श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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५८२ श्रीरामकृष्णवचनामृत ३ अगस्त, १८८४
बिना कभी संशय दूर नहीं होता।
“बात यह है कि किसी तरह उन पर भक्ति होनी चाहिए, प्यार होना चाहिए। अनेक खबरों से काम क्या है? एक रास्ते से चलते चलते अगर उन पर प्यार हो जाय तो काम बन गया। प्यार के होने से ही उन्हें आदमी पाता है। इसके बाद अगर जरूरत होगी तो वे समझा देंगे – सब रास्तों की खबर बतला देंगे। ईश्वर पर प्यार होने ही से काम हुआ – तरह तरह के विचारों की क्या आवश्यकता है? आम खाने के लिए आये हो आम खाओ, कितनी डालियाँ हैं, कितने पत्ते हैं, इन सब के हिसाब से क्या मतलब? हनुमान का भाव चाहिए – ‘मैं वार, तिथि, नक्षत्र, यह सब कुछ नहीं जानता, मैं तो बस श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया करता हूँ।’ ”
मणि – इस समय ऐसी इच्छा होती है कि कर्म बिलकुल घट जायँ और ईश्वर की तरफ मन लगाऊँ।
श्रीरामकृष्ण – अहा! यह होगा क्यों नहीं?
“परन्तु ज्ञानी निर्लिप्त होकर संसार में रह सकता है।”
मणि – जी हाँ, परन्तु निर्लिप्त होकर रहने के लिए विशेष शक्ति चाहिए।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, यह ठीक है। परन्तु तुमने संसार चाहा होगा।
“श्रीकृष्ण राधिका के हृदय में ही थे, परन्तु राधा की इच्छा उनके साथ मनुष्य-रूप में लीला करने की हुई। इसीलिए वृन्दावन में इतनी लीलाएँ हुई। अब प्रार्थना करो जिससे तुम्हारे सांसारिक कर्म सब घट जायँ।
“और मन से त्याग होने से तुम्हें अन्तिम ध्येय की प्राप्ति हो जायगी।”
मणि – यह तो उनके लिए है जो बाहर का त्याग नहीं कर सकते। ऊँचे दर्जेवालों के लिए तो एक साथ ही सब त्याग होना चाहिए – बाहर का भी और भीतर का भी।
श्रीरामकृष्ण चुप हैं। फिर बातचीत करने लगे।
श्रीरामकृष्ण – तुमने वैराग्य की बातें उस समय कैसी सुनीं?
मणि – जी हाँ, खूब।
श्रीरामकृष्ण – वैराग्य का अर्थ क्या है, जरा कहो तो – सुनूँ।
मणि – वैराग्य का अर्थ सिर्फ संसार से विराग नहीं, ईश्वर पर अनुराग और संसार से विराग है।
श्रीरामकृष्ण – हाँ, ठीक कहा।
“संसार में धन की जरूरत है अवश्य, परन्तु उसके लिए अधिक चिन्ता न करना। यदृच्छालाभ – यही अच्छा है। संचय के लिए इतना न सोचा करो। जो लोग उन्हें मन और अपने प्राण सौंप देते हैं, जो उनके भक्त हैं – शरणागत हैं, वे लोग यह सब इतना नहीं सोचते। जहाँ आय है वहाँ व्यय भी है। एक ओर से रुपया आता है, दूसरी ओर से
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