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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 57
३४श्रीरामकृष्णवचनामृत२ अप्रैल, १८८२

उपस्थित थे। उनके मुख से समस्त वार्ता सुन १०-१५ दिन के अन्दर मास्टर ने दक्षिणेश्वर में श्रीरामकृष्ण का प्रथम दर्शन किया।

तीन मास बाद – अप्रैल मास में – श्रीरामकृष्ण कमलकुटीर में केशव को देखने आए। उसी का थोड़ासा विवरण निम्नलिखित परिच्छेद में दिया गया है।

श्रीरामकृष्ण का केशव के प्रति स्नेह। जगन्माता के पास नारियल-शक्कर की मन्नत

आज कमलकुटीर के उसी बैठक-घर में श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ बैठे हैं। २ अप्रैल १८८२ ई., रविवार, दिन के पाँच बजे का समय। केशव भीतर के कमरे में थे। उन्हें समाचार दिया गया। कमीज पहनकर और चद्दर ओढ़कर उन्होंने आकर प्रणाम किया। उनके भक्त मित्र कालीनाथ बसु रुग्ण हैं, वे उन्हें देखने जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण आए हैं, इसलिए केशव नहीं जा सके। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “तुम्हें बहुत काम रहता है, फिर अखबार में भी लिखना पड़ता है, वहाँ (दक्षिणेश्वर) जाने का अवसर नहीं रहता। इसलिए मैं ही तुम्हें देखने आ गया हूँ। तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है, यह जानकर नारियल-शक्कर की मन्नत मानी थी। माँ से कहा, माँ, यदि केशव को कुछ हो जाय तो फिर कलकत्ता जाकर किसके साथ बात करूँगा?”

श्री प्रताप आदि ब्राह्मभक्तों के साथ श्रीरामकृष्ण वार्तालाप कर रहे हैं। पास ही मास्टर को बैठे देख वे केशव से कहते हैं, “वे वहाँ पर (दक्षिणेश्वर में) क्यों नहीं जाते हैं, पूछो तो! इतना ये कहते हैं कि स्त्री-बच्चों पर मन नहीं है।” एक मास से कुछ अधिक समय हुआ, मास्टर श्रीरामकृष्ण के पास आया जाया करते हैं। बाद में जाने में कुछ दिनों का विलम्ब हुआ। इसीलिए श्रीरामकृष्ण इस प्रकार कह रहे हैं। उन्होंने कह दिया था, ‘आने में देरी होने पर मुझे पत्र देना।’

ब्राह्मभक्तगण श्री सामाध्यायी को दिखाकर श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं, “आप विद्वान् हैं। वेद शास्त्रादि का आपने अच्छा अध्ययन किया है।” श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “हाँ, इनकी आँखों में से इनका भीतरी भाग दिखायी दे रहा है। ठीक जैसे खिड़की की काँच में से घर के भीतर की चीजें दिखायी देती हैं।”

श्री त्रैलोक्य गाना गा रहे हैं। गाना हो रहा है। इतने में ही सन्ध्या का दिया जलाया गया। गाना सुनते सुनते श्रीरामकृष्ण एकाएक खड़े हो गए, और ‘माँ’ का नाम लेते लेते समाधिमग्न हो गए। कुछ स्वस्थ होकर स्वयं ही नृत्य करते करते गाना गाने लगे जिसका आशय इस प्रकार है :-

“मैं सुरापान नहीं करता, ‘जय काली’ कहता हुआ सुधा का पान करता हूँ। वह सुधा मुझे इतना मतवाला बना देती है कि लोग मुझे नशाखोर कहते हैं। गुरुजी का दिया