श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ श्रीरामकृष्णवचनामृत ५ अगस्त, १८८२
“आप इस सब के लिए चिन्ता न कीजिये, आपकी कहीं कुछ त्रुटि न होगी। आपको बटन नहीं लगाना पड़ेगा।” समझाने पर लड़का जैसे शान्त हो जाता है, आप भी वैसे शान्त हो गए।
विद्यासागर
श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ जीने से चढ़कर पहले कमरे में (जो उत्तर की तरफ था) गए। कमरे में उत्तरी हिस्से में विद्यासागर दक्षिणाभिमुख बैठे हैं। सामने एक चौकोर लम्बी चिकनी मेज है। इसी के पास एक बेंच है। मेज के आसपास कुछ कुर्सियाँ हैं। विद्यासागर दो एक मित्रों से बातचीत कर रहे थे।
श्रीरामकृष्ण के प्रवेश करते ही विद्यासागर ने खड़े होकर उनका स्वागत किया। श्रीरामकृष्ण मेज के पूर्व की ओर खड़े हैं – बायाँ हाथ मेज पर है; पीछे वह बेंच है। विद्यासागर को पूर्वपरिचित की भाँति एकटक देखते हैं और भावावेश में हँसते हैं।
विद्यासागर की उम्र तिरसठ के लगभग होगी। श्रीरामकृष्ण से वे सोलह-सत्रह वर्ष बड़े होंगे। मोटी धोती पहने हुए हैं, पैरों में स्लीपर, और बदन में एक आधी आस्तीन का फलालैन का कुरता। सिर का निचला हिस्सा चारों तरफ उड़िया लोगों की तरह मुँड़ा हुआ है। बोलने के समय उज्ज्वल दाँत नजर आते हैं – सभी दाँत नकली हैं। सिर खूब बड़ा है, ललाट ऊँचा है और कद कुछ छोटा। ब्राह्मण हैं, इसलिए गले में जनेऊ है।
विद्यासागर में अनेक गुण हैं। पहला गुण – विद्यानुराग। एक दिन मास्टर से यह कहते हुए सचमुच ही रो पड़े थे कि मेरी तो तीव्र इच्छा थी कि खूब विद्या-अध्ययन करूँ, पर कुछ न हो सका; संसार में पड़ जाने के कारण बिलकुल समय नहीं मिला। दूसरा गुण – सर्व जीवों पर दया। विद्यासागर दया के सागर हैं। बछड़ों को माँ का दूध नहीं मिलता यह देखकर दूध पीना छोड़ ही दिया था; आखिर कई साल बाद स्वास्थ्य बहुत अधिक बिगड़ जाने के कारण फिर दूध शुरू करना पड़ा था। गाड़ी में नहीं चढ़ते थे – घोड़ा बेचारा अपना कष्ट जता नहीं सकता, चुपचाप सहता जाता है। एक दिन आपने देखा, एक बोझ ढोनेवाले हम्माल को हैजा हो गया है, वह रास्ते पर पड़ा हुआ है, पास ही उसकी टोकरी पड़ी है। देखते ही आप स्वयं उसे उठाकर अपने घर ले आए और उसकी सेवाशुश्रूषा करने लगे। तीसरा गुण – स्वाधीनताप्रीति। अधिकारियों के साथ एकमत न होने के कारण संस्कृत कालेज के प्रधानाध्यापक (प्रिन्सिपल) का पद छोड़ दिया। चौथा गुण – लोगों की निन्दास्तुति की परवाह नहीं थी। एक शिक्षक पर आपका स्नेह था, उनकी बेटी के विवाह के समय बगल में उसे उपहार देने के लिए नया वस्त्र दाबकर आ खड़े हुए। पाँचवाँ गुण – मातृभक्ति तथा मानसिक बल। माँ ने कहा था, 'ईश्वर, तुम यदि इस विवाह में (भाई के विवाह में) नहीं आओगे तो मेरे मन में बड़ा दुख होगा।' इसलिए कलकत्ते से पैदल