श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
पृष्ठ 549, कुल 711 में से
संदर्भ में पढ़ेंDigitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri
परिच्छेद ८३
निष्काम भक्ति
दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के संग में
श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर मन्दिर में भक्तों के साथ अपने कमरे में बैठे हुए हैं। शाम हो गयी है, श्रीरामकृष्ण जगन्माता का स्मरण कर रहे हैं। कमरे में राखाल, अधर, मास्टर तथा और भी दो-एक भक्त हैं।
आज शुक्रवार है, जेष्ठ की कृष्णा द्वादशी, २० जून १८८४। पाँच दिन बाद रथयात्रा होगी। कुछ देर बाद ठाकुरबाड़ी में आरती होने लगी। अधर आरती देखने चले गये। श्रीरामकृष्ण मणि के साथ बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, बाबूराम की क्या पढ़ने की इच्छा है?
“बाबूराम से मैंने कहा, तू लोक-शिक्षण के लिए पढ़। सीता का उद्धार हो जाने पर विभीषण को राज्य करना पसन्द न आया। राम ने कहा, मूर्खों को शिक्षा देने के लिए तुम राज्य करो। नहीं तो वे कहेंगे, विभीषण ने राम की सेवा की, परन्तु क्या पाया? – राज्य देखकर उन्हें भी सन्तोष होगा।
“तुमसे कहता हूँ, उस दिन मैंने देखा, बाबूराम, भवनाथ और हरीश, ये प्रकृतिभाववाले हैं।
“बाबूराम को देखा कि वह देवीमूर्ति है। गले में माला, सखियाँ साथ हैं। उसने स्वप्न में कुछ पाया है, वह शुद्धसत्त्व है, थोड़े से यत्न से ही उसकी आध्यात्मिक जागृति हो जायेगी।
“बात यह है कि देह-रक्षा के लिए बड़ी असुविधा हो रही है। वह अगर आकर रहे तो अच्छा है। इन लड़कों का स्वभाव एक खास तरह का हो रहा है। नोटो (लाटू) ईश्वरी भाव में ही रहता है – वह तो शीघ्र ही ईश्वर में लीन हो जायेगा।
“राखाल का स्वभाव ऐसा हो रहा है कि मुझे ही उसे पानी देना पड़ता है। (मेरी) सेवा वह विशेष नहीं कर सकता।
“बाबूराम और निरंजन, इन्हें छोड़कर और लड़के कौन हैं? अगर कोई आता है, तो मालूम होता है कि उपदेश लेकर चला जायेगा।
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar