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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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३ अगस्त, १८८४ | परिच्छेद ८७ | ५८३

खर्च हो जाता है। इसका नाम है यदृच्छालाभ।”

श्रीरामकृष्ण हरिपद की बातें कहने लगे – “उस दिन हरिपद आया था।”

मणि – (सहास्य) – हरिपद कथक है। प्रह्लाद-चरित्र, श्रीकृष्ण की जन्मकथा, यह सब सस्वर बहुत अच्छा कहता है।

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, उस दिन मैंने उसकी आँखें देखीं, जान पड़ता था, गुस्से में है। मैंने पूछा, क्या तू ध्यान ज्यादा करता है? वह सिर झुकाये बैठा रहा। तब मैंने कहा, अरे! इतना अच्छा नहीं।

शाम हो गयी है। श्रीरामकृष्ण माता का नाम ले रहे हैं – उनका स्मरण कर रहे हैं।

कुछ देर बाद श्रीठाकुर-मन्दिर में आरती होने लगी। आज सावन की शुक्ला द्वादशी है। झूलनोत्सव का दूसरा दिन है। आकाश में चन्द्रोदय हो गया। मन्दिर, मन्दिर का आँगन, बगीचा, सारे स्थान हँस रहे हैं। धीरे धीरे रात के आठ बजे। कमरे में श्रीरामकृष्ण बैठे हैं। राखाल और मास्टर भी हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – बाबूराम कहता है – ‘संसार! अरे बापरे!’

मास्टर – यह सुनी बात है। बाबूराम अभी संसार का हाल क्या जाने!

श्रीरामकृष्ण – हाँ यह ठीक है। निरंजन को देखा है तुमने? – बड़ा सरल है।

मास्टर – जी हाँ। उसके चेहरे में ही आकर्षण है – खींच लेता है। आँखों का भाव कैसा है!

श्रीरामकृष्ण – आँखों का ही भाव नहीं, सब कुछ। उसके विवाह की बात घरवालों ने की थी, उसने कहा, क्यों मुझे डुबाते हो? (हँसते हुए) क्यों जी, लोग कहते हैं, दिन भर मेहनत करके शाम को बीबी के पास जाकर बैठने से बड़ा आनन्द आता है – यह कैसा है?

मास्टर – जी हाँ, जो लोग उसी भाव में हैं, उन्हें आनन्द आता क्यों नहीं? (राखाल से) परीक्षा हो रही है – Leading Question.

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – माँ कहती है, मैं अपने बच्चे का विवाह कर दूँ, तो जी ठिकाने हो। धूप में झुलसकर छाँह में थोड़ी देर बैठेगा, तो कुछ ठण्डा तो हो ही लेगा!

मास्टर – जी हाँ। माँ-बाप भी तरह-तरह के होते हैं। ज्ञानी पिता कभी अपने बच्चों को विवाह के बन्धन में नहीं डालता और अगर वह ऐसा करता है तब तो क्या कहना चाहिए उसके ज्ञान को! (श्रीरामकृष्ण हँसते हैं।)

श्रीयुत अधर सेन कलकत्ते से आये हैं। श्रीरामकृष्ण को भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया, जरा देर बैठकर काली के दर्शन करने चले गये।

मास्टर ने भी काली के दर्शन किये। फिर चाँदनी-घाट पर आकर गंगा के तट पर बैठे। गंगा का पानी ज्योत्स्ना में चमक रहा है। ज्वार का आना अभी शुरू हुआ है। मास्टर


CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar