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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 593

५७० श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ जुलाई, १८८४

श्रीरामकृष्ण – प्रकृति के अनुसार भक्ति तीन तरह की है। भक्ति का सत्त्व, भक्ति का रज और भक्ति का तम।

"भक्ति का सत्त्व ईश्वर ही समझ सकते हैं। उस तरह का भक्त भाव छिपाना पसन्द करता है। कभी वह मसहरी के भीतर बैठकर ध्यान करता है। कोई समझ नहीं सकता। सत्त्व का सत्त्व अर्थात् शुद्ध सत्त्व के बन जाने पर फिर ईश्वर-दर्शन में देर नहीं रहती; जैसे पूरब की ओर ललाई छा जाने पर यह समझने में देर नहीं होती कि अब शीघ्र ही सूरज निकलेंगे।

"जिसे भक्ति का रजोभाव होता है, उसकी इच्छा होती है कि लोग देखें, जानें कि मैं भक्त हूँ। वह षोडशोपचार से उनकी पूजा करता है। रेशम की धोती पहनकर श्रीठाकुर-मन्दिर में जाता है, गले में रुद्राक्ष की माला धारण करता है जिसमें मुक्ता और कहीं कहीं सोने के दाने पड़े रहते हैं!

"भक्ति का तमोभाव वह है जिसमें डाके का मतलब दीख पड़े। डाकू बड़े बड़े हथियार लेकर डाका डालते हैं, आठ थानेदारों को भी नहीं डरते – मुख पर 'मारो – लूट लो' लगा रहता है; पागल की तरह 'बम शंकर' कहते जाते हैं; मन में पूरा भरोसा, पक्का बल और जीता-जागता विश्वास!

"शाक्तों का भी विश्वास ऐसा ही है। – क्या, एक बार मैं काली का नाम ले चुका, दुर्गा को पुकारा, राम-नाम जपा, इतने पर भी मुझे पाप छू ले?

"वैष्णवों के भाव में बड़ी दीनता है। वे लोग बस माला फेरते रहते हैं, रोते-कलपते हुए कहते हैं, हे कृष्ण! दया करो, मैं अधम हूँ, मैं पापी हूँ!

"ज्वलन्त विश्वास चाहिए। ऐसा विश्वास कि मैंने उनका नाम लिया है, मुझे फिर कैसा पाप? – पर कुछ लोग रात-दिन ईश्वर का नाम लेते हैं और कहते हैं – मैं पापी हूँ!"

यह कहते ही श्रीरामकृष्ण का प्रेम-पारावार उमड़ चला। वे गाने लगे। गाना सुनकर शशधर की आँखों में आँसू आ गये। गीतों का भाव यह है –

(१) यदि दुर्गा-दुर्गा कहते हुए मेरे प्राण निकलेंगे तो अन्त में इस दीन को तुम कैसे नहीं तारती हो, मैं देखूँगा। ब्राह्मणों का नाश करके, गर्भपात करके, मदिरा पीकर और स्त्री-हत्या करके भी मैं नहीं डरता। मुझे विश्वास है कि इतने पर भी मुझे ब्रह्मपद की प्राप्ति होगी।

(२) शिव के साथ सदा ही रंग करती हुई तू आनन्द में मग्न है। सुधापान करके, तेरे पैर तो लड़खड़ा रहे हैं, पर, माँ, तू गिर नहीं जाती।

अब अधर के गवैये वैष्णवचरण गा रहे हैं – भाव इस प्रकार है।

(१) ऐ मेरी रसने, सदा दुर्गा-नाम का जप कर। बिना दुर्गा के इस दुर्गम मार्ग में और