श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१५ जून, १८८४ | परिच्छेद ८२ | ५२५
“एक बात और। कामिनी-कांचन ही मनुष्य को ईश्वर से विमुख करते हैं, उस ओर नहीं जाने देते। देखो न, अपनी स्त्री की सब लोग बड़ाई करते हैं। (सब हँसते हैं।) चाहे वह अच्छी हो या खराब। अगर पूछो, क्यों जी, तुम्हारी स्त्री कैसी है, तो उसी समय जवाब मिलता है, जी बहुत अच्छी है।”
प्रताप – तो मैं अब चलता हूँ।
प्रताप चले गये। श्रीरामकृष्ण की अमृतमयी, कामिनी और कांचन के त्याग की बात समाप्त नहीं हुई। सुरेन्द्र के बगीचे के पेड़ और उनकी पत्तियाँ दक्षिणी हवा के झोंकों में झूम रही थीं तथा मृदुल मर्मर शब्द सुना रही थीं। बातें उसी मर्मर शब्द के साथ मिल गयीं, भक्तों के हृदय में एक बार धक्का लगाकर अनन्त आकाश में विलीन हो गयीं।
कुछ देर बाद श्रीयुत मणिलाल मल्लिक ने श्रीरामकृष्ण से कहा, 'महाराज, अब दक्षिणेश्वर चलिये। आज वहाँ केशव सेन की माँ और उनके घर की स्त्रियाँ आपके दर्शनों के लिए आयेंगी। आपको वहाँ न पाकर सम्भव है, वे दुःखित हो वहाँ से लौट जायँ।'
केशव को शरीर छोड़े कई महीने हो गये हैं। उनकी वृद्धा माता और घर की स्त्रियाँ, श्रीरामकृष्ण को बहुत दिनों से न देखने के कारण, आज दक्षिणेश्वर में उनके दर्शन करने जायेंगी।
श्रीरामकृष्ण – (मणि मल्लिक से) – ठहरो बाबू, एक तो मेरी आँख नहीं लगी, जल्दबाजी इतनी न कर सकूँगा। वे गयी हैं, तो क्या किया जाय? वहाँ वे लोग बगीचे में टहलेंगी, आनन्द मनायेंगी।
कुछ देर विश्राम करके श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर चले। जाते समय सुरेन्द्र की कल्याण-कामना करते हैं। सब कमरों में एक-एक बार जाते हैं और मृदु स्वर से नामोच्चार कर रहे हैं। कुछ अधूरा न रखेंगे, इसीलिए खड़े हुए कह रहे हैं – 'मैंने उस समय पूड़ी नहीं खायी, थोड़ी सी ले आओ।'
बिलकुल जरा ही लेकर खा रहे हैं और कह रहे हैं – 'इसके बहुत से अर्थ हैं। पूड़ी नहीं खायी, यह याद आयेगा तो फिर आने की इच्छा होगी।' (सब हँसते हैं।)
मणि मल्लिक – (सहास्य) – अच्छा तो था, हम लोग भी आते। (भक्तमण्डली हँस रही है।)