श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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| ५ अगस्त, १८८२ | परिच्छेद ७ | ३७ |
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गाड़ी राममोहन राय के बाग की बगल से आ रही है। मास्टर ने श्रीरामकृष्ण का भावान्तर नहीं देखा, झट कह दिया – 'यह राममोहन राय का बाग है।' श्रीरामकृष्ण नाराज हुए, कहा, 'अब ये बातें अच्छी नहीं लगतीं।' आप भावाविष्ट हो रहे हैं।
विद्यासागर के मकान के सामने गाड़ी खड़ी हुई। मकान दुमंजिला है, साहबी ढंग से सजा हुआ है। मकान के चारों ओर खुली जगह है जो दीवार से घिरी हुई है। मकान के पश्चिम की ओर फाटक है। आँगन में बीच बीच में पुष्पवृक्ष लगे हुए हैं। नीचे पश्चिमवाले कमरे में ऊपर चढ़ने के लिए जीना है। विद्यासागर ऊपर रहते हैं। जीने से चढ़कर ऊपर जाते ही उत्तर की ओर एक कमरा है, उसके पूर्व की ओर एक हाल है। हॉल के दक्षिण-पूर्ववाले कमरे में विद्यासागर सोया करते हैं। दक्षिण की ओर और एक कमरा है। ये सारे कमरे कीमती पुस्तकों से भरे हैं। पुस्तकों पर सुन्दर जिल्द लगवाकर उन्हें अच्छी तरह सजाकर रखा गया है। हॉल के पूर्व की ओर मेज और कुर्सी है। यहीं बैठकर विद्यासागर काम किया करते हैं। जो लोग उनसे मिलने आते हैं वे मेज के तीनों ओर रखी हुई कुर्सियों पर बैठा करते हैं। मेज पर कागज, कलम, स्याही आदि लिखने की वस्तुएँ, बहुतसी चिट्ठियाँ, और कुछ पुस्तकें रखी हुई हैं। इस मेज के दक्षिण दिशा के कमरे में एक छोटा बिछौना है। यहींपर आप शयन करते हैं।
मेज पर जो चिट्ठियाँ रखी हुई हैं उनमें क्या लिखा है? शायद किसी विधवा ने लिखा है, 'मेरा नाबालिग बच्चा अनाथ है, उसकी ओर देखनेवाला कोई नहीं, आप ही को उसकी ओर देखना होगा।' किसी ने लिखा है, 'आप कहीं चले गए थे, इसलिए हमें इस माह का पैसा समय पर नहीं मिला, बड़ी तकलीफ हुई।' किसी गरीब छात्र ने लिखा है, 'आपके स्कूल में निःशुल्क भरती तो हो गया हूँ, पर मुझमें पुस्तकें खरीदने की भी सामर्थ्य नहीं है।' किसी ने लिखा है, 'मेरे परिवार के लोगों को खाने को नहीं मिल रहा है – मुझे एक नौकरी लगवा देनी होगी।' उनके स्कूल के किसी शिक्षक ने लिखा है, 'मेरी बहन विधवा हो गयी है, उसका सारा भार मुझ पर आ पड़ा है, इतनी तनख्वाह में मेरा गुजर नहीं हो पाएगा।' शायद किसी ने विलायत से पत्र लिखा है, 'मैं यहाँ विपत्ति में पड़ा हूँ; आप दीनबन्धु हैं, कुछ मदद भेजकर इस संकट से मेरी रक्षा करें।' किसी ने लिखा है, 'अमुक तारीख को हमारे फैसले का दिन निश्चित हुआ है, उस दिन आप आकर हमारा झगड़ा मिटा दें।'
श्रीरामकृष्णदेव गाड़ी से उतरे। मास्टर राह बताते हुए आपको मकान के भीतर ले जा रहे हैं। आँगन में फूलों के पेड़ हैं। उनके बीच में से जाते हुए श्रीरामकृष्ण बालक की तरह बटन में हाथ लगाकर मास्टर से पूछ रहे हैं, "कुरते के बटन खुले हुए हैं – इसमें कुछ हानि तो न होगी?" बदन पर एक सूती कुरता है और लाल किनारे की धोती पहने हुए हैं, जिसका एक छोर कन्धे पर पड़ा हुआ है। पैरों में स्लीपर है। मास्टर ने कहा –
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar