श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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३ जुलाई, १८८४ परिच्छेद ८६ ५७१
कौन निस्तार करनेवाला है? तुम स्वर्ग हो, मर्त्य और पाताल हो। हरि, ब्रह्मा और द्वादश गोपाल भी तुम्हीं से हुए हैं; ऐ माँ, तुम दसों महाविद्याएँ हो, दस बार तुमने अवतार लिया है। अबकी बार किसी तरह मुझे पार करना ही होगा। माँ, तुम चल हो, अचल हो, तुम सूक्ष्म हो, तुम स्थूल हो, सृष्टि-स्थिति और प्रलय तुम हो, तुम इस विश्व की मूल हो। तुम तीनों लोक की जननी हो, तीनों लोक की त्राणकारिणी हो। तुम सब की शक्ति हो, तुम स्वयं अपनी शक्ति हो।
इस गाने को सुनकर श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया। गाना समाप्त होने पर खुद गाने लगे। उनके बाद वैष्णवचरण ने फिर गाया। इस बार उन्होंने कीर्तन गाया। कीर्तन सुनते ही श्रीरामकृष्ण निर्बीज समाधि में लीन हो गये। शशधर की आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी।
श्रीरामकृष्ण समाधि से उतरे। गाना भी समाप्त हो गया। शशधर, प्रताप, रामदयाल, राम, मनमोहन आदि बालक भक्त तथा और भी बहुत से आदमी बैठे हैं। श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, तुम लोग कुछ छेड़ते क्यों नहीं? (शशधर से कुछ पूछते क्यों नहीं?)
रामदयाल – (शशधर से) – ब्रह्म की रूप-कल्पना शास्त्रों में है, परन्तु वह कल्पना करते कौन हैं?
शशधर – ब्रह्म स्वयं। वह मनुष्य की कल्पना नहीं।
प्रताप – क्यों, वे रूप की कल्पना क्यों करते हैं?
श्रीरामकृष्ण – उनकी इच्छा, वे इच्छामय जो हैं। वे किसी से सलाह करके कुछ थोड़े ही करते हैं? क्यों वे करते हैं, इस बात से हमें क्या मतलब? बगीचे में आम खाने के लिए आये हो, आम खाओ – कितने पेड़ हैं, कितनी हजार डालियाँ हैं, कितने लाख पत्ते हैं, इस हिसाब से क्या काम? वृथा तर्क और विचार करने से वस्तुलाभ नहीं होता।
प्रताप – तो अब विचार न करें?
श्रीरामकृष्ण – वृथा तर्क और विचार न करो। हाँ, सदसत् का विचार करो कि क्या नित्य है और क्या अनित्य – काम, क्रोध और शोक आदि के समय में।
पण्डितजी – वह और चीज है, उसे विवेकात्मक विचार कहते हैं।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, सदसत् विचार। (सब चुप हैं।)
श्रीरामकृष्ण – (पण्डितजी से) – पहले बड़े बड़े आदमी आते थे।
पण्डितजी – क्या धनी आदमी?
श्रीरामकृष्ण – नहीं, बड़े बड़े पण्डित।
इतने में छोटा रथ बाहर के दुमंजले वाले बरामदे में लाया गया। श्रीजगन्नाथ, बलराम और सुभद्रादेवी पर अनेक प्रकार की फूल-मालाएँ पड़ी हुई उनकी शोभा बढ़ा रही
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