श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २ अप्रैल, १८८२ | परिच्छेद ६ | ३५ |
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हुआ गुड़ लेकर उसमें प्रवृत्ति का मसाला मिलाकर ज्ञानरूपी कलार उससे शराब बनाता है और मेरा मतवाला मन उसे मूलमन्त्ररूपी बोतल में से पीता है। पीने के पहले 'तारा' कहकर मैं उसे शुद्ध कर लेता हूँ। 'रामप्रसाद' कहता है कि ऐसी शराब पीने पर धर्म-अर्थादि चतुवर्ग की प्राप्ति होती है।”
श्री केशव को श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्ण नेत्रों से देख रहे हैं, मानो अपने निजी हैं। और मानो भयभीत हो रहे हैं कि कहीं केशव किसी दूसरे के अर्थात् संसार के न बन जाएँ। उनकी ओर ताकते हुए श्रीरामकृष्ण ने फिर गाना प्रारम्भ किया, जिसका भावार्थ इस प्रकार का है –
“बात करने से भी डरती हूँ, न करने से भी डरती हूँ। हे राधे, मन में सन्देह होता है कि कहीं तुम जैसी निधि को गवाँ न बैठूँ। हम तुम्हें वह मन्त्र बतलाती हैं जिससे हम विपत्ति से पार हो गयी हैं और जो लोगों को भी विपत्ति से पार कर देता है। अब तुम्हारी जैसी इच्छा।” अर्थात् सब कुछ छोड़ भगवान् को पुकारो, वे ही सत्य हैं और सब अनित्य है। उन्हें प्राप्त किए बिना कुछ भी न होगा – यही महामन्त्र है।
फिर बैठकर भक्तों के साथ वार्तालाप कर रहे हैं।
उनके लिए जलपान की तैयारी हो रही है। हाल के एक कोने में एक ब्राह्मभक्त पियानो बजा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण प्रसन्नवदन हो बालक की तरह पियानो के पास खड़े होकर देख रहे हैं। थोड़ी देर बाद उन्हें अन्तःपुर में ले जाया गया, – वहाँ वे जलपान करेंगे और महिलाएँ उन्हें प्रणाम करेंगी।
श्रीरामकृष्ण का जलपान समाप्त हुआ। अब वे गाड़ी में बैठे। ब्राह्मभक्तगण सभी गाड़ी के पास खड़े हैं। कमलकुटीर से गाड़ी दक्षिणेश्वर की ओर चली।
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