कैसा जान पड़ता है?
साधु – यह सब स्वप्नवत् है।
श्रीरामकृष्ण – ब्रह्म सत्य और संसार मिथ्या, यही न? अच्छा जी, ब्रह्म कैसा है?
साधु – शब्द ही ब्रह्म है। अनाहत शब्द।
श्रीरामकृष्ण – परन्तु शब्द का प्रतिपाद्य भी तो एक है। क्यों जी?
साधु – वही वाच्य है और वही वाचक भी है।
यह बात सुनते ही श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गए। चित्रवत् स्थिर बैठे हुए हैं। साधु और भक्तगण आश्चर्यचकित होकर श्रीरामकृष्ण की यह समाधि-अवस्था देख रहे हैं। केदार साधु से कह रहे हैं, “यह देखिए, इसे समाधि कहते हैं”।
साधु ने ग्रन्थों में ही समाधि की बात पढ़ी थी। समाधि कैसे होती है, यह उन्होंने कभी नहीं देखा था।
श्रीरामकृष्ण धीरे धीरे अपनी प्राकृत अवस्था में आ रहे हैं। अभी जगन्माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। कहते हैं – “माँ, अच्छा हो जाऊँ, बेहोश न कर देना। साधु के साथ सच्चिदानन्द की बातें करूँगा। सच्चिदानन्द की बातें करते हुए आनन्द मनाऊँगा।”
साधु निर्वाक् होकर देख रहे हैं और ये सब बातें सुन रहे हैं। अब श्रीरामकृष्ण साधु से बातचीत करने लगे। कहते हैं – अब तुम ‘सोऽहम्’ उड़ा दो। अब ‘हम और तुम’ लेकर विलास करें।
जब तक ‘हम’ और ‘तुम’ यह भाव है, तब तक माँ भी हैं। आओ, उन्हें लेकर आनन्द किया जाय। श्रीरामकृष्ण के कथन का शायद यही मर्म है।
कुछ देर इस तरह बातचीत हो जाने के बाद श्रीरामकृष्ण पंचवटी में टहलने चले गए। राम, केदार, मास्टर आदि उनके साथ हैं।
श्रीरामकृष्ण (सहास्य) – साधु को तुमने कैसा देखा।
केदार – उसका शुष्क ज्ञान है। अभी उसने हण्डी चढ़ायी भर है – अभी चावल नहीं चढ़ाए गए।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ठीक है, परन्तु है त्यागी। जिसने संसार को त्याग दिया है, वह बहुत-कुछ आगे बढ़ गया है।
“साधु अभी प्रवर्त्तक है। उन्हें अगर कोई प्राप्त न कर सका, तो उसका कुछ भी नहीं हुआ। जब उनके प्रेम में मस्त हुआ जाता है, तब और कुछ नहीं सुहाता। तब तो – ‘आदरणीय श्यामा माँ को बड़े यत्न से हृदय में धारण किए रहो। मन तू देख और मैं देखूँ, और कोई न देखने पाए।’ ”
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३० दिसम्बर, १८८३ | परिच्छेद ७२ | ४२१
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केदार श्रीरामकृष्ण के भाव के अनुरूप एक गीत गाते हैं -
(भावार्थ) – “सखि, मन की बात कैसे कहूँ? कहने की मनाई है। दर्द को समझनेवाले के बिना प्राण कैसे बच सकेंगे! जो मन का मीत होता है वह देखते ही पहचान में आ जाता है। वह विरला ही होता है।...”
श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में लौट आए हैं। चार बजे का समय है - कालीमन्दिर खुल गया। श्रीरामकृष्ण साधु को लेकर कालीमन्दिर जा रहे हैं। मणि भी साथ हैं।
कालीमन्दिर में प्रवेश कर श्रीरामकृष्ण भक्तिपूर्वक माता को प्रणाम कर रहे हैं। साधु भी हाथ जोड़कर सिर झुका माता को बारम्बार प्रणाम कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – क्यों जी, दर्शन कैसे हुए?
साधु (भक्तिभाव से) – काली प्रधान है।
श्रीरामकृष्ण – काली और ब्रह्म दोनों अभेद हैं। क्यों जी?
साधु – जब तक बहिर्मुख है तब तक काली को मानना होगा। जब तक बहिर्मुख है तब तक भले बुरे दोनों भाव हैं - तब तक एक प्रिय और दूसरा त्याज्य, यह भाव है ही।
“देखिये न, नाम और रूप ये सब तो मिथ्या ही हैं, परन्तु जब तक मैं बहिर्मुख हूँ तब तक मुझे स्त्रियों को त्याज्य समझना चाहिए। और उपदेश के लिए 'यह अच्छा है, यह बुरा है' यह भाव रखना चाहिए - नहीं तो भ्रष्टाचार फैलेगा।”
श्रीरामकृष्ण साधु के साथ बातचीत करते हुए कमरे में लौटे।
श्रीरामकृष्ण – देखा, साधु ने कालीमन्दिर में प्रणाम किया।
मणि – जी हाँ।
(३)
दूसरे दिन सोमवार, ३१ दिसम्बर है। दिन का तीसरा पहर, चार बजे का समय होगा। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ कमरे में बैठे हुए हैं। बलराम, मणि, राखाल, लाटू, हरीश आदि भक्त भी हैं। श्रीरामकृष्ण मणि और बलराम से कह रहे हैं -
“हलधारी का ज्ञानियों जैसा भाव था। वह अध्यात्मरामायण, उपनिषद् – यही सब दिनरात पढ़ता था। इधर साकार की बातों से मुँह फेरता था। मैंने जब कंगालों के भोजन कर जाने पर उनकी पत्तलों से थोड़ा थोड़ा अन्न लेकर खाया, तब उसने कहा, 'तेरे लड़कों का विवाह कैसे होगा?' मैंने कहा, 'क्यों रे साला, मेरे लड़के-बच्चे भी होंगे! आग लगे तेरे गीता और वेदान्त पढ़ने में!' देखो न, इधर तो कहता है – संसार मिथ्या है और फिर विष्णुमन्दिर में नाक सिकोड़कर ध्यान!”
शाम हो गयी है। बलराम आदि भक्त कलकत्ता चले गये हैं। श्रीरामकृष्ण अपने
४२२ श्रीरामकृष्णवचनामृत · ३० दिसम्बर, १८८३
कमरे में बैठे हुए माता का चिन्तन कर रहे हैं। कुछ देर बाद मन्दिर में आरती का मधुर शब्द सुनायी पड़ने लगा।
रात के आठ बज चुके हैं। श्रीरामकृष्ण भाव में आकर मधुर स्वर से माता के साथ वार्तालाप कर रहे हैं। मणि जमीन पर बैठे हुए हैं।
श्रीरामकृष्ण मधुर कण्ठ से नामोच्चारण कर रहे हैं – “हरि ॐ! हरि ॐ! हरि ॐ!”
माँ से कह रहे हैं – “माँ! ब्रह्मज्ञान देकर मुझे बेहोश न कर रखना। मैं ब्रह्मज्ञान नहीं चाहता माँ! मैं आनन्द करूँगा! विलास करूँगा!”
फिर कहते हैं – “माँ, मैं वेदान्त नहीं जानता – जानना भी नहीं चाहता! माँ, तुझे पाने पर वेद-वेदान्त कितने नीचे पड़े रहते हैं!”
“अरे कृष्ण! मैं तुझे कहूँगा, ‘यह ले – खा ले – बच्चे!’ कृष्ण! कहूँगा, ‘तू मेरे ही लिए देहधारण करके आया है।’ ”
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ईश्वर-दर्शन के उपाय
(१)
श्रीरामकृष्ण तथा तान्त्रिक भक्त
आज पौष शुक्ला चतुर्थी है; २ जनवरी १८८४। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में निवास कर रहे हैं। आजकल राखाल, लाटू, हरीश, रामलाल, मास्टर दक्षिणेश्वर में निवास कर रहे हैं।
दिन के तीन बजे का समय होगा – श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए मणि बेलतला से उनके कमरे की ओर आ रहे हैं। वे एक तान्त्रिक भक्त के साथ पश्चिम के बरामदे में बैठे हैं।
मणि ने आकर भूमि पर माथा टेककर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने उन्हें अपने पास बैठने के लिए कहा। सम्भव है, तान्त्रिक भक्त के साथ वार्तालाप करते करते उन्हें भी उपदेश देंगे। श्री महिम चक्रवर्ती ने तान्त्रिक भक्त को श्रीरामकृष्ण का दर्शन करने के लिए भेजा है। भक्त गेरुआ वस्त्र धारण किये हैं।
श्रीरामकृष्ण – (तान्त्रिक भक्त के प्रति) – ये सब तान्त्रिक साधना के अंग हैं; कपाल-पात्र में सुधा का पान करना! उस सुधा को कारणवारि कहते हैं, है न?
तान्त्रिक – जी हाँ!
श्रीरामकृष्ण – ग्यारह पात्र, न?
तान्त्रिक – तीन तोला भर! शव-साधना के लिए।
श्रीरामकृष्ण – पर मैं तो सुरा छू तक नहीं सकता।
तान्त्रिक – आपका सहजानन्द है, यह आनन्द होने पर और फिर क्या चाहिए!
श्रीरामकृष्ण – फिर देखो, मुझे जप-तप भी अच्छे नहीं लगते। सदा स्मरण-मनन रहता है। अच्छा, षट्चक्र क्या चीज है?
तान्त्रिक – जी, वह सब अनेक तीर्थों की तरह है। प्रत्येक चक्र में शिव शक्ति विराजमान हैं, वे आँख से देखे नहीं जाते, शरीर काटने पर भी नहीं मिलते।
| ४२४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २ जनवरी १८८४ |
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मणि चुपचाप सब सुन रहे हैं, उनकी ओर देखकर श्रीरामकृष्ण तान्त्रिक भक्त से पूछ रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (तान्त्रिक के प्रति) – अच्छा, बीजमन्त्र पाये बिना क्या कुछ सिद्ध होता है?
तान्त्रिक – होता है, विश्वास द्वारा – गुरुवाक्य पर विश्वास!
श्रीरामकृष्ण – (मणि की ओर इशारा करके) – विश्वास!
तान्त्रिक भक्त के चले जाने पर ब्राह्म समाज के श्री जयगोपाल सेन आये। श्रीरामकृष्ण उनके साथ वार्तालाप कर रहे हैं। राखाल, मणि आदि भक्तगण पास बैठे हैं। तीसरे पहर का समय है।
श्रीरामकृष्ण – (जयगोपाल के प्रति) – किसी से, किसी मत से विद्वेष नहीं करना चाहिए। निराकारवादी, साकारवादी, सभी उन्हीं की ओर जा रहे हैं; ज्ञानी, योगी, भक्त सभी उन्हें खोज रहे हैं। ज्ञानमार्ग के लोग कहते हैं, ब्रह्म; योगीगण कहते हैं आत्मा, परमात्मा; भक्तगण कहते हैं, भगवान; फिर यह भी है, नित्यदेव नित्यदास।
जयगोपाल – कैसे जानूँ कि सभी पथ सत्य हैं?
श्रीरामकृष्ण – किसी एक पथ से ठीक-ठीक जा सकने पर उनके पास पहुँचा जा सकता है, उस समय सभी पथों का पता भी जाना जा सकता है। जैसे एक बार किसी तरह यदि छत पर उठना सम्भव हो सके, तो लकड़ी की सीढ़ी से भी उतरा जा सकता है, पक्की सीढ़ी से भी, एक बाँस के सहारे भी और एक रस्सी के द्वारा भी।
“उनकी कृपा होने पर भक्त सब कुछ जान सकता है। उन्हें एक बार प्राप्त करने पर सब कुछ जान सकोगे। एक बार किसी भी तरह बड़े बाबू के साथ साक्षात्कार करना चाहिए, उनसे बातचीत करनी चाहिए – तब बाबू स्वयं ही बता देंगे कि उनके कितने बगीचे, तालाब, या कम्पनी के काग़ज़ हैं।”
ईश्वर-दर्शन के उपाय
जयगोपाल – उनकी कृपा कैसे होती है?
श्रीरामकृष्ण – सदा उनके नाम व गुणों का कीर्तन करना चाहिए, जहाँ तक सम्भव हो सांसारिक चिन्तन का त्याग करना चाहिए। तुम खेती करने के लिए अनेक कष्ट से खेत में जल ला रहे हो, परन्तु खेत की मेंड़ पर के एक छेद में से सब जल बाहर निकल जा रहा है। तब तो नाली काटकर जल लाना व्यर्थ हुआ, वृथा श्रम ही हुआ।
“चित्तशुद्धि होने पर, विषय-भोग की आसक्ति दूर हो जाने पर व्याकुलता आयेगी। तुम्हारी प्रार्थना ईश्वर के पास पहुँचेगी। टेलिग्राफ का तार टूटा रहने पर अथवा उसमें अन्य कोई दोष रहने पर तार का समाचार नहीं पहुँचेगा।
२ जनवरी, १८८४ परिच्छेद ७३ ४२५
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“मैं व्याकुल होकर एकान्त में रोता था। ‘कहाँ हो नारायण’ कह कर रोता था। रोते-रोते बाह्य ज्ञान लुप्त हो जाता था। मैं महावायु में लीन हो जाता था।
“योग कैसे होता है? टेलिग्राफ का तार टूटा न रहने पर या उसमें कोई दोष न रहने पर होता है। विषयों के प्रति आसक्ति का एकदम त्याग।
“किसी प्रकार की कामना-वासना नहीं रखनी चाहिए। कामना-वासना रहने पर उसे सकाम भक्ति कहते हैं, निष्काम भक्ति को अहेतुकी भक्ति कहते हैं। तुम प्यार करो या न करो फिर भी मैं तुम्हें प्यार करता हूँ – इसीका नाम है अहेतुक प्रेम!
“बात यह है, – उनसे प्रेम करना। प्रेम गहरा होने पर दर्शन होता है। पति पर सती का आकर्षण, सन्तान पर माँ का आकर्षण और विषयप्रिय व्यक्ति का सांसारिक विषयों के प्रति आकर्षण – ये तीन आकर्षण यदि एक ही साथ हो तो ईश्वर का दर्शन होता है।”
जयगोपाल विषयप्रिय व्यक्ति है, क्या इसीलिए श्रीरामकृष्ण उन्हीं के योग्य ये सब उपदेश दे रहे हैं?
ज्ञान-पथ और विचार-पथ। भक्तियोग और ब्रह्मज्ञान
श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में बैठे हुए हैं। रात के आठ बजे होंगे। आज पूस की शुक्ला पञ्चमी है; बुधवार, २ जनवरी, १८८४। कमरे में राखाल और मणि हैं। श्रीरामकृष्ण के साथ रहने का मणि का आज इक्कीसवाँ दिन है।
श्रीरामकृष्ण ने मणि को तर्क-विचार करने से मना किया है।
श्रीरामकृष्ण – (राखाल से) – ज्यादा तर्क-विचार करना अच्छा नहीं। पहले ईश्वर है, फिर संसार। उन्हें पा लेने पर उनके संसार के सम्बन्ध में भी ज्ञान हो जाता है।
(मणि और राखाल से) “यदु मल्लिक से बातचीत करने पर उसके कितने मकान हैं, कितने बगीचे हैं, कम्पनी के कागजात कितने हैं – यह सब समझ में आ जाता है।
“इसीलिए तो ऋषियों ने वाल्मीकि को ‘मरा-मरा’ जपने के लिए उपदेश दिया था। इसका एक विशेष अर्थ है। ‘म’ का अर्थ है ईश्वर और ‘रा’ का अर्थ संसार, – पहले ईश्वर, फिर संसार।
“कृष्णकिशोर ने कहा था, ‘मरा-मरा’ शुद्ध मन्त्र है; क्योंकि वह ऋषि का दिया हुआ है। ‘म’ अर्थात् ईश्वर और ‘रा’ अर्थात् संसार।
“इसीलिए वाल्मीकि की तरह पहले सब कुछ छोड़कर निर्जन में व्याकुल हो रो-रोकर ईश्वर को पुकारना चाहिए। पहले आवश्यक है ईश्वर-दर्शन। उसके बाद है तर्क-विचार – शास्त्र और संसार के सम्बन्ध में।
(मणि के प्रति) “इसीलिए तुमसे कहता हूँ, अब और अधिक तर्क-विचार न करना। यही बात कहने के लिए मैं झाऊतल्ले से उठकर आया हूँ। ज्यादा तर्कविचार करने
४२६ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जनवरी, १८८४
पर अन्त में हानि होती है। अन्त में हाजरा की तरह हो जाओगे। मैं रात में अकेला रास्ते पर रो-रोकर टहलता और कहता था, 'माँ, मेरी विचार-बुद्धि पर वज्रप्रहार कर दो।'
"कहो, अब तो तर्क-विचार न करोगे?"
मणि – जी नहीं।
श्रीरामकृष्ण – भक्ति से ही सब कुछ प्राप्त होता है। जो लोग ब्रह्मज्ञान चाहते हैं, यदि वे भक्तिमार्ग पकड़े रहें, तो उन्हें ब्रह्मज्ञान भी हो जाता है।
"उनकी दया रहने पर क्या कभी ज्ञान का अभाव भी होता है? उस देश में (कामारपुकुर में) धान नापते हैं। जब राशि चुक जाती है, तब एक आदमी और धान ठेल देता है, इस तरह राशि फिर तैयार हो जाती है। माँ ही ज्ञान की राशि पूरी करती जाती हैं।
"उन्हें प्राप्त कर लेने पर पण्डितगण सब घास-पात की तरह जान पड़ते हैं। पद्मलोचन ने कहा था, तुम्हारे साथ अछूतों के घर की सभा में भी जाऊँगा, इसमें भला हर्ज ही क्या है? – तुम्हारे साथ चमार के यहाँ भी जाकर मैं भोजन कर सकता हूँ।
"भक्ति के द्वारा सब मिलते हैं। उन्हें प्यार कर सकने पर फिर किसी चीज का अभाव नहीं रह जाता। माता भगवती के पास कार्तिकेय और गणेश बैठे हुए थे। उनके गले में मणियों की माला पड़ी थी। माता ने कहा, जो पहले इस ब्रह्माण्ड की परिक्रमा करके आ जायगा, उसी को मैं यह माला दे दूँगी। कार्तिक उसी समय फौरन ही मयूर पर चढ़कर चल दिये। गणेश ने धीरे-धीरे माता की परिक्रमा करके उन्हें प्रणाम किया। गणेश जानते थे, माता के भीतर ही ब्रह्माण्ड है। माँ ने प्रसन्न होकर गणेश को हार पहना दिया। बड़ी देर बाद कार्तिक ने आकर देखा कि उनके दादा हार पहने हुए बैठे थे।
"मैंने माँ से रो-रोकर कहा था, 'माँ! वेद-वेदान्त में क्या है, मुझे बता दो, – पुराण-तन्त्रों में क्या है, मुझे बता दो।'
"उन्होंने मुझे सब कुछ बता दिया है – कितनी बातें दिखायी हैं।
"सच्चिदानन्द गुरु को रोज प्रातःकाल पुकारते हो न?"
मणि – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – गुरु कर्णधार हैं। फिर देखा, 'मैं' एक अलग हूँ, 'तुम' एक अलग। फिर कूदा और मछली बन गया। देखा कि सच्चिदानन्द-समुद्र में आनन्दपूर्वक विचर रहा हूँ।
"ये सब बड़ी ही गुह्य कथाएँ हैं। तर्क-विचार करके क्या समझोगे? वे जब दिखा देते हैं, तब सब प्राप्त होता है, किसी वस्तु का अभाव नहीं रहता।"
शुक्रवार, ४ जनवरी १८८४ ई.। दिन के चार बजे के समय श्रीरामकृष्ण पंचवटी में बैठे हैं। मुख पर हँसी है और साथ हैं मणि, हरिपद आदि। हरिपद के साथ स्व. आनन्द चॅटर्जी के बारे में बातें हो रही हैं और घोषपाड़ा के साधन-भजन की बातें।
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धीरे-धीरे श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आकर बैठे हैं। मणि, हरिपद, राखाल आदि भक्तगण भी उनके साथ रहते हैं। मणि अधिक समय बेलतला में रहते हैं।
साधनाकाल में श्रीरामकृष्ण के दर्शन
श्रीरामकृष्ण – एक दिन दिखाया चारों ओर शिव और शक्ति! शिव और शक्ति का रमण! मनुष्यों, जीव-जन्तुओं, वृक्षों और लताओं – सभी में वही शिव और शक्ति – पुरुष और प्रकृति – सर्वत्र इन्हीं का रमण।
“दूसरे दिन दिखाया कि नर-मुण्डों की राशि लगी हुई है! – पर्वताकार – और कहीं कुछ नहीं! उनके बीच में मैं अकेला बैठा हुआ हूँ।
“और एक बार दिखाया, महासमुद्र, मैं नमक का पुतला होकर उसकी थाह लेने जा रहा हूँ! थाह लेते समय श्रीगुरुकृपा से पत्थर बन गया! देखा, एक जहाज़ आ रहा है, बस उमड़ पड़ा! – श्रीगुरुदेव कर्णधार थे।”
श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – और अधिक विचार न करो। उससे अन्त में हानि होती है। उन्हें बुलाते समय किसी एक भाव का सहारा लेना पड़ता है – सखीभाव, दासीभाव, सन्तानभाव या वीरभाव।
“मेरा सन्तानभाव है। इस भाव को देखने पर मायादेवी रास्ता छोड़ देती हैं – शर्म से!
“वीरभाव बहुत कठिन है। शाक्त तथा वैष्णव बाउलों का है। उस भाव में स्थिर रहना बहुत कठिन है। फिर हैं – शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य तथा मधुरभाव। मधुरभाव में – शान्त, दास्य, सख्य और वात्सल्य – सब हैं। (मणि के प्रति) तुम्हें कौन भाव अच्छा लगता है?”
मणि – सभी भाव अच्छे लगते हैं।
श्रीरामकृष्ण – सब भाव सिद्ध स्थिति में अच्छे लगते हैं। उस स्थिति में काम की गन्ध तक नहीं रहेगी। वैष्णव-शास्त्र में चण्डीदास तथा धोबिन की कथा है – उनके प्रेम में काम की गन्ध तक न थी।
“इस स्थिति में प्रकृतिभाव होता है।
“अपने को पुरुष मानने की बुद्धि नहीं रहती। मीराबाई के स्त्री होने के कारण रूप गोस्वामीजी उनसे मिलना नहीं चाहते थे। मीराबाई ने कहला भेजा, ‘श्रीकृष्ण ही एकमात्र पुरुष है; वृन्दावन में सभी लोग उस पुरुष की दासियाँ हैं।’ क्या गोस्वामीजी को पुरुषत्व का अभिमान करना उचित था?
सायंकाल के बाद मणि फिर श्रीरामकृष्ण के चरणों के पास बैठे हैं। समाचार आया है कि श्री केशव सेन की अस्वस्थता बढ़ गयी है। उन्हीं के सम्बन्ध में वार्तालाप के
४२८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ जनवरी, १८८४
सिलसिले में ब्राह्म समाज की बातें हो रही हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – हाँ, जी, उनके यहाँ क्या केवल व्याख्यान ही होते हैं, या ध्यान भी? वे अपनी प्रार्थना को शायद कहते हैं ‘उपासना’।
“केशव ने पहले ईसाई धर्म, ईसाई मत का बहुत चिन्तन किया था – उस समय तथा उससे पूर्व वे देवेन्द्र ठाकुर के यहाँ थे।”
मणि – केशव बाबू यदि पहले-पहल यहाँ आये होते, तो समाजसंस्कार पर माथापच्ची न करते। जातिभेद को उठा देना, विधवा विवाह, असवर्ण विवाह, स्त्री-शिक्षा आदि सामाजिक कामों में उतने व्यस्त न होते।
श्रीरामकृष्ण – केशव अब काली मानते हैं – चिन्मयी काली – आद्याशक्ति। और माँ माँ कहकर उनके नामगुणों का कीर्तन करते हैं। अच्छा, क्या ब्राह्म समाज बाद में सिर्फ सामाजिक संस्कार की ही एक संस्था बन जायगा?
मणि – इस देश की जमीन वैसी नहीं है। जो ठीक है वही यहाँ पर जड़ पा सकेगा।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, सनातन धर्म, ऋषिलोग जो कुछ कह गये हैं वही रह जायगा। तथापि ब्राह्म समाज और उसी प्रकार के सम्प्रदाय भी कुछ-कुछ रहेंगे। सभी ईश्वर की इच्छा से हो रहे हैं, जा रहे हैं।
दोपहर के बाद कलकत्ते से कुछ भक्त आये हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को अनेक गीत सुनाये थे। उनमें से एक गीत का भावार्थ यह है – ‘माँ, तुमने हमारे मुँह में लाल चुसनी देकर भुला रखा है; हम जब चुसनी फेंककर चिल्लाकर रोयेंगे तब तुम हमारे पास अवश्य ही दौड़कर आओगी।’
श्रीरामकृष्ण – (मणि के प्रति) – उन्होंने लाल चुसनी का नया ही गाना गाया।
मणि – जी, आपने केशव सेन से इस लाल चुसनी की बात कही थी।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, और चिदाकाश की बात – और भी कई बातें हुआ करती थीं – और बड़ा आनन्द होता था। गाना – नृत्य सब होता था।
□ □ □
परिच्छेद ७४
परिच्छेद ७४
मणि के प्रति उपदेश
(१)
कामिनी-काञ्चन-त्याग
श्रीरामकृष्ण दोपहर का भोजन कर चुके हैं। एक बजे का समय होगा। शनिवार, ५ जनवरी १८८४ ई.। मणि को श्रीरामकृष्ण के साथ रहते हुए आज २३ वाँ दिन है।
मणि भोजन करके नौबतखाने में थे, वहीं से किसी को नाम लेकर पुकारते हुए सुना। बाहर आकर उन्होंने देखा कि घर के उत्तरवाले लम्बे बरामदे से श्रीरामकृष्ण स्वयं उन्हें पुकार रहे थे। मणि ने आकर उन्हें प्रणाम किया।
दक्षिण के बरामदे में श्रीरामकृष्ण मणि से वार्तालाप कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – तुम लोग किस तरह ध्यान करते हो? – मैं तो बेल के नीचे कितने ही रूप साफ साफ देखता था। एक दिन देखा, सामने रुपये, दुशाला, एक थाल, सन्देश और दो औरतें! तब मैंने मन से पूछा, मन! तू इनमें से कुछ चाहता है? – फिर सन्देशों को देखा, विष्ठा है! औरतों में एक बुलाक पहने हुए थी। उनका भीतर बाहर सब मुझे दीख पड़ता था – आँतें-मल-मूत्र-हाड़-मांस-खून! मन ने कुछ न चाहा।
“मन उन्हीं के पाद-पद्मों में लगा रहा। निक्ती (काँटेवाला तराजू) के नीचे भी काँटा होता है और ऊपर भी। मन नीचेवाला काँटा है। मुझे सदा ही भय लगा रहता था कि कहीं ऐसा न हो कि ऊपरवाले काँटे से (ईश्वर से) मन विमुख हो जाय। तिस पर एक आदमी सदा ही हाथ में त्रिशूल लिये मेरे पास बैठा रहता था। उसने डराया, कहा, नीचेवाला काँटा ऊपरवाले काँटे से इधर-उधर झुका नहीं कि यही त्रिशूल भोंक दूँगा।
“बात यह है कि कामिनी-कांचन का त्याग हुए बिना कुछ होने का नहीं। मैंने तीन त्याग किये थे – जमीन, जोरू और रुपया। भगवान रघुवीर के नाम की जमीन रजिस्ट्री कराने के लिए मुझे उस देश में (कामारपुकुर में) जाना पड़ा था। मुझसे दस्तखत करने के लिए कहा गया। मैंने दस्तखत नहीं किये। मुझे यह ख्याल था ही नहीं कि यह मेरी जमीन है। रजिस्ट्री आफिसवालों ने केशव सेन का गुरु समझकर मेरा खूब आदर किया था। आम ला दिये, परन्तु घर ले जाने का अख्तियार था ही नहीं, क्योंकि संन्यासी को संचय नहीं
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४३० श्री श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ जनवरी, १८८४
करना चाहिए।
“त्याग के बिना कोई कैसे उन्हें पा सकता है? अगर एक वस्तु के ऊपर दूसरी वस्तु रखी हो, तो पहली वस्तु को बिना हटाये दूसरी वस्तु कैसे मिल सकती है?
“निष्काम होकर उन्हें पुकारना चाहिए। परन्तु सकाम भजन करते करते भी निष्काम भजन होता है। ध्रुव ने राज्य के लिए तपस्या की थी, परन्तु उन्होंने ईश्वर को प्राप्त किया था। उन्होंने कहा था, अगर कोई काँच के लिए आकर कांचन पा जाय तो उसे क्यों छोड़े?
दया-दान आदि और श्रीरामकृष्ण। श्रीचैतन्य देव का दान
“सत्त्वगुण के पाने पर मनुष्य ईश्वर को पाता है। संसारी मनुष्यों के दानादि कर्म प्रायः सकाम ही होते हैं। यह अच्छा नहीं। निष्काम कर्म करना ही अच्छा है। परन्तु निष्काम भाव से करना है बड़ा कठिन।
“ईश्वर से भेंट होने पर क्या उनसे यह प्रार्थना करोगे कि मैं कुछ तालाब खुदवाऊँगा? या रास्ता, घाट, दवाखाना और अस्पताल बनवाऊँगा? क्या उनसे कहोगे, हे ईश्वर, मुझे ऐसा वर दीजिये कि मैं यही सब करूँ? उनका दर्शन होने पर ये सब वासनाएँ एक ओर पड़ी रहती हैं।
“परन्तु इसलिए क्या दया और दान के कर्म ही न करना चाहिए?
“नहीं, यह बात नहीं। आँखों के आगे दुःख और विपत्ति देखकर धन के रहते सहायता आवश्यक करनी चाहिए। ऐसे समय ज्ञानी कहता है, 'दे, इसे कुछ दे।' परन्तु भीतर ही भीतर 'मैं क्या कर सकता हूँ - कर्ता ईश्वर ही हैं, अन्य सब अकर्ता हैं' - ऐसा बोध उसे होता रहता है।
“महापुरुषगण जीवों के दुःख से दुःखी होकर उन्हें ईश्वर का मार्ग बतला जाते हैं। शंकराचार्य ने जीवों की शिक्षा के लिए 'विद्या का अहं' रखा था।
“अन्नदान की अपेक्षा ज्ञानदान और भक्तिदान अधिक ऊँचा है। चैतन्यदेव ने इसीलिए चाण्डालों तक में भक्ति का वितरण किया था। देह का सुख और दुःख तो लगा ही है। यहाँ आम खाने के लिए आये हो, आम खा जाओ। आवश्यकता ज्ञान और भक्ति की है। ईश्वर ही वस्तु है, और सब अवस्तु।
क्या स्वाधीन इच्छा (Free Will) है? श्रीरामकृष्ण का सिद्धान्त
“सब कुछ वे ही कर रहे हैं। अगर यह कहो कि सब कुछ उनके मत्थे मढ़कर फिर तो मनुष्य खूब पाप कर सकता है, तो यह ठीक न होगा; क्योंकि जिसने यह समझा है कि ईश्वर ही कर्ता है और जीव अकर्ता, उसका पैर कभी बेताल नहीं पड़ सकता।
“इंग्लिशमैन जिसे स्वाधीन इच्छा (Free Will) कहते हैं, वह उन्हींने दे रखी है।
“जिन लोगो ने उन्हें नहीं पाया, उनमें अगर इस स्वाधीन इच्छा का बोध न होता
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तो उनसे पाप की वृद्धि हो सकती थी। अपने दोषों से मैं पाप कर रहा हूँ – यह ज्ञान अगर उन्होंने न दिया होता तो पाप की और भी वृद्धि होती।
“जिन्होंने उन्हें पा लिया है, वे जानते हैं स्वाधीन इच्छा नाममात्र की है। वास्तव में वे ही यन्त्री हैं, मैं केवल यन्त्र हूँ; वे इंजिनियर हैं, मैं गाड़ी!”
(२)
दिन का पिछला पहर हैं। चार बजे का समय होगा। पंचवटीवाले कमरे में श्रीयुत राखाल तथा और भी दो-एक भक्त मणि का कीर्तन सुन रहे हैं।
गाना सुनकर राखाल को भावावेश हो गया है।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण पंचवटी में आये। उनके साथ बाबूराम और हरीश हैं।
राखाल – इन्होंने कीर्तन सुनाकर हम लोगों को खूब प्रसन्न किया।
श्रीरामकृष्ण भावावेश में गा रहे हैं – 'ऐ सखि, कृष्ण का नाम सुनकर मेरे जी में जी आ गया।' श्रीरामकृष्ण ने कहा, यही सब गाना चाहिए – 'सब सखि मिलि बैठला' फिर कहा – बात यही है कि भक्ति और भक्तों को लेकर रहना चाहिए।
“श्रीकृष्ण के मथुरा जाने पर यशोदा राधिका के पास गयी थीं। राधिका उस समय ध्यान में थीं। फिर उन्होंने यशोदा से कहा, मैं आदिशक्ति हूँ। तुम मुझसे वरयाचना करो। यशोदा ने कहा – वर और क्या दोगी, – यही कहो जिससे मन, वचन और कर्मों से उनकी सेवा कर सकूँ – इन्हीं आँखों से उनके भक्तों के दर्शन हों – इस मन से उनका ध्यान और उनका चिन्तन हो और वाणी से उनके नाम और गुणों का कीर्तन हो।
“परन्तु जिनकी भक्ति दृढ़ हो गयी है, उनके लिए भक्तों का संग न होने पर भी कुछ हर्ज नहीं है। कभी कभी तो भक्तों से विरक्ति भी हो जाती है। बहुत चिकनी दीवाल पर से चूनाकारी धस जाती है। अर्थात् वे जिनके अन्तर-बाहर सर्वत्र है, उन्हीं की यह अवस्था है।”
श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से लौटकर पंचवटी के नीचे मणि से फिर कह रहे है – “तुम्हारी आवाज स्त्रियों जैसी है। तुम इस तरह के गानों का अभ्यास कर सकते हो? – (भावार्थ) सखि, वह बन कितनी दूर है जहाँ मेरे श्यामसुन्दर हैं?
(बाबूराम की ओर देखकर मणि से) “देखो, जो अपने आदमी हैं, वे पराये हो जाते हैं, – रामलाल तथा और सब लोग अब जैसे कोई दूसरे हों। फिर जो लोग दूसरे हैं, वे अपने हो जाते हैं। देखो न, बाबूराम से कहता हूँ, जंगल जा, हाथ-मुँह धो। अब तो भक्त ही अपने आत्मीय हैं।”
मणि – जी हाँ।
४३२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | ५ जनवरी, १८८४
चित्शक्ति और चिदात्मा
श्रीरामकृष्ण — (पंचवटी की ओर देखकर) — इस पंचवटी में मैं बैठता था — ऐसा भी समय आया कि मुझे उन्माद हो गया! वह समय भी बीत गया! काल ही ब्रह्म है। जो काल के साथ रमण करती है, वही काली है — आद्याशक्ति अटल को टाल देती हैं।
यह कहकर श्रीरामकृष्ण गाने लगे।
(भावार्थ) 'तुम्हारा भाव क्या है, यह सोचते हुए यहाँ तो प्राण ही निकलने पर आ गये! जिनके नाम से काल भी दूर हट जाता है, जिनके पैरों के नीचे महाकाल पड़े हुए हैं, उनका स्वरूप काला क्यों हुआ?'
श्रीरामकृष्ण — आज शनिवार है, आज काली मन्दिर जाना।
बकुल के पेड़ के नीचे आकर श्रीरामकृष्ण मणि से कह रहे हैं — "चिदात्मा और चित्-शक्ति। चिदात्मा पुरुष हैं और चित्-शक्ति प्रकृति। चिदात्मा श्रीकृष्ण हैं और चित्-शक्ति श्रीराधा। भक्तगण उसी चित्-शक्ति के एक-एक स्वरूप हैं। वे सखी-भाव या दासभाव को लेकर रहेंगे। यही असली बात है।"
सन्ध्या हो जाने पर श्रीरामकृष्ण काली-मन्दिर गये। मणि माता का स्मरण कर रहे हैं, यह देखकर श्रीरामकृष्ण प्रसन्न हुए।
सब देवालयों में आरती हो गयी। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में तख्त पर बैठे हुए माता का स्मरण कर रहे हैं। जमीन पर सिर्फ मणि बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये हैं।
कुछ देर बाद वे समाधि से उतरने लगे; परन्तु फिर भी अभी भाव पूर्ण मात्रा में हैं। श्रीरामकृष्ण माँ से बातचीत कर रहे हैं, जैसे छोटा बच्चा माँ से दुलार करते हुए बातचीत करता है। माँ से करुण स्वर में कह रहे हैं — "माँ, क्यों तूने वह रूप नहीं दिखाया — वही भुवन-मोहन रूप! कितना मैंने तुझसे कहा। परन्तु कहने से तू सुनेगी काहे को? — तू इच्छामयी जो है।"
श्रीरामकृष्ण ने माँ से ऐसे स्वर में ये बातें कहीं कि जिसे सुनकर पत्थर भी पिघलकर पानी हो जाय!
श्रीरामकृष्ण फिर माँ से बातचीत कर रहे हैं —
"माँ! विश्वास चाहिए! यह साला तर्क-विचार दूर हो जाय! — उसका भरोसा क्या? वह तो जरा-सी बात से बदल जाता है! विश्वास चाहिए — गुरुवाक्य में विश्वास — बालक जैसा विश्वास! — माँ ने कहा, वहाँ भूत है — तो उसने ठीक समझ रखा है कि वहाँ भूत है! माँ ने कहा, वहाँ हौआ है! तो इसीको उसने ठीक समझ रखा है। माँ ने कहा, वह तेरा दादा है, तो समझ लिया कि बस सोलहों आने दादा है! विश्वास चाहिए!