श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६२२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १९ सितम्बर, १८८४
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – विजय इस समय बहुत अच्छा हो गया है।
“हरिनाम करते हुए जमीन पर गिर जाता है।
“प्रातः चार बजे तक कीर्तन और ध्यान, यह सब लेकर रहता है। इस समय गेरुआ पहने हुए है। देव-विग्रह देखता है तो एकदम साष्टांग प्रणाम करता है।
“जहाँ गदाधर* की पाठशाला थी वहाँ विजय को ले गया था और कहा, यहीं वे ध्यान करते थे। बस कहने के साथ ही उसने साष्टांग प्रणाम किया।
“चैतन्यदेव के चित्र के सामने फिर साष्टांग प्रणाम किया।”
गोस्वामी – राधाकृष्ण की मूर्ति के सामने ?
श्रीरामकृष्ण – साष्टांग प्रणाम! और बड़ा आचारी है।
गोस्वामी – अब समाज में लिया जा सकता है।
श्रीरामकृष्ण – लोग क्या कहेंगे, इसकी उसे कोई चिन्ता नहीं है।
गोस्वामी – ऐसे आदमी को प्राप्त कर समाज भी कृतार्थ हो सकता है।
श्रीरामकृष्ण – मुझे बहुत मानता है।
“उसे पाना ही मुश्किल हो रहा है। आज ढाके से बुलावा आता है तो कल किसी दूसरी जगह से; इस तरह सदा ही काम में उलझा रहता है।
“उसके समाजवालों में बड़ी गडबड़ी मची हुई है।”
गोस्वामी – क्यों?
श्रीरामकृष्ण – उसे लोग कह रहे हैं, तुम साकारवादियों के साथ मिल रहे हो, तुम पौत्तलिक हो।
“और बड़ा उदार और सरल है। सरल हुए बिना ईश्वर की कृपा नहीं होती।”
'गृहस्थ, आगे बढ़ो।' अभ्यासयोग
अब श्रीरामकृष्ण मुखर्जियों से बातचीत कर रहे हैं। महेन्द्र उनमें बड़े हैं, व्यवसाय करते हैं, किसी की नौकरी नहीं करते। छोटे प्रियनाथ इंजीनियर थे, अब उन्होंने कुछ धनोपार्जन कर लिया है, अब नौकरी नहीं करते। बड़े भाई की उम्र ३५-३६ के लगभग होगी। उनका मकान केडेटी मौजे में है। कलकत्ते के बागबाजार में भी उनका अपना मकान है।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – कुछ उद्दीपना हो रही है, यह देखकर चुप्पी न साध जाना। बढ़ जाओ! चन्दन की लकड़ी के बाद और भी चीजें हैं – चाँदी की खान – सोने की खान!
प्रिय – (सहास्य) – जी, पैरों में जो बेड़ियाँ पड़ी हुई हैं, उनके कारण बढ़ा नहीं
* एक प्रसिद्ध वैष्णव साधु