भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

DevanagariHindipublished711 पृष्ठ

पृष्ठ 644, कुल 711 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 644

१९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९१ | ६२१

कहने में दोष नहीं है। तान्त्रिक को सब कुछ गुप्त रखना पड़ता है। इसीलिए तान्त्रिक को अच्छी तरह कोई समझ नहीं सकता।

(गोस्वामी से) “आप लोग अच्छे हैं। कितना जप करते हैं? और हरिनाम की संख्या क्या है?”

गोस्वामी - (विनय भाव से) - जी, मैं क्या करता हूँ। मैं अत्यन्त अधम - नीच हूँ।

श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - दीनता, यह अच्छा तो है। एक भाव और है - 'मैं उनका नाम ले रहा हूँ, मुझे फिर पाप कैसा!' जो लोग, दिन रात 'मैं पापी हूँ, मैं अधम हूँ' ऐसा किया करते हैं, वे वैसे ही हो जाते हैं। कितना अविश्वास है! उनका इतना नाम ले करके भी पाप-पाप कहता है!

गोस्वामी यह बात आश्चर्यचकित हो सुन रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण - मैंने भी वृन्दावन में भेष (वैष्णवों का) धारण किया था। पन्द्रह दिन तक रखा था। (भक्तों से) सब भावों की उपासना कुछ-कुछ दिनों तक करता था। तब शान्ति होती थी।

(सहास्य) “मैंने सब तरह किया है - सब शास्त्रों को मानता हूँ। शाक्तों को भी मानता हूँ और वैष्णवों को भी। उधर वेदान्तवादियों को भी मानता हूँ। यहाँ इसीलिए सब मतों के आदमी आया करते हैं। और सब यही सोचते हैं कि ये हमारे मत के आदमी हैं। आजकल के ब्राह्म-समाजवालों को भी मानता हूँ।

“एक आदमी के पास एक रंग का गमला था। उस गमले में एक बड़े आश्चर्य का गुण यह था कि जिस किसी रंग में वह कपड़े रँगना चाहता था, उसी रंग में कपड़े रंग जाते थे।

“परन्तु किसी होशियार आदमी ने कहा, तुमने इसमें जो रंग घोला है वही रंग मुझे दो। (श्रीरामकृष्ण और सब हँसते हैं।)

“एक ही ढर्रे का मैं क्यों हो जाऊँ? 'अमुक मत के आदमी फिर न आयेंगे' मुझे इसका भय नहीं है। कोई आये चाहे न आये, मुझे इसकी जरा भी परवाह नहीं है। लोग मेरी मुट्ठी में रहेंगे, ऐसी कोई बात मेरे मन में है ही नहीं। अधर सेन ने बड़ी नौकरी के लिए माँ से कहने के लिए कहा था - उसको वह काम नहीं मिला। वह अगर इसके लिए कुछ सोचे तो मुझे इसकी जरा भी परवाह नहीं है।

“केशव सेन के घर जाने पर एक और भाव हुआ। वे लोग निराकार-निराकार किया करते हैं। इस पर, जब भावावेश हुआ तो मैंने कहा - माँ, यहाँ न आना, ये लोग तेरे रूप को नहीं मानते।”

साम्प्रदायिकता के विरोध की बात सुनकर गोस्वामीजी चुपचाप बैठे हुए हैं।

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित) · पृष्ठ 644, कुल 711 में से · BharatKosha