श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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परिच्छेद ७
श्रीरामकृष्ण तथा ईश्वरचन्द्र विद्यासागर
(१)
श्री विद्यासागर का मकान
आज शनिवार है, श्रावण कृष्णा षष्ठी, ५ अगस्त १८८२ ई.। दिन के चार बजे होंगे।
श्रीरामकृष्ण किराये की गाड़ी पर कलकत्ते के रास्ते बाडुड़बागान की तरफ जा रहे हैं। भवनाथ, हाजरा और मास्टर साथ में हैं। आप पण्डित ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के घर जाएँगे।
श्रीरामकृष्ण की जन्मभूमि जिला हुगली के अन्तर्गत कामारपुकुर गाँव है, जो पण्डित विद्यासागर की जन्मभूमि वीरसिंह गाँव के पास है। श्रीरामकृष्णदेव बाल्यकाल से ही विद्यासागर की दया की चर्चा सुनते आए हैं। दक्षिणेश्वर के कालीमन्दिर में प्रायः उनके पाण्डित्य और दया की बातें सुना करते हैं। यह सुनकर कि मास्टर विद्यासागर के स्कूल में पढ़ाते हैं, आपने उनसे पूछा, "क्या मुझे विद्यासागर के पास ले चलोगे? मुझे उन्हें देखने की बड़ी इच्छा होती है।" मास्टर ने जब विद्यासागर से यह बात कही तो उन्होंने हर्ष के साथ किसी शनिवार को चार बजे उन्हें साथ लाने को कहा। केवल यही पूछा - "कैसे परमहंस हैं? क्या वे गेरुए कपड़े पहनते हैं?" मास्टर ने कहा - "जी नहीं, वे एक अद्भुत पुरुष हैं; लाल किनारीदार धोती पहनते हैं, कुरता पहनते हैं, पालिश किए हुए स्लीपर पहनते हैं, रानी रासमणि के कालीमन्दिर की एक कोठरी में रहते हैं, जिसमें एक तखत है और उस पर बिस्तर और मच्छरदानी, उस बिस्तर पर लेटते हैं। कोई बाहरी भेष तो नहीं है, पर सिवाय ईश्वर के और कुछ नहीं जानते, अहर्निश उन्हीं का चिन्तन किया करते हैं।"
गाड़ी दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर से चलकर श्यामबाजार होते हुए अब अमहर्स्ट स्ट्रीट में आयी है। भक्त लोग कह रहे हैं कि अब बाडुड़बागान के पास आयी है। श्रीरामकृष्ण बालक की भाँति आनन्द से बातचीत करते हुए आ रहे हैं। अमहर्स्ट स्ट्रीट में आकर एकाएक उनका भावान्तर हुआ - मानो ईश्वरावेश होना चाहता है।
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar