श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५२ श्रीरामकृष्णवचनामृत २ मार्च, १८८४
अगर इच्छा हुई तो खोपड़ा और बीज के निकाल देने से काम न बनेगा। इसी तरह जीव-जगत् को छोड़कर पहले सच्चिदानन्द में जाया जाता है। फिर उन्हें प्राप्त कर लेने पर मनुष्य देखता है, यह सब जीव-जगत् भी वे ही हुए हैं। जिस वस्तु का गूदा है, उसका खोपड़ा और बीज भी है, जैसे मट्ठे का मक्खन और मक्खन का मट्ठा।
“परन्तु कोई-कोई कह सकते हैं कि सच्चिदानन्द इतने कड़े क्यों हो गये - इस पृथ्वी को दबाने से वह बड़ी कठिन जान पड़ती है। इसका उत्तर यह है कि शोणित और शुक्र तो इतना तरल पदार्थ है, परन्तु उन्हीं से इतने मनुष्य, बड़े-बड़े जीव तैयार हो रहे हैं! ईश्वर से सब कुछ हो सकता है। एक बार अखण्ड सच्चिदानन्द तक पहुँचकर फिर वहाँ से उतरकर यह सब देखो।”
संसार और ईश्वर। योगी और भक्त में भेद
“वे ही सब कुछ हुए हैं। संसार उनसे अलग नहीं है। गुरु के पास वेद पढ़कर श्रीरामचंद्र को वैराग्य हो गया। उन्होंने कहा, संसार अगर स्वप्नवत् है तो इसका त्याग करना ही उचित है। इससे दशरथ डरे। उन्होंने राम को समझाने के लिए गुरु वशिष्ठ को भेज दिया। वशिष्ठ ने कहा, 'राम, हमने सुना है - तुम संसार छोड़ना चाहते हो। तुम हमें समझा दो कि संसार ईश्वर से अलग एक वस्तु है। यदि तुम समझा सको कि ईश्वर से संसार नहीं हुआ तो तुम इसे छोड़ सकते हो।' राम तब चुप हो रहे, कोई उत्तर न दे सके।
“सब तत्त्व अन्त में आकाश-तत्त्व में लीन हो जाते हैं। सृष्टि के समय आकाश-तत्त्व से महत्-तत्त्व, महत्-तत्त्व से अहंकार, ये सब क्रमशः तैयार हुए हैं। अनुलोम और विलोम। भक्त इन सब को मानते हैं। भक्त अखण्ड सच्चिदानन्द को भी मानते हैं और जीव-जगत् को भी।
“परन्तु योगी का मार्ग अलग है। वह परमात्मा में पहुँचकर फिर वहाँ से नहीं लौटता! उसी परमात्मा से युक्त हो जाता है।
“थोड़े के भीतर जो ईश्वर को देखता है, उसे खण्ड ज्ञानी कहते हैं। वह सोचता है, उसके परे और उनकी सत्ता नहीं है।
“भक्त तीन श्रेणी के होते हैं। अधम, मध्यम और उत्तम। अधम भक्त कहता है, वे हैं ईश्वर, और ऐसा कहकर आकाश की ओर उँगली उठा देता है। मध्यम भक्त कहता है, वे हृदय में अन्तर्यामी के रूप में विराजमान हैं। उत्तम भक्त कहता है वे ही यह सब हुए हैं, - जो कुछ मैं देख रहा हूँ, सब उन्हीं के एक-एक रूप हैं। नरेन्द्र पहले मजाक करके कहता था, अगर वे ही सब कुछ हुए हैं तो ईश्वर लोटा भी है और थाली भी। (सब हँसते हैं)