श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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५४२ श्री रामकृष्णवचनामृत २५ जून, १८८४
पड़ा कि किसी घोर इन्द्रियलोलुप मनुष्य ने उस ग्लास को छू लिया था।
पण्डितजी – (हाजरा से) – आप लोग इनके साथ दिनरात रहते हैं, आप लोग बड़े आनन्द में हैं।
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – आज मेरा बड़ा अच्छा दिन था। मैंने दूज का चाँद देखा। (सब हँसते हैं।) दूज का चाँद क्यों कहा, जानते हो? सीता ने रावण से कहा था, रावण, तू पूर्ण चन्द्र है और मेरे राम दूज के चाँद हैं। रावण ने इसका अर्थ नहीं समझा, उसे बड़ा आनन्द हुआ था। सीता के इस कथन का अर्थ यह है कि रावण की सम्पदा जहाँ तक बढ़ने को थी, बढ़ चुकी थी। अब दिनोंदिन पूर्ण चन्द्र की तरह उसका ह्रास ही होगा। श्रीरामचन्द्र दूज के चाँद हैं, उनकी दिनोंदिन वृद्धि होगी!
श्रीरामकृष्ण उठे। अपने बन्धु और बान्धवों के साथ पण्डितजी ने भक्तिपूर्वक उन्हें प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बिदा हुए।
(७)
संसार में किस प्रकार रहना चाहिए
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ ईशान के घर लौटे। अभी सन्ध्या नहीं हुई। ईशान के नीचेवाले बैठकखाने में आकर बैठे। कोई कोई भक्त भी उपस्थित हैं। भागवती पण्डित, ईशान तथा उनके लड़के भी हैं।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – शशधर से मैंने कहा, पेड़ पर चढ़ने के पहले ही फल की आकांक्षा करने लगे? – कुछ भजन साधन और करो, तब लोक-शिक्षा देना।
ईशान – सभी लोग सोचते हैं, मैं लोकशिक्षा दूँ। जुगनू सोचता है, संसार को प्रकाशित मैं कर रहा हूँ। इस पर किसी ने कहा भी था – 'ऐ जुगनू, क्या तुम भी संसार को प्रकाश दे सकते हो? तुम तो अँधेरे को और भी प्रकट करते हो!'
श्रीरामकृष्ण – (जरा मुस्कराकर) – परन्तु निरे पण्डित ही नहीं हैं, कुछ विवेक और वैराग्य भी है।
भाटपाड़ा के भागवती पण्डित भी अब तक बैठे हुए हैं। उम्र ७०-७५ होगी। वे टकटकी लगाये श्रीरामकृष्ण को देख रहे हैं।
भागवती पण्डित – (श्रीरामकृष्ण से) – आप महात्मा हैं।
श्रीरामकृष्ण – यह बात आप नारद, शुकदेव, प्रह्लाद, इन सब के लिए कह सकते हैं। मैं तो आपके पुत्र के समान हूँ।
"परन्तु एक दृष्टि से कह सकते हैं। यह लिखा है कि भगवान से भक्त बड़ा है, क्योंकि भक्त भगवान को हृदय में लिये हुए घूमता है। भक्त के लिए भगवान ने कहा है, 'भक्त मुझे छोटा देखता है और अपने को बड़ा।' यशोदा कृष्ण को बाँधने चली थीं।
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