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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 477

४५४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २ मार्च, १८८४

रही थी। इससे लक्ष्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने राम से कहा, 'भाई! जिसके वंश में अब कोई भी नहीं रह गया, उसे भी शरीर की इतनी ममता है।' राम ने निकषा को अपने पास बुलाकर उससे कहा, 'तुम डरो मत, परन्तु यह बतलाओ कि तुम भाग क्यों रही थी?' निकषा ने कहा, 'राम! मैं इसलिए नहीं भागी कि मुझे देह की प्रीति है, नहीं, मैं बची थी, इसीलिए तो तुम्हारी इतनी लीलाएँ देखीं - यदि और भी कुछ दिन बची रहूँगी तो तुम्हारी और न जाने कितनी लीलाएँ देखूँगी! इसीलिए मुझे बचने की लालसा है।'

"वासना के बिना रहे शरीर धारण नहीं हो सकता।

(सहास्य) - "मुझे भी दो-एक इच्छाएँ थीं। मैंने कहा था, 'माँ, कामिनी-कांचन-त्यागियों का सत्संग मुझे दो। और ज्ञानी और भक्तों का सत्संग करूँगा। अतएव कुछ शक्ति भी दे दे, जिससे कुछ चल सकूँ - यहाँ-वहाँ जा सकूँ।' परन्तु उसने चलने की शक्ति नहीं दी।"

त्रैलोक्य - (सहास्य) - साध मिटी?

श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - कुछ बाकी है। (सब हँसते हैं।)

"शरीर दो दिन के लिए है। हाथ जब टूट गया तब माँ से मैंने कहा - 'माँ! बड़ा दर्द हो रहा है!' तब उसने दिखाया, गाड़ी है और उसका इंजीनियर। गाड़ी के पुर्जे कहीं कहीं खुल गये थे! इंजीनियर जैसा चलाता है, गाड़ी वैसे ही चल रही है। उसकी अपनी कोई शक्ति नहीं है।

"फिर देह की देखभाल क्यों करता हूँ? इच्छा है, ईश्वर को लेकर आनन्द करूँ, उनका नाम लूँ, - उनके गुण गाऊँ, उनके ज्ञानियों और भक्तों को देखता फिरूँ।"

(२)

देह का सुख-दुःख

नरेन्द्र जमीन पर सामने बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण - (त्रैलोक्य और भक्तों से) - देह के लिए सुख-दुःख तो लगा ही है। देखो न, नरेन्द्र के पिता का देहान्त हो गया, घरवाले सब बड़ी तकलीफ पा रहे हैं, परन्तु कोई उपाय नहीं हो रहा है। वे कभी सुख में रहते हैं, कभी दुःख में।

त्रैलोक्य - जी, नरेन्द्र पर ईश्वर की दया होगी।

श्रीरामकृष्ण - (हँसते हुए) - और कब होगी! काशी में अन्नपूर्णा के यहाँ कोई भूखा नहीं रहता, परन्तु किसी किसी को शाम तक बैठा रहना पड़ता है। हृदय ने शम्भू मल्लिक से कहा था, मुझे कुछ रुपये दो। शम्भू मल्लिक अंग्रेजी मत का आदमी है। उसने कहा, 'तुम्हें क्यों रुपये दूँ? तुम मेहनत करके उपार्जन कर सकते हो। तुम कुछ रोजगार तो करते ही हो। हाँ, बहुत गरीब कोई हो, तो उसकी बात और है। अथवा अन्धे-लँगड़े-