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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

४५४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २ मार्च, १८८४

रही थी। इससे लक्ष्मण को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने राम से कहा, 'भाई! जिसके वंश में अब कोई भी नहीं रह गया, उसे भी शरीर की इतनी ममता है।' राम ने निकषा को अपने पास बुलाकर उससे कहा, 'तुम डरो मत, परन्तु यह बतलाओ कि तुम भाग क्यों रही थी?' निकषा ने कहा, 'राम! मैं इसलिए नहीं भागी कि मुझे देह की प्रीति है, नहीं, मैं बची थी, इसीलिए तो तुम्हारी इतनी लीलाएँ देखीं - यदि और भी कुछ दिन बची रहूँगी तो तुम्हारी और न जाने कितनी लीलाएँ देखूँगी! इसीलिए मुझे बचने की लालसा है।'

"वासना के बिना रहे शरीर धारण नहीं हो सकता।

(सहास्य) - "मुझे भी दो-एक इच्छाएँ थीं। मैंने कहा था, 'माँ, कामिनी-कांचन-त्यागियों का सत्संग मुझे दो। और ज्ञानी और भक्तों का सत्संग करूँगा। अतएव कुछ शक्ति भी दे दे, जिससे कुछ चल सकूँ - यहाँ-वहाँ जा सकूँ।' परन्तु उसने चलने की शक्ति नहीं दी।"

त्रैलोक्य - (सहास्य) - साध मिटी?

श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - कुछ बाकी है। (सब हँसते हैं।)

"शरीर दो दिन के लिए है। हाथ जब टूट गया तब माँ से मैंने कहा - 'माँ! बड़ा दर्द हो रहा है!' तब उसने दिखाया, गाड़ी है और उसका इंजीनियर। गाड़ी के पुर्जे कहीं कहीं खुल गये थे! इंजीनियर जैसा चलाता है, गाड़ी वैसे ही चल रही है। उसकी अपनी कोई शक्ति नहीं है।

"फिर देह की देखभाल क्यों करता हूँ? इच्छा है, ईश्वर को लेकर आनन्द करूँ, उनका नाम लूँ, - उनके गुण गाऊँ, उनके ज्ञानियों और भक्तों को देखता फिरूँ।"

(२)

देह का सुख-दुःख

नरेन्द्र जमीन पर सामने बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण - (त्रैलोक्य और भक्तों से) - देह के लिए सुख-दुःख तो लगा ही है। देखो न, नरेन्द्र के पिता का देहान्त हो गया, घरवाले सब बड़ी तकलीफ पा रहे हैं, परन्तु कोई उपाय नहीं हो रहा है। वे कभी सुख में रहते हैं, कभी दुःख में।

त्रैलोक्य - जी, नरेन्द्र पर ईश्वर की दया होगी।

श्रीरामकृष्ण - (हँसते हुए) - और कब होगी! काशी में अन्नपूर्णा के यहाँ कोई भूखा नहीं रहता, परन्तु किसी किसी को शाम तक बैठा रहना पड़ता है। हृदय ने शम्भू मल्लिक से कहा था, मुझे कुछ रुपये दो। शम्भू मल्लिक अंग्रेजी मत का आदमी है। उसने कहा, 'तुम्हें क्यों रुपये दूँ? तुम मेहनत करके उपार्जन कर सकते हो। तुम कुछ रोजगार तो करते ही हो। हाँ, बहुत गरीब कोई हो, तो उसकी बात और है। अथवा अन्धे-लँगड़े-

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लूले को कुछ देने से ठीक भी है।' तब हृदय ने कहा, 'महाशय, बस यह बात न कहियेगा। मुझे रुपयों की जरूरत नहीं। ईश्वर करें, मुझे अन्धा-लँगड़ा-लूला या दरिद्र न होना पड़े। न अब आपके देने का काम है और न मेरे लेने का।'

ईश्वर नरेन्द्र पर अब भी दया नहीं करते, इस पर मानो अभिमान करके श्रीरामकृष्ण ने यह बात कही। श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र की ओर स्नेह की दृष्टि से देख रहे हैं।

नरेन्द्र – मैं ‘नास्तिकवाद’ पढ़ रहा हूँ।

श्रीरामकृष्ण – दो हैं – ‘अस्ति’ और ‘नास्ति’। ‘अस्ति को ही क्यों नहीं लेते?’

सुरेन्द्र – ईश्वर तो बड़े न्यायी हैं, वे क्या भक्त की देखभाल न करेंगे?

श्रीरामकृष्ण – शास्त्रों में है, पूर्वजन्म में जो लोग दान आदि करते हैं, उन्हीं को धन मिलता है; परन्तु बात यह है कि संसार उनकी माया है, माया के राज्य में बड़ा गोलमाल है, कुछ समझ में नहीं आता।

“ईश्वर का काम कुछ समझा नहीं जाता। भीष्मदेव शरशय्या पर लेटे हुए थे। पाण्डव उन्हें देखने गये। साथ में श्रीकृष्ण भी थे। आये तो थोड़ी देर बाद उन्होंने देखा, भीष्म रो रहे थे। पाण्डवों ने श्रीकृष्ण से कहा, 'कृष्ण, यह बड़े आश्चर्य की बात है! पितामह अष्ट वसुओ में एक हैं, उनकी तरह ज्ञानी देखने में नहीं आते, परन्तु ये भी मृत्यु के समय माया में पड़कर रो रहे हैं!' श्रीकृष्ण ने कहा, 'भीष्म इसलिए नहीं रो रहे हैं। इसका कारण उन्हीं से पूछो।' पूछने पर भीष्म ने कहा, 'कृष्ण, ईश्वर के कार्य कुछ समझ न सका। मैं इसलिए रो रहा हूँ कि जिनके साथ साथ साक्षात् नारायण घूम रहे हैं उन पाण्डवों की भी विपत्ति का अन्त नहीं होता! यह बात जब मैं सोचता हूँ तब यही निश्चय होता है कि उनके कार्य का कुछ भी अंश समझ में नहीं आ सकता।'

“मुझे उन्होंने दिखलाया था, जिन्हें वेदों में शुद्धात्मा कहा है, एक वही परमात्मा अटल सुमेरुवत् निर्लिप्त तथा सुख और दुःख से अलग हैं। उनकी माया के कार्यों में बड़ी जटिलता है। किसके बाद क्या होगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।”

सुरेन्द्र – (सहास्य) – और पूर्वजन्म में कुछ दान आदि करने से इस जन्म में धन प्राप्त होता है, तो हमें दान आदि करना चाहिए।

श्रीरामकृष्ण – जिसके पास धन है, उसे दान करना चाहिए। (त्रैलोक्य से) जयगोपाल सेन के धन है, उसे दान करना चाहिए। वह नहीं करता, यह उसके लिए निन्दा की बात है। धन के रहने पर भी कोई कोई बड़े हिसाबी होते हैं – परन्तु इसका क्या ठिकाना कि वह धन किसके हिस्से में पड़ जायगा।

“अभी उस दिन जयगोपाल आया था। गाड़ी पर आया करता है। गाड़ी में फूटी लालटेन और घोड़े मरघट से लौटे हुए – दरवान मेडिकल कालेज के अस्पताल का वापस आया हुआ मरीज – और यहाँ के लिए ले आता है दो सड़े अनार!” (सब

४५६ श्रीरामकृष्णवचनामृत ९ मार्च, १८८४

हँसते हैं।)

सुरेन्द्र – जयगोपाल बाबू ब्राह्म-समाजी हैं। मेरी समझ में शायद केशव के सम्प्रदाय में अब कोई भी ढंग का आदमी नहीं रह गया है। विजय गोस्वामी, शिवनाथ तथा अन्य बाबुओं ने मिलकर साधारण ब्राह्मसमाज की स्थापना की है।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – गोविन्द अधिकारी अपनी नाटकमण्डली में अच्छा आदमी न रखता था – हिस्सा देने का भय जो था। (सब हँसते है।)

“उस दिन केशव के एक शिष्य को मैंने देखा था। केशव के मकान में अभिनय हो रहा था। देखा, वह लड़के को गोद में लेकर नाच रहा है। फिर सुना, व्याख्यान भी देता है। खुद को कौन शिक्षा दे, इसका पता नहीं।”

त्रैलोक्य गाने लगे। गाना जब समाप्त हो गया तब श्रीरामकृष्ण ने उनसे ‘आमाय दे माँ पागल करे’ गाने के लिए कहा।

(२)

रविवार, ९ मार्च १८८४ ई.। श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में मणिलाल मल्लिक, सींती के महेन्द्र कविराज, बलराम, मास्टर, भवनाथ, राखाल, लाटू, अधर, महिमाचरण, हरीश, किशोरी (गुप्त), शिवचन्द्र आदि अनेक भक्तों के साथ बैठे हैं। अभी तक गिरीश, काली, सुबोध आदि नहीं आये हैं। शरत् तथा शशी ने केवल एक-दो बार ही दर्शन किया है। पूर्ण, छोटे नरेन आदि ने भी अभी तक उन्हें नहीं देखा है।

श्रीरामकृष्ण के हाथ में बैण्डेज बँधा हुआ है। रेलिंग के किनारे गिरकर हाथ टूट गया है – उस समय भाव में विभोर हो गये थे। हाल ही में हाथ टूटा है – निरन्तर पीड़ा बनी रहती है।

परन्तु इस स्थिति में भी वे प्रायः समाधिमग्न रहते हैं और भक्तों के साथ गम्भीर तत्त्वों की बातें करते हैं।

एक दिन कष्ट से रो रहे हैं, उसी समय समाधिमग्न हो गये। समाधिभंग होने के बाद महिमाचरण आदि भक्तों से कह रहे हैं, “भाई, सच्चिदानन्द की प्राप्ति न हुई तो कुछ भी न हुआ। व्याकुल हुए बिना कुछ न होगा। मैं रो-रोकर पुकारता था और कहता था, ‘हे दीनानाथ, मेरा साधन-भजन कुछ भी नहीं है, पर मुझे दर्शन देना होगा।’”

उसी दिन रात को फिर महिमाचरण, अधर, मास्टर आदि बैठे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (महिमाचरण के प्रति) – एक प्रकार है – अहेतुकी भक्ति, इसे यदि प्राप्त कर सको!

फिर अधर से कह रहे हैं – “इस हाथ पर जरा हाथ फेर सकते हो?”

मणिलाल मल्लिक तथा भवनाथ प्रदर्शनी की बातें कर रहे हैं जो १८८३-८४ ई.

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में एशियाटिक म्युजियम के पास हुई थी। वे कह रहे हैं, “कितने राजाओं ने मूल्यवान चीजें भेजी हैं; सोने के पलंग आदि देखने योग्य चीजें हैं।”

श्रीरामकृष्ण तथा धन-ऐश्वर्य। योगी का चित्र

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति हँसते हुए) – हाँ, वहाँ जाने पर एक लाभ अवश्य होता है। ये सब सोने की चीजें – राजामहाराजाओं की चीजें देखकर बिलकुल क्षुद्र-सी मालूम होती हैं। यह भी बड़ा लाभ है। जब मैं कलकत्ता आता था, तो हृदय मुझे गवर्नर का मकान दिखाता था, कहता था, ‘मामाजी, वह देखो, गवर्नर साहब का मकान, बड़े बड़े खम्भे!’ माँ ने दिखा दिया, कुछ मिट्टी की बनी ईंटें एक के ऊपर दूसरी रखकर सजायी हुई हैं!

“भगवान् और उनका ऐश्वर्य। ऐश्वर्य दो दिन के लिए है; भगवान् ही सत्य हैं। जादूगर और उसका जादू। जादू देखकर सभी लोग विस्मित हो जाते हैं, परन्तु सब झूठा है, जादूगर ही सत्य है। मालिक और उसका बगीचा। बगीचा देखकर बगीचे के मालिक की खोज करनी चाहिए।”

मणि मल्लिक – (श्रीरामकृष्ण के प्रति) – देखो, प्रदर्शनी में कितनी बड़ी बिजली की बत्ती लगायी है। उस बत्ती को देखकर हमें लगता है वे (भगवान्) कितने बड़े हैं, जिन्होंने बिजली की बत्ती बनायी है।

श्रीरामकृष्ण – (मणिलाल के प्रति) – एक और मत है, वे ही ये सब कुछ बने हुए हैं। फिर जो कह रहा है वह भी वे ही हैं। ईश्वर, माया, जीव, जगत्।

म्युजियम की चर्चा चली।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – मैं एक बार म्युजियम में गया था। वहाँ मुझे फासिल* दिखाये गये। मैंने देखा कि लकड़ी पत्थर बन गयी है, पूरा जानवर पत्थर बन गया है। देखा, – संग का क्या गुण है! इसी प्रकार सदा सज्जन का संग करने से वही बन जाता है।

मणि मल्लिक – (हँसकर) – महाराज, यदि आप एक बार प्रदर्शनी में जाते तो शायद हमें १०-१५ वर्ष तक उपदेश देने की सामग्री आपको मिल जाती।

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – क्या उपमा के लिए?

बलराम – नहीं, वहाँ जाना ठीक नहीं। इधर-उधर जाने से हाथ को आराम नहीं मिलेगा।

श्रीरामकृष्ण – मेरी इच्छा है कि मुझे दो चित्र मिलें। एक चित्र, योगी धुनी जलाकर


* फासिल (Fossil) – करोड़ो वर्ष पूर्व की लकड़ी, पत्ते, फल, यहाँ तक कि फूल भी हमें आज पत्थर के रूप में प्राप्त हैं, इन्हें ‘फासिल’ कहते हैं।

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बैठा है, और दूसरा चित्र, योगी गांजा की चिलम मुँह में लगाकर पी रहा है, और उसमें से एकाएक आग जल उठती है।

“इन सब चित्रों से काफी उद्दीपन होता है। जिस प्रकार मिट्टी का बनावटी आम देखकर सच्चे आम का उद्दीपन होता है।

“परन्तु योग में विघ्न है – कामिनी-कांचन। यह मन शुद्ध होने पर योग होता है। मन का निवास है कपाल में (आज्ञाचक्र में), परन्तु दृष्टि रहती है लिंग, गुदा और नाभि में – अर्थात् कामिनी और कांचन में। साधना करने पर उस मन की ऊपर की ओर दृष्टि होती है।

“कौनसी साधना करने पर मन की दृष्टि ऊपर की ओर होती है? सदा साधुपुरुषों का संग करने से सब जाना जा सकता है।

“ऋषिगण सदा या तो निर्जन में या साधुओं के संग में रहा करते थे – इसीलिए उन्होंने बिना क्लेश के ही कामिनी-कांचन का त्याग कर ईश्वर में मन लगा लिया था – निन्दा-भय कुछ भी नहीं है।

“त्याग करना हो तो ईश्वर से पुरुषकार के लिए प्रार्थना करनी चाहिए। जो मिथ्या जँचे, उसका उसी समय त्याग करना उचित है।

“ऋषियों का यह पुरुषकार था। इसी पुरुषकार के द्वारा ऋषियों ने इन्द्रियों पर विजय प्राप्त की थी।

“कछुआ अगर हाथ पैर भीतर समेट ले, तो टुकड़े टुकड़े कर डालने पर भी वह हाथपैर नहीं निकालेगा!

“विषयी लोग कपटी होते हैं – सरल नहीं होते। मुँह से कहते हैं, ‘ईश्वर से प्रेम करता हूँ’, परन्तु उनका विषयों पर जितना आकर्षण तथा कामिनी-कांचन में जितना प्रेम रहता है, उसका एक अंश भी ईश्वर की ओर नहीं रहता। परन्तु मुँह से कहते हैं, ‘ईश्वर से प्रेम करता हूँ।’ (मणि मल्लिक के प्रति) कपटीपन छोड़ो।”

मणिलाल – मनुष्य के साथ या ईश्वर के साथ?

श्रीरामकृष्ण – सभी के साथ। मनुष्य के साथ भी, और ईश्वर के साथ भी – कपट कभी नहीं करना चाहिए।

“भवनाथ कैसा सरल है! विवाह करके आकर मुझसे कहता है, ‘स्त्री पर मेरा इतना प्रेम क्यों हो रहा है?’ अहा, वह बहुत ही सरल है।

“तो, स्त्री पर प्रेम नहीं होगा? यह जगन्माता की भुवनमोहिनी माया है। स्त्री को देखकर ऐसा लगता है मानो उसके समान अपना संसार भर में और कोई नहीं है – मानो वह उसका जीवन ही है, इहलोक और परलोक दोनों में!

“पर इसी स्त्री को लेकर मनुष्य क्या क्या दुःख नहीं भोग रहा है, फिर भी समझता

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है कि उसके समान अपना और कोई नहीं है। क्या दुर्दशा है! बीस रुपये वेतन, तीन बच्चे हुए हैं - उन्हें अच्छी तरह से खिलाने की शक्ति नहीं है - मकान की छत से पानी टपकता है, मरम्मत कराने को पैसा नहीं है - लड़के को नयी पुस्तकें खरीद कर नहीं दे सकता - लड़के का यज्ञोपवीत-संस्कार नहीं कर सकता - किसी से आठ आना, किसी से चार आना करके भीख माँगता है!

“विद्यारूपिणी स्त्री वास्तव में सहधर्मिणी है। वह स्वामी के ईश्वर-पथ में जाने में विशेष सहायता करती है। एक-दो बच्चे होने के बाद दोनों आपस में भाई-बहन की तरह रहते हैं। दोनों ही ईश्वर के भक्त हो जाते हैं - दास तथा दासी। उनकी गृहस्थी विद्या की गृहस्थी है। ईश्वर और भक्तों को लेकर सदा आनन्द मनाते हैं। वे जानते हैं, ईश्वर ही एकमात्र अपना है - चिरकाल के लिए अपना। सुख में, दुःख में कभी उन्हें नहीं भूलते - जैसे पाण्डव।

“संसारियों का ईश्वरप्रेम क्षणिक है - जैसे तपाये हुए तवे पर जल पड़ा हो - 'छुन्' शब्द हुआ - और उसके बाद ही सूख गया। संसारी लोगों का मन भोग की ओर रहता है इसलिए वह अनुराग, वह व्याकुलता नहीं होती।

“एकादशी तीन प्रकार की होती है। प्रथम निर्जला एकादशी, जल तक नहीं पिया जाता; इसी प्रकार, फकीर पूर्ण त्यागी होते हैं - एकदम सब भोगों का त्याग। दूसरी में दूधमिठाई खायी जाती है - मानो भक्त ने घर में मामूली भोग रखा है। तीसरी - वह जिसमें हलवापूरी खायी जाती है - खूब भर पेट खा रहा है; इधर रोटी दूध में भी छोड़ रखी है - बाद में खायगा!

“लोग साधन-भजन करते हैं, परन्तु मन रहता है स्त्री तथा धन की ओर; मन भोग की ओर रहता है, इसीलिए साधन-भजन ठीक नहीं होता।

“हाजरा यहाँ पर बहुत जप-तप करता था, परन्तु घर में स्त्री, बच्चे, जमीन आदि थी, इसलिए जप-तप भी करता है, भीतर भीतर दलाली भी करता है। इन सब लोगों की बातों की स्थिरता नहीं रहती। कभी कहता है, 'मछली नहीं खाऊँगा', पर फिर खाता है।

“धन के लिए लोग क्या नहीं कर सकते। ब्राह्मणों से, साधुओं से कुली का काम ले सकते हैं!

“मेरे कमरे में कभी कभी सन्देश सड़ तक जाता था, फिर भी मैं उसे संसारी लोगों को दे नहीं सकता था। दूसरों के शौच के लोटे का जल ले सकता था परन्तु ऐसे लोगों का तो लोटा भी नहीं छू सकता था।

“हाजरा धनवानों को देखने पर उन्हें अपने पास बुलाता था - बुलाकर लम्बी लम्बी बातें सुनाता था और उनसे कहता था, 'राखाल आदि जिन्हें देख रहे हो वे जप-तप नहीं कर सकते - हो हो करके घूमते हैं।'

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“मैं जानता हूँ कि यदि कोई पहाड़ की गुफा में रहता हो, देह पर भभूत मलता हो, उपवास करता हो, अनेक प्रकार के कठोर तप करता हो परन्तु भीतर भीतर उसका विषय की ओर मन रहता हो – कामिनी-कांचन में मन रहता हो – तो उसे मैं धिक्कारता हूँ। और जिसका कामिनी-कांचन में मन नहीं होता है – खाता पीता और मस्त घूमता है, उसे धन्य कहता हूँ।

(मणि मल्लिक को दिखाकर) “इनके घर में साधुओं के चित्र नहीं हैं। साधुओं के चित्र देखने पर ईश्वर का उद्दीपन होता है।”

मणिलाल – हाँ नन्दिनी* के कमरे में एक मेम का चित्र है – विश्वासरूपी पहाड़ को पकड़कर एक व्यक्ति है, नीचे गम्भीर समुद्र है, विश्वास छोड़ने पर एकदम अतल जल में जा गिरेगा।

“एक और है – कुछ लड़कियाँ दूल्हे के आने की प्रतीक्षा में दिपक में तेल भरकर जगती हुई बैठी हैं। जो सो जायगी, वह देख न सकेगी। ईश्वर का वर्णन दूल्हा कहकर किया गया है (Parable of the ten Virgins)।

श्रीरामकृष्ण – (हँसकर) – यह अच्छा है।

मणिलाल – और भी चित्र हैं। – विश्वास का वृक्ष तथा पाप और पुण्य के चित्र।

श्रीरामकृष्ण – (भवनाथ के प्रति) – अच्छे चित्र हैं सब; तू देखने को जाना।

कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “कभी-कभी इन बातों पर सोचता हूँ तो ये सब अच्छी नहीं लगतीं। पहले एक बार पाप पाप सोचना होता है, कैसे पाप से मुक्ति मिले, परन्तु उनकी कृपा से एक बार प्रेम यदि आ जाय, एक बार प्रेमाभक्ति यदि हो जाय तो पाप पुण्य सब भूल जाता है। उस समय वह शास्त्र के विधि-निषेध के परे चला जाता है। पश्चात्ताप करना पड़ेगा, प्रायश्चित्त करना होगा, – यह सब चिन्ता फिर नहीं रह जाती।

“मानो टेढ़ी नदी में से होकर बहुत कष्ट से और काफी देर के बाद अपने गन्तव्य स्थान पर जा रहे हो। परन्तु यदि बाढ़ आ जाय तो सीधे रास्ते से थोड़े ही समय में उस स्थान पर पहुँच सकते हो। उस समय जमीन पर भी काफी जल हो जाता है।

“प्रथम स्थिति में काफी घूमना पड़ता है, बहुत कष्ट करना पड़ता है।

“प्रेमाभक्ति होने पर बहुत सरल हो जाता है, जैसे धान काट लेने के बाद मैदान में जिधर चाहो, जाओ। पहले मेड़ पर से घूम घूमकर जाना पड़ता था। अब जिधर से चाहो, जाओ। यदि कुछ कूड़ा-कर्कट पड़ा हो, तो जूता पहनकर जाने से फिर कोई कष्ट ही नहीं होता। विवेक, वैराग्य, गुरु के वाक्य पर विश्वास – ये सब रहने पर फिर कोई कष्ट नहीं है।”


* नन्दिनी – मणि मल्लिक की विधवा कन्या, श्रीरामकृष्ण की भक्तिनी।

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निराकार ध्यान और साकार ध्यान

मणिलाल – (श्रीरामकृष्ण के प्रति) – अच्छा, ध्यान का क्या नियम है? कहाँ पर ध्यान करना चाहिए?

श्रीरामकृष्ण – प्रसिद्ध स्थान है हृदय। हृदय में ध्यान हो सकता है अथवा सहस्रार में। ये सब विधि के अनुसार ध्यान शास्त्रों में हैं। फिर तुम्हारी जहाँ इच्छा हो ध्यान कर सकते हो। सभी स्थान तो ब्रह्ममय हैं, वे कहाँ नहीं हैं?

“जिस समय बलि की उपस्थिति में नारायण ने तीन पदों से स्वर्ग, मृत्यु, पाताल ढँक लिया था। उस समय क्या कोई स्थान बाकी बचा था! गंगातट जैसा पवित्र है वैसा ही वह स्थान भी जहाँ कूड़ाकर्कट है। फिर यह बात भी है कि ये सब उन्हीं की विराट मूर्ति हैं।

“निराकार ध्यान बहुत ही कठिन है। उस ध्यान में तुम जो कुछ देख या सुन रहे हो – उन सब को हटा देना चाहिए। फिर केवल तुम्हारे सत्य स्वरूप का चिन्तन रह जाता है। इसी स्वरूप का चिन्तन कर शिव नृत्य करते हैं। ‘मैं क्या हूँ’, ‘मैं क्या हूँ’, कहकर नृत्य करते हैं।

“इसे कहते हैं शिवयोग। इस ध्यान के समय कपाल की ओर दृष्टि रखनी होती है। ‘नेति’ ‘नेति’ कहकर जगत् को छोड़ अपने स्वरूप का चिन्तन।

“और एक है विष्णुयोग। नासिका के अग्रभाग में दृष्टि। आधी भीतर, आधी बाहर। साकार ध्यान में इसी प्रकार होता है।

“शिव कभी कभी साकार चिन्तन करते हुए नाचते हैं – ‘राम’ ‘राम’ कहकर नाचते हैं।”

(३)

मणिलाल मल्लिक पुराने ब्राह्म-समाजी हैं। भवनाथ, राखाल, मास्टर बीच बीच में ब्रह्म समाज में जाते थे। श्रीरामकृष्ण ओंकार की व्याख्या तथा यथार्थ ब्रह्मज्ञान और उसके बाद की स्थिति का वर्णन कर रहे हैं।

अनाहत ध्वनि तथा परम पद

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – ॐ शब्द ब्रह्म है, ऋषि मुनि लोग उसी शब्द को प्राप्त करने के लिए तपस्या करते थे। सिद्ध होने पर साधक सुनता है कि नाभि से वह शब्द स्वयं ही उठ रहा है – अनाहत शब्द।

“एक मत है कि केवल शब्द सुनने से क्या होगा? दूर से समुद्र के शब्द का कल्लोल सुनायी देता है। उस शब्द-कल्लोल के सहारे धीरे धीरे आगे बढ़ने से तुम समुद्र

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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४६२श्रीरामकृष्णवचनामृत९ मार्च, १८८४

तक पहुँच सकते हो। जहाँ कल्लोल होगा, वहाँ समुद्र भी अवश्य होगा। अनाहत ध्वनि के अनुसार आगे बढ़ने पर उसका प्रतिपाद्य जो ब्रह्म उसके पास पहुँचा जा सकता है। उसे ही वेदों में परम पद कहते हैं।* मैं पन रहते वैसा दर्शन नहीं होता। जहाँ ‘मैं’ भी नहीं, ‘तुम’ भी नहीं, ‘एक’ भी नहीं, ‘अनेक’ भी नहीं, वहीं पर यह दर्शन होता है।

“मानो सूर्य और दस जलपूर्ण घड़े हैं, प्रत्येक घड़े में सूर्य का प्रतिबिम्ब दिखायी दे रहा है। पहले देखा जाता है एक सूर्य और दस परछाइयों के सूर्य। यदि नौ घड़े तोड़ डाले जायें, तो बाकी रहते हैं एक सूर्य और एक परछाईंवाला सूर्य। एक एक घड़ा मानो एक एक जीव है। परछाईं के सूर्य को पकड़ पकड़कर वास्तव सूर्य के पास जाया जाता है; जीवात्मा से परमात्मा में पहुँचा जाता है। जीव (जीवात्मा) यदि साधन-भजन करे, तो परमात्मा का दर्शन कर सकता है। अन्तिम घड़े को तोड़ देने पर क्या है वह मुँह से नहीं कहा जा सकता।

“जीव पहले अज्ञानी बना रहता है। ईश्वरबुद्धि नहीं रहती वरन् नाना वस्तुओं की बुद्धि, अनेक चीजों का बोध रहता है। जब ज्ञान होता है, तब उसकी समझ में आता है कि ईश्वर सभी भूतों में है। जिस प्रकार पैर में काँटा चुभता है तो एक और काँटे को ढूँढ़कर उससे वह काँटा निकाला जाता है, अर्थात् ज्ञानरूपी काँटे के द्वारा अज्ञानरूपी काँटे को निकाल बाहर करना।

“फिर विज्ञान होने पर अज्ञान-काँटा और ज्ञान-काँटा दोनों को ही फेंक देना। उस समय केवल दर्शन ही नहीं, वरन् ईश्वर के साथ रातदिन बातचीत चलती रहती है।

“जिसने केवल दूध की बात सुनी है उसे अज्ञान है, जिसने दूध देखा है उसे ज्ञान हुआ और जो दूध पीकर मोटा-ताजा हुआ है उसे विज्ञान प्राप्त हुआ है।”

अब सम्भव है, श्रीरामकृष्ण अपनी स्थिति भक्तों को समझा रहे हैं। विज्ञानी की स्थिति का वर्णन कर, सम्भव है, अपनी स्थिति कह रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – ज्ञानी साधु और विज्ञानी साधु में भेद है। ज्ञानी साधु के बैठने का कायदा अलग है। मूँछों पर हाथ फेरकर बैठता है। कोई आये तो कहता है, ‘क्या जी, तुम्हें कुछ पूछना है?’

“विज्ञानी साधु सदा ईश्वर का दर्शन करता रहता है, उनके साथ बातचीत करता है, अर्थात् जो विज्ञानी है उसका स्वभाव दूसरा होता है। कभी जड़ की तरह, कभी पिशाच की तरह, कभी बालक की तरह और कभी उन्माद की तरह।

“कभी समाधिमग्न होकर बाहर का ज्ञान खो बैठता है – जड़ की तरह बन जाता है।


* “यत्र नादो विलीयते। तद्विष्णोः परमं पदम्। सदा पश्यन्ति सूरयः।”

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri ९ मार्च १८८४ | परिच्छेद ७७ | ४६३

“ब्रह्ममय देखता है इसलिए पिशाच की तरह है। पवित्रता-अपवित्रता का ख्याल नहीं रहता। सम्भव है कि शौच करते बेर खा रहा हो – बालक की तरह। स्वप्नदोष के बाद अशुद्धि नहीं समझता है, – समझता है, वीर्य से ही शरीर बना है।

“विष्ठा-मूत्र का ज्ञान नहीं है। सब ब्रह्ममय। भात-दाल बहुत दिनों तक रख देने से विष्ठा की तरह बन जाता है।

“फिर उन्माद के समान; उसकी चाल-ढाल देखकर लोग उसे पागल समझते हैं। और फिर कभी बालक की तरह; लज्जा, घृणा, संकोच आदि कोई बन्धन नहीं रहता।

“ईश्वर-दर्शन के बाद यह स्थिति होती है। जैसे चुम्बक पहाड़ के पास होकर जाने से जहाज के स्क्रू-कील-काँटे सब ढीले होकर छूट जाते हैं। ईश्वर-दर्शन के बाद काम, क्रोध आदि नहीं रह जाते।

“माँ काली के मन्दिर पर जब बिजली गिरी थी, तो हमने देखा था, सभी स्क्रू के माथे उड़ गये थे।

“जिन्होंने ईश्वर का दर्शन किया है, उनसे फिर बच्चा पैदा करना अथवा सृष्टि का काम नहीं होता। धान बोने से पौधा होता है, परन्तु धान उबाल कर बोने से उससे पौधा नहीं होता है।

“जिन्होंने ईश्वर का दर्शन किया है उनका ‘मैं’ केवल नाम का ही रह जाता है। उस ‘मैं’ द्वारा कोई अनुचित कार्य नहीं होता, सिर्फ नाम को रह जाता है।

“मैंने केशव सेन से कहा, ‘मैं’ को त्याग दो – मैं – कर्ता हूँ – मैं लोगो को शिक्षा दे रहा हूँ – इस ‘मैं’ को। केशव ने कहा, ‘महाशय, तो फिर दल नहीं रहता!’ मैंने कहा, बुरे ‘मैं’ को त्याग दो।

“ ‘ईश्वर का दास मैं’ ‘ईश्वर का भक्त मैं’ इसे त्यागना नहीं पड़ेगा। ‘बुरा मैं’ मौजूद है, इसीलिए ‘ईश्वर का मैं’ नहीं रहता।

“यदि कोई भण्डारी रहे तो मकान का मालिक भण्डार का भार स्वयं नहीं लेता।”।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों के प्रति) – देखो इस हाथ में चोट लगने के कारण मेरा स्वभाव बदलता जा रहा है। अब मनुष्य में ईश्वर का अधिक प्रकाश दिखायी दे रहा है। मानो वे कह रहे हैं, मेरा मनुष्यों में वास है, तुम मनुष्यों के साथ आनन्द करो।

“वे शुद्ध भक्तों में अधिक प्रकट हैं – इसीलिए तो मैं नरेन्द्र, राखाल आदि के लिए इतना व्याकुल होता हूँ।

“तालाब के किनारे पर छोटे छोटे गढ़े रहते हैं, उन्हीं में मछलियाँ, केकड़े आकर इकट्ठे हो जाते हैं, उसी प्रकार मनुष्य में ईश्वर का प्रकाश अधिक है।

“ऐसा है कि शालग्राम से भी मनुष्य बड़ा है; नर ही नारायण हैं।

“प्रतिमा में उनका आविर्भाव होता है और भला मनुष्य में नहीं होगा?

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४६४ श्रीरामकृष्णवचनामृत ९ मार्च, १८८४

“वे नरलीला करने के लिए मनुष्य-रूप में अवतीर्ण होते हैं – जैसे श्रीरामचन्द्र, श्रीकृष्ण, श्रीचैतन्यदेव। अवतार का चिन्तन करने से ही उनका चिन्तन होता है।”

ब्राह्मभक्त भगवानदास आये हैं।

श्रीरामकृष्ण – (भगवानदास के प्रति) – ऋषियों का धर्म, सनातन धर्म – अनन्त काल से है और रहेगा। इस सनातन धर्म के भीतर निराकार, साकार सभी प्रकार की पूजाएँ हैं। ज्ञानपथ, भक्तिपथ सभी हैं। अन्य जो सम्प्रदाय हैं, वे आधुनिक हैं। कुछ दिन रहेंगे, फिर मिट जायँगे।


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परिच्छेद ७८

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परिच्छेद ७८

ईश्वरलाभ ही जीवन का उद्देश्य है

(१)

दक्षिणेश्वर मन्दिर में राखाल, राम, आदि के साथ

रविवार, २३ मार्च १८८४। श्रीरामकृष्ण दोपहर के भोजन के बाद राखाल, राम आदि भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। शरीर पूर्ण स्वस्थ नहीं है। अब तक हाथ में तख्ती बँधी हुई है।

शरीर अस्वस्थ रहने पर भी श्रीरामकृष्ण आनन्द की हाट लगाये हुए हैं। दल के दल भक्त आते हैं। सदैव ही ईश्वरी कथा-प्रसंग और आनन्द है। कभी कीर्तनानन्द और कभी समाधिमग्न होकर श्रीरामकृष्ण ब्रह्मानन्द का अनुभव कर रहे हैं। भक्तगण अवाक् होकर देखते हैं। श्रीरामकृष्ण वार्तालाप करने लगे।

राम – आर. मित्र की कन्या के साथ नरेन्द्र का विवाह ठीक हो रहा है। बहुत धन देने को कहता है।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – इसी तरह किसी दल का नेता बन जायगा। वह जिस-तरफ झुकेगा, उसी ओर बड़ा व्यक्ति होकर नाम पैदा करेगा।

श्रीरामकृष्ण ने फिर नरेन्द्र की बात ही न उठने दी।

श्रीरामकृष्ण – (राम से) – अच्छा, बीमार पड़ने पर मैं इतना अधीर क्यों हो जाया करता हूँ? कभी इससे पूछता हूँ, किस तरह अच्छा होऊँगा, कभी उससे पूछता हूँ!

“बात यह है कि विश्वास या तो सब पर करे या किसी पर न करे।

“वे ही डाक्टर और कविराज हुए हैं; इसलिए सभी चिकित्सकों पर विश्वास करना चाहिए। पर उन लोगों को आदमी सोचने पर विश्वास नहीं होता।

“शम्भू को घोर विकार था। डाक्टर सर्वाधिकारी ने देखकर बतलाया – दवा की गरमी है।

“हलधारी ने नाड़ी दिखायी, डाक्टर ने कहा – ‘आँख देखें – अच्छा! तुम्हारी प्लीहा बढ़ गयी है!’ हलधारी ने कहा – ‘मेरे प्लीहा-फीहा कहीं कुछ नहीं है।’

“मधु डाक्टर की दवा अच्छी है।”

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४६६श्रीरामकृष्णवचनामृत२३ मार्च, १८८४

राम-दवा से फायदा नहीं होता, परन्तु इतना अवश्य होता है कि वह प्रकृति की बहुत कुछ सहायता जरूर करती है।

श्रीरामकृष्ण – दवा से अगर उपकार नहीं होता तो अफीम फिर कैसे दस्त रोक देती है?

राम केशव के देहान्त होने की बात कह रहे हैं।

राम – आपने तो ठीक ही कहा था – अच्छा गुलाब का पेड़ हुआ तो माली उसकी जड़ खोल देता है। ओस पाने पर पौधा और जोरदार होता है। सिद्धवचन का फल तो प्रत्यक्ष कर लिया।

श्रीरामकृष्ण – क्या जाने भाई, इतना तो हिसाब मैंने नहीं किया था, तुम्हीं कह रहे हो।

राम – उन लोगों ने आपकी बात समाचार-पत्रों में निकाल दी थी।

श्रीरामकृष्ण – छाप दी! यह क्या? अभी से छापना क्यों? मैं खाता हूँ – पड़ा रहता हूँ, बस, और मैं कुछ नहीं जानता।

“केशव सेन से मैंने कहा, छापा क्यों? उसने कहा – तुम्हारे पास लोग आयें इसलिए।

(राम आदि से) “आदमी की शक्ति से लोक-शिक्षा नहीं होती। ईश्वर की शक्ति के बिना अविद्या नहीं जीती जा सकती।

“दो आदमी कुश्ती लड़े – हनुमानसिंह और एक पंजाबी मुसलमान। मुसलमान खूब तगड़ा था। कुश्ती के दिन तथा उसके पन्द्रह दिन पहले उसने खूब मांस और घी खाया था। सब सोचते थे यही जीतेगा।

“हनुमानसिंह मैले कपड़े पहने रहता था। कुश्ती के कुछ दिन पहले वह बहुत कम खाया करता था, परन्तु महावीरजी का नाम खूब लेता था। जिस दिन कुश्ती होने की थी, उस दिन तो उसने निर्जल उपवास किया। लोग सोचने लगे, यह जरूर हारेगा।

“परन्तु जीता वही, और पन्द्रह दिन तक जिसने खूब खाया था, वह हार गया।

“धक्कमधक्का करने से क्या होगा? – जिसे लोक-शिक्षा देनी है, उसकी शक्ति ईश्वर के पास से आयेगी। और त्यागी हुए बिना लोक-शिक्षा नहीं होती।

“मैं हूँ मूर्खों का सिरमौर – ” (लोग हँसते हैं।)

एक भक्त – ऐसा है तो आप के मुँह से वेद-वेदान्त – इसके अलावा भी न जाने क्या क्या – कैसे निकलते हैं?

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – परन्तु मेरे लड़कपन में लाहा बाबू के यहाँ साधु-महात्मा जो कुछ पढ़ते थे, वह सब मैं समझ लेता था, परन्तु कहीं कहीं समझ में आता भी नहीं था। कोई पण्डित आकर यदि संस्कृत बोलता है तो मैं समझ लेता हूँ। परन्तु खुद

२३ मार्च, १८८४ | परिच्छेद ७८ | ४६७

२३ मार्च, १८८४परिच्छेद ७८४६७

संस्कृत नहीं बोल सकता।

“उन्हें प्राप्त करना, यही जीवन का उद्देश्य है। लक्ष्य-भेद के समय अर्जुन ने कहा, मुझे और कुछ नहीं दीख पड़ता – केवल चिड़िया की आँख देख रहा हूँ, न राजाओं को देखता हूँ, न पेड़, यहाँ तक कि चिड़िया को भी नहीं देख रहा हूँ।

“उन्हें पाने ही से काम हो गया! – संस्कृत न पढ़ी तो क्या हुआ है?

“उनकी कृपा पण्डित, मूर्ख और सब बच्चों पर है – जो उनको पाने के लिए व्याकुल हो। पिता का स्नेह सब पर बराबर है।

“पिता के पाँच लड़के हैं, उनमें एक-दो बाबूजी कहकर पुकार सकते हैं। कोई बा कहकर पुकारता है। कोई पा कहता है, पूरा पूरा उच्चारण नहीं कर सकता। जो बाबूजी कहता है, उस पर क्या बाप का प्यार ज्यादा होगा और जो पा कहकर पुकारता है, उस पर कम? बाप जानता है, यह छोटा बच्चा अभी साफ बाबूजी नहीं कह सकता।

“हाथ टूटने के बाद से एक अवस्था बदल रही है। नरलीला की ओर मन बहुत जा रहा है। वे ही आदमी बनकर खेल रहे हैं।

“मिट्टी की मूर्ति में तो उनकी पूजा होती है और मनुष्यों में नहीं हो सकती?

“एक सौदागर, लंका के पास जहाज के डूब जाने से, लंका के तट पर बहकर लग गया। विभीषण के आदमी उसकी आज्ञा पा उस आदमी को विभीषण के पास ले गये। ‘अहा! मेरे रामचन्द्र जैसी इसकी मूर्ति है। वही नर-रूप!’ यह कहकर विभीषण आनन्द मनाने लगे। उस आदमी को तरह तरह के कपड़े पहनाकर उसकी पूजा-आरती की!

“यह बात जब मैंने पहले पहल सुनी थी, तब मुझे इतना आनन्द हुआ था जिसका ठिकाना नहीं।

“वैष्णवचरण से पूछने पर उसने कहा, जो जिसे प्यार करता है, उसे इष्ट मानने पर ईश्वर पर शीघ्र ही मन लग जाता है। ‘तू किसे प्यार करता है?’ – ‘अमुक को।’ ‘तो उसे ही अपना इष्ट मान।’ उस देश में (कामारपुकुर, श्यामबाजार में) मैंने, कहा – ‘इस तरह का मत मेरा नहीं है – मेरा मातृ-भाव है। देखा, बातें तो बड़ी लम्बी-चौड़ी करते हैं और उधर व्यभिचार भी करते हैं। औरतों ने पूछा – क्या हम लोगों की मुक्ति न होगी? मैंने कहा – होगी अगर एक ही पर भगवद्दृष्टि से निष्ठा रहेगी। पाँच मर्दों के साथ रहने से न होगी।”

राम – केदार शायद कर्ताभाजावालों (एक सम्प्रदाय) के यहाँ गये थे।

श्रीरामकृष्ण – वह पाँच तरह के फूलों से मधु लिया करता है।

(राम, नित्यगोपाल आदि से) – “यही मेरे इष्ट हैं, इस तरह का जब सोलहों आना विश्वास हो जायेगा, तब ईश्वर मिलेंगे – तब उनके दर्शन होंगे।

“पहले के आदमियों में विश्वास बहुत होता था। हलधारी के बाप को बड़ा पक्का

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४६८श्रीरामकृष्णवचनामृत२३ मार्च, १८८४

विश्वास था!

“वह अपनी लड़की की ससुराल जा रहा था। रास्ते में बेल खूब फूल रहे थे और बेल के अच्छे दल भी उसे दीख पड़े। श्रीठाकुरजी की सेवा करने के लिए फूल और बेलपत्र लेकर उल्टे पाँव तीन कोस जमीन अपने घर लौट आया!

“रामलीला हो रही थी। कैकेयी ने राम को वनवास की आज्ञा दी। हलधारी का बाप भी रामलीला देखने गया था। वह बिलकुल उठकर खड़ा हो गया। जो कैकेयी बना था उसके पास पहुँचकर कहा – 'अभागिन्!' यह कहकर उसने उसके मुँह में दीया लगा देना चाहा!

“नहाने के बाद जब पानी में खड़ा होकर 'रक्तवर्णं चतुर्मुखम्' कहकर ध्यान करता था, तब उसकी आँखों से आँसुओं की धारा बह चलती थी।

“मेरे पिता जब खड़ाऊ पहनकर रास्ते पर चलते थे तब गाँव के दूकानदार उठकर खड़े हो जाते थे। कहते, वे आ रहे हैं!

“जब वे हलदार तालाब में नहाते थे, तब वहाँ कोई नहाने जाय, ऐसी हिम्मत किसी में न थी। लोग खबर रखते, वे नहाकर गये या नहीं।

“रघुवीर रघुवीर कहते कहते उनकी छाती लाल हो जाती थी।

“मुझे भी ऐसा ही होता था। वृन्दावन में गौओं को चरकर लौटते हुए देखकर, भाव से शरीर की वैसी ही दशा हो गयी थी।

“तब के आदमियों में बड़ा विश्वास था। ऐसी बात भी सुनने में आती है कि भगवान काली के रूप में नाच रहे हैं और साधक तालियाँ बजा रहे हैं।”

पंचवटी के कमरे में एक हठयोगी आये हुए हैं। एँड़ेदा के कृष्णकिशोर के पुत्र रामप्रसन्न और दूसरे भी कई आदमी उन हठयोगी पर बड़ी भक्ति रखते हैं। परन्तु उनके अफीम और दूध के लिए हर महीने पच्चीस रुपये का खर्च होता है। रामप्रसन्न ने श्रीरामकृष्ण से कहा था, 'आपके यहाँ तो कितने भक्त आते हैं, उनसे कुछ कह दीजियेगा; हठयोगी के लिए कुछ रुपये मिल जायँगे।'

श्रीरामकृष्ण ने कुछ भक्तों से कहा, “पंचवटी में जाकर हठयोगी को देखो, कैसा आदमी है।”

(२)

ठाकुरदादा अपने दो-एक मित्रों को साथ लेकर श्रीरामकृष्ण के पास आये हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया। उम्र २७-२८ होगी। वराहनगर में रहते हैं। ब्राह्मण पण्डित के लड़के हैं। कथाएँ कहने का अभ्यास कर रहे हैं। अब संसार का भार ऊपर आ पड़ा है। कुछ दिन के लिए विरागी होकर घर से निकल गये थे। साधन-भजन अब भी करते हैं।


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२३ मार्च, १८८४ | परिच्छेद ७८ | ४६९

२३ मार्च, १८८४ | परिच्छेद ७८ | ४६९


श्रीरामकृष्ण – क्या तुम पैदल आ रहे हो? कहाँ रहते हो?

ठाकुरदादा – जी हाँ, वराहनगर में रहता हूँ।

श्रीरामकृष्ण – यहाँ क्या कोई काम था?

ठाकुरदादा – जी, आपके दर्शन करने आया हूँ। उन्हें पुकारता हूँ, परन्तु बीच बीच में अशान्ति क्यों होती है? दो-चार दिन तो आनन्द में रहता हूँ, परन्तु उसके बाद फिर अशान्ति क्यों होने लगती है?

कारीगर; मन्त्र में विश्वास; हरिभक्ति; ज्ञान के दो लक्षण

श्रीरामकृष्ण – मैं समझ गया। पटरी ठीक नहीं बैठती। कारीगर दाँत में दाँत ठीक बैठा देता है तब होता है। शायद कहीं कुछ अटक रहा है।

ठाकुरदादा – जी हाँ, ऐसी ही अवस्था हुई है।

श्रीरामकृष्ण – क्या तुम मन्त्र ले चुके हो?

ठाकुरदादा – जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – मन्त्र पर विश्वास तो है?

ठाकुरदादा के एक मित्र ने कहा – ‘ये बहुत अच्छा गाते हैं।’ श्रीरामकृष्ण ने एक गाना गाने के लिए कहा। ठाकुरदादा गा रहे हैं –

“प्रेम-गिरि की कन्दरा में योगी बनकर रहूँगा। वहाँ आनन्द के झरने के पास मैं ध्यान करता हुआ बैठा रहूँगा। तत्त्व-फलों का संग्रह करके मैं ज्ञान की भूख मिटाऊँगा। और वैराग्यकुसुमों से श्रीपादपद्मों की पूजा करूँगा। विरह की प्यास बुझाने के लिए मैं अब कुएँ के पानी के लिए न जाऊँगा, हृदय के पात्र में शान्ति का सलिल भर लूँगा। कभी भाव के शिखर पर चरणामृत पीकर हँसूँगा, रोऊँगा, नाचूँगा और गाऊँगा।”

श्रीरामकृष्ण – वाह, अच्छा गाना है! आनन्द-निर्झर! तत्त्वफल! हँसूँगा, रोऊँगा, नाचूँगा और गाऊँगा!

“तुम्हारे भीतर से गाना कैसा मधुर लग रहा है! – बस और क्या चाहिए!

“संसार में रहने से सुख और दुःख हैं ही – थोड़ी सी अशान्ति तो मिलेगी ही। काजल की कोठरी में रहने से देह में कुछ कालिख लग ही जाती है।”

ठाकुरदादा – जी, मैं अब क्या करूँ, बतला दीजिये।

श्रीरामकृष्ण – तालियाँ बजा-बजाकर सुबह-शाम ईश्वर के गुण गाया करना – नाम लेना ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ ‘हरि बोल’ कहकर।

“एक बार और आना – मेरा हाथ कुछ अच्छा होने पर।”

महिमाचरण ने श्रीरामकृष्ण को आकर प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण – (महिमा से) – अहा! उन्होंने एक बड़ा सुन्दर गाना गाया है। गाओ

४७० श्रीरामकृष्णवचनामृत २३ मार्च, १८८४

तो जी वही गाना एक बार और।

गाना समाप्त होने पर श्रीरामकृष्ण महिमाचरण से कह रहे हैं - 'तुम वही श्लोक एक बार कहो तो जरा, जिसमें ईश्वरभक्ति की बातें हैं।'

महिमाचरण ने, 'अन्तर्बहिर्यदि हरिस्तपसा ततः किम्', कहकर सुनाया; श्रीरामकृष्ण ने कहा, और वह भी कहो जिसमें 'लभ लभ हरिभक्तिम्' है।

महिमाचरण कहने लगे -

विरम विरम ब्रह्मन् किं तपस्यासु वत्स।
व्रज व्रज द्विज शीघ्रं शंकरं ज्ञानसिन्धुम्॥
लभ लभ हरिभक्तिं वैष्णवोक्तां सुपक्वाम्।
भवनिगडनिबन्धच्छेदनीं कर्तरीं च॥

श्रीरामकृष्ण - शंकर हरि-भक्ति देंगे।

महिमा - पाशमुक्तः सदा शिवः।

श्रीरामकृष्ण - लज्जा, घृणा, भय और संकोच, ये सब पाश हैं, क्यों जी?

महिमा - जी हाँ। गुप्त रखने की इच्छा, प्रशंसा से अत्यधिक सिकुड़ना।

श्रीरामकृष्ण - ज्ञान के दो लक्षण हैं। पहला तो यह कि कूटस्थ बुद्धि हो। लाख दुःख, कष्ट, विपत्तियाँ और विघ्न हों - सब में निर्विकार रहना - जैसे लोहार के यहाँ का लोहा, जिस पर हथौड़ा चलाते हैं। और दूसरा है पुरुषकार - पूरी जिद। काम और क्रोध से अपना अनिष्ट हो रहा है - देखा कि एकदम त्याग!! कछुआ जब अपने हाथ पैर भीतर समेट लेता है, तब उसके चार खण्ड कर डालने पर भी उन्हें वह बाहर नहीं निकालता।

(ठाकुरदादा आदि से) "वैराग्य दो तरह का है। तीव्र वैराग्य और मन्द वैराग्य। मन्द वैराग्य वह है जिसका भाव है, 'होता है - हो जायगा।' तीव्र वैराग्य शान पर लगाये हुए छुरे की धार है - माया के पाशों को तुरन्त काट देता है।

"कोई किसान कितने ही दिनों से मेहनत करता है, परन्तु पानी खेत में आता ही नहीं मन में जिद है ही नहीं! और कोई दो-चार दिन मेहनत करने के बाद - 'आज पानी लाकर दम लूँगा' इस तरह का हठ ठान बैठता है। नहाना-खाना सब बन्द कर देता है। दिन भर मेहनत करने के बाद जब कुल-कुल स्वर से पानी आने लगता है तब उसे कितना आनन्द होता है! तब वह घर जाकर अपनी स्त्री से कहता है - 'ले आ तेल - मालिश करके नहाऊँगा'। नहा-खाकर फिर सुख की नींद सोता है।

"एक की स्त्री ने कहा, 'अमुक को बड़ा वैराग्य हुआ है - तुम्हें कुछ भी न हुआ।' जिसे वैराग्य हुआ था, उसके सोलह स्त्रियाँ थीं, एक एक करके वह सब को छोड़ रहा है।

२३ मार्च, १८८४  परिच्छेद ७८  ४७१

२३ मार्च, १८८४  परिच्छेद ७८  ४७१

“उस स्त्री का स्वामी कन्धे पर अँगोछा डाले हुए नहाने जा रहा था। उसने कहा, अरी, सुन, त्याग करने की शक्ति उसमें नहीं है, थोड़ा थोड़ा करके कभी त्याग नहीं होता। देख, मैं अब चला!

“घर का कोई प्रबन्ध न करके, उसी अवस्था में कन्धे पर अँगोछा डाले हुए, घर छोड़कर वह चला गया। इसे ही तीव्र वैराग्य कहते हैं।

“एक तरह का वैराग्य और है, उसे मर्कट-वैराग्य कहते हैं। संसार की ज्वाला से जलकर गेरुआ वस्त्र पहनकर काशी चला गया। बहुत दिनों तक कोई खबर नहीं। फिर एक चिट्ठी आयी – 'तुम लोग कोई चिन्ता न करो, यहाँ मुझे एक काम मिल गया है।'

“संसार की ज्वाला तो है ही। बीबी कहना नहीं मानती, वेतन सिर्फ बीस रुपया महीना, बच्चे का 'अन्नप्राशन' नहीं हो रहा है, बच्चे को पढ़ाने का खर्च नहीं, घर टूटा हुआ, छत चू रही है, मरम्मत के लिए रुपये नहीं!

“इसीलिए जब कोई कम उम्र का लड़का आता है तब मैं उससे पूछ लेता हूँ कि तुम्हारे कौन कौन हैं।

(महिमा के प्रति) “तुम्हारे लिए संसार-त्याग करने की क्या जरूरत है? साधुओं को कितनी तकलीफ होती है! एक की स्त्री ने पूछा, 'तुम संसार छोड़ोगे – क्यों? दस घरों में घूमघूमकर भीख माँगोगे, इससे तो एक घर में खाते हो, यही अच्छा है।'

“सदाव्रत की तलाश में रास्ता छोड़कर साधु-सन्त तीन कोस से भी दूर चले जाते हैं। मैंने देखा है, जगन्नाथ के दर्शन करके सीधे रास्ते से साधु आ रहे हैं, परन्तु सदाव्रत के लिए उन्हें सीधा रास्ता छोड़कर जाना पड़ता है।

“यह तो अच्छा है – किले से लड़ना। मैदान में खड़े होकर लड़ने में असुविधाएँ हैं। विपत्ति, देह पर गोले और गोलियाँ आकर गिरती है।

“हाँ कुछ दिनों के लिए निर्जन में जाकर, ज्ञान-लाभ करके संसार में आकर रहो। जनक ज्ञान-लाभ करके संसार में आकर रहे थे। ज्ञान-लाभ हो जाने पर फिर जहाँ रहो, उसमें कोई हानि नहीं।”

महिमाचरण – महाराज, मनुष्य विषय में क्यों फँस जाता है?

श्रीरामकृष्ण – उन्हें बिना प्राप्त किये ही विषय में रहता है, इसलिए। उन्हें प्राप्त कर लेने पर फिर मुग्ध नहीं होता। पतिंगा अगर एक बार उजाला देख लेता है, तो फिर और उसे अन्धकार अच्छा नहीं लगता।

“उन्हें पाने की इच्छा रखनेवालों को वीर्य-धारण करना पड़ता है।

“शुकदेवादि ऊर्ध्वरेता थे। इनका रेतपात कभी नहीं हुआ।

“एक और है धैर्येरता। पहले रेतपात हो चुका है,– परन्तु इसके बाद से वे वीर्यधारण करने लगे हैं। बारह वर्ष तक धैर्येरता रहने पर विशेष शक्ति पैदा होती है।

४७२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २३ मार्च, १८८४

भीतर एक नयी नाड़ी होती है; उसका नाम है मेधानाड़ी। उस नाड़ी के होने पर सब स्मरण रहता है – आदमी सब जान सकता है।

“वीर्यपात से बल का क्षय होता है। स्वप्नदोष से जो कुछ निकल जाता है, उसमें दोष नहीं। ऐसा खाद्य पदार्थ के गुण से होता है। इस तरह निकल जाने पर भी जो कुछ रहता है, उसी से काम होता है। फिर भी स्त्री-प्रसंग हरगिज न करना चाहिए।

“अन्त में जो कुछ रहता है वह refine (सार पदार्थ) है। लाहा बाबू के यहाँ राब के घड़े रखे थे। घड़ों के नीचे एक एक छेद करके फिर एक साल बाद जब देखा, तब सब दाने बँध गये थे – मिश्री की तरह। जितना सीरा निकलना था, सब छेद से निकल गया था।

“स्त्रियों का सम्पूर्ण त्याग संन्यासियों के लिए है। तुम लोगों का विवाह हो गया है, कोई दोष नहीं है।

“संन्यासी को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। पर साधारण लोगों के लिए यह सम्भव नहीं है। सा, रे, ग, म, प, ध, नि; ‘नि’ में तुम्हारी आवाज बहुत देर तक नहीं रह सकती।

“संन्यासी के लिए वीर्यपात बहुत ही बुरा है; इसीलिए उन्हें सावधानी से रहना पड़ता है, ताकि स्त्रियाँ दृष्टि में भी न पड़ें। भक्त-स्त्री होने पर भी वहाँ से हट जाना चाहिए। स्त्री-रूप देखना भी बुरा है। जाग्रत अवस्था में चाहे न हो पर स्वप्न में अवश्य वीर्य-स्खलन हो जाता है।

“संन्यासी जितेन्द्रिय होने पर भी लोक-शिक्षा के लिए स्त्रियों के साथ उसे बातचीत न करनी चाहिए। भक्त-स्त्री होने पर भी उससे ज्यादा देर तक बातचीत न करे।

“संन्यासी की है निर्जला एकादशी। एकादशी और दो तरह की है। एक फलमूल खाकर रखी जाती है, एक पूड़ी-कचौड़ी और मालपुए खाकर। (सब हँसते हैं।)

“कभी तो ऐसा भी होता है कि उधर पूड़ियाँ उड़ रही हैं और इधर दूध में दो-एक रोटियाँ भी भीग रही हैं, फिर खायेंगे! (सब हँसते हैं।)

(हँसते हुए) “तुम लोग निर्जला एकादशी न रख सकोगे।

“कृष्णकिशोर को मैंने देखा, एकादशी के दिन पूड़ियाँ और पकवान उड़ा रहे थे। मैंने हृदय से कहा, हृदय, मेरी इच्छा होती है कि मैं भी कृष्णकिशोर की एकादशी रखूँ। (सब हँसते हैं।) एक दिन ऐसा ही किया भी। खूब कसकर खाया। परन्तु उसके दूसरे दिन फिर कुछ न खाया गया।” (सब हँसते हैं।)

जो भक्त पंचवटी में हठयोगी को देखने गये थे, वे लौटे। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – “क्यों जी, कैसा देखा? अपने गज से तो नापा ही होगा?” श्रीरामकृष्ण ने देखा, भक्तों में कोई भी हठयोगी को रुपये देने के लिए राजी नहीं है।

२३ मार्च, १८८४ | परिच्छेद ७८ | ४७३

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२३ मार्च, १८८४परिच्छेद ७८४७३

श्रीरामकृष्ण – साधु को जब रुपये देने पड़ते हैं तब फिर वह नहीं भाता।

"राजेन्द्र मित्र की तनख्वाह आठ सौ रुपया महीना है – वह प्रयाग से कुम्भ मेला देखकर आया था। मैंने पूछा – 'क्यों जी, मेले में कैसे सब साधु देखे?' राजेन्द्र ने कहा – 'कहाँ? – वैसा साधु एक भी न देखा। एक को देखा था, परन्तु वह भी रुपया लेता था।'

"मैं सोचता हूँ, साधुओं को अगर कोई रुपया-पैसा न देगा तो वे खायेंगे क्या? यहाँ कुछ देना नहीं पड़ता, इसलिए सब आते हैं। मैं सोचता हूँ, इन लोगों को अपना पैसा बहुत प्यारा है। तो फिर रहें न उसी को लेकर।"

श्रीरामकृष्ण जरा विश्राम कर रहे हैं। एक भक्त छोटी खाट पर बैठे हुए उनके पैर दबा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भक्त से धीरे धीरे कह रहे हैं, "जो निराकार हैं वही साकार भी हैं। साकाररूप भी मानना चाहिए। काली-रूप की चिन्ता करते हुए साधक काली-रूप के ही दर्शन पाता है। फिर वह देखता है कि वह रूप अखण्ड में लीन हो गया। जो अखण्ड सच्चिदानन्द हैं वही काली भी हैं।"

(३)

श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले गोल बरामदे में महिमाचरण आदि के साथ हठयोगी की बातें कर रहे हैं। रामप्रसन्न भक्त कृष्णकिशोर के पुत्र हैं। इसीलिए श्रीरामकृष्ण उन पर स्नेह करते हैं।

श्रीरामकृष्ण – रामप्रसन्न उसी तरह अल्हड़पने में घूम रहा है। उस दिन यहाँ आकर बैठा, कुछ बोला भी नहीं; प्राणायाम साधकर श्वास चढ़ाये बैठा रहा। खाने को दिया, परन्तु खाया भी नहीं। एक और दूसरे दिन भी बुलाकर बैठाया। वह पैर पर पैर चढ़ाकर बैठा – कप्तान की ओर पैर करके। उसकी माँ का दुःख देखकर रोता हूँ।

(महिमाचरण से) "उस हठयोगी की बात तुमसे कहने के लिए उसने कहा था। प्रति दिन उसका साढ़े छः आने का खर्च है। इधर खुद कुछ न कहेगा!"

महिमा – कहने से सुनता कौन है! (श्रीरामकृष्ण और दूसरे हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आकर अपने आसन पर बैठे। पानिहाटी के श्रीयुत मणि सेन दो-एक मित्रों के साथ आये हैं, श्रीरामकृष्ण के हाथ टूटने के सम्बन्ध में पूछताछ कर रहे हैं। उनके साथियों में एक डाक्टर भी है।

श्रीरामकृष्ण आजकल डाक्टर प्रतापचन्द्र मजूमदार का इलाज कर रहे हैं। मणिबाबू के साथवाले डाक्टर ने उनकी चिकित्सा का अनुमोदन नहीं किया। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – "वह (प्रताप) कुछ बेवकूफ तो है नहीं, तुम क्यों ऐसी बात कह रहे हो?"

इसी समय लाटू ने जोर से पुकारकर कहा, "शीशी गिरकर फूट गयी है।"

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