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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

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पृष्ठ 476
२ मार्च १८८४परिच्छेद ७७४५३

ईश्वरदर्शन और कर्मत्याग। विराट् शिव।

“परन्तु उनके दर्शन होने पर सब संशय दूर हो जाते हैं। सुनना एक बात है और देखना दूसरी बात। सुनने से सोलहों आना विश्वास नहीं होता। साक्षात्कार हो जाने पर फिर विश्वास में कुछ बाकी नहीं रह जाता।

“ईश्वर-दर्शन करने पर कर्मों का त्याग हो जाता है। इसी तरह मेरी पूजा बन्द हो गयी। काली-मन्दिर में पूजा करता था, एकाएक माँ ने दिखाया, सब चिन्मय है – पूजा की चीजें, वेदी – मन्दिर की चौखट – सब चिन्मय है। मनुष्य, जीव, वस्तु, सब चिन्मय है। तब पागल की तरह चारों ओर फूल फेंकने लगा! जो कुछ दृष्टि में आता, उसी की पूजा करने लगा!

“एक दिन पूजा करते समय शिवजी के मस्तक पर चन्दन लगा रहा था, उसी समय दिखलाया, यह विराट् मूर्ति – यह विश्व ही शिव है। तब शिव-लिंग तैयार करके पूजा करना बन्द हो गया। मैं फूल तोड़ रहा था, उसी समय मुझे दिखलाया – फूल के पेड़ फूल के एक एक गुच्छे हैं।”

काव्यरस और ईश्वर-दर्शन में भेद

त्रैलोक्य – अहा! ईश्वर की रचना कैसी सुन्दर है!

श्रीरामकृष्ण – नहीं जी, आँखों के आगे पेड़ एकाएक फूल के गुच्छे बन गये – यह कुछ मेरा केवल मानसिक भाव ही नहीं था। दिखा दिया, एक एक फूल का पेड़ एक एक गुच्छा है और उस विराट् मूर्ति के सिर पर शोभायमान हो रहा है। उसी दिन से फूल तोड़ना बन्द हो गया। आदमी को भी मैं उसी रूप में देखता हूँ। मानो वेही मनुष्य के आकार में झूम-झूमकर टहल रहे हैं। मानो तरंग पर एक तकिया बह रहा है – इधर उधर हिलता हुआ चला जा रहा है, लहर के लगने पर कभी कभी ऊँचा चढ़ जाता है और फिर लहर के साथ नीचे आ जाता है।

“शरीर दो दिन के लिए है। वही ईश्वर सत्य है। शरीर तो अभी अभी है, अभी अभी नहीं। बहुत दिन हुए, जब पेट की बीमारी से बड़ी तकलीफ मिल रही थी, हृदय ने कहा, माँ से एक बार कहते क्यों नहीं जिससे अच्छे हो जाओ! रोग के लिए मुझे कहते हुए बड़ी लज्जा लगी। मैंने कहा, माँ! सोसायटी (Asiatic Society) में मैंने आदमी का अस्थिपंजर (Skeleton) देखा था, तारों से जोड़कर आदमी के आकार का बनाया गया था, माँ, बस केवल उतना ही इस शरीर को रहने दो, अधिक मैं नहीं चाहता। मैं तुम्हारा नाम लेता रहूँ – तुम्हारे गुण कीर्तन करता रहूँ, उतनी ही इच्छा है।

“बचने की इच्छा क्यों है? जब रावण मारा गया तब राम और लक्ष्मण लङ्का के भीतर गये। जहाँ रावण रहता था, वहाँ जाकर देखा, उन्हें देख रावण की माँ निकषा भाग

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