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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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१९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९१ ६२३

जाता।

श्रीरामकृष्ण – पैरों के बन्धन से क्या होता है? बात असल मन की है।

“मन के द्वारा ही आदमी बँधा हुआ है और उसी के द्वारा छूटता भी है। दो मित्र थे। एक वेश्या के घर गया। दूसरा भागवत सुन रहा था। पहला सोच रहा था, मुझे धिक्कार है, मेरा मित्र भागवत सुन रहा है और मैं वेश्या के यहाँ पड़ा हुआ हूँ। उधर दूसरा सोच रहा था, मैं बड़ा बेवकूफ हूँ, मेरा मित्र तो मजा लूट रहा है और मैं यहाँ आकर फँस गया। पर देखो, वेश्या के यहाँ जानेवाले को तो विष्णुदूत आकर वैकुण्ठ में ले गये और दूसरे को यमदूतों ने नरक में घसीटकर डाल दिया।

प्रिय – मन मेरे बस में भी तो नहीं है।

श्रीरामकृष्ण – यह क्या! अभ्यासयोग – अभ्यास करो, फिर देखोगे मन को जिस ओर ले जाओगे, उसी ओर जायगा।

“मन धोबी के यहाँ का कपड़ा है। वहाँ से लाकर उसे लाल रंग से रँगो तो लाल हो जायगा और आसमानी से रँगो तो आसमानी। जिस रंग से रँगोगे वही रंग उस पर चढ़ जायगा।

(गोस्वामी से) “आपको कुछ पूछना तो नहीं है?”

गोस्वामी – (बड़े ही विनय भाव से) – जी नहीं, दर्शन हो गये, और सब बातें तो सुनता ही था।

श्रीरामकृष्ण – देवताओं के दर्शन करो।

गोस्वामी – (विनयपूर्वक) – कुछ महाप्रभु के गुणकीर्तन सुनना चाहता हूँ।

श्रीरामकृष्ण कीर्तन गाने लगे। कीर्तन के समाप्त हो जाने पर श्रीरामकृष्ण गोस्वामीजी से कह रहे हैं – यह तो आप लोगों के ढंग का हुआ। लेकिन अगर कोई शाक्त या घोषपाड़ा के मत का आदमी आ जाय तो मैं दूसरे ढंग के गाने गाऊँगा।

“यहाँ सब तरह के आदमी आते हैं – वैष्णव, शाक्त, कर्ताभजा, वेदान्तवादी और आजकल के ब्राह्म-समाजवाले आदि भी। इसलिए यहाँ सब तरह के भाव हैं।

“उन्हीं की इच्छा से अनेक धर्मों और मतों का चलन हुआ है।

“जिसे जो सह्य है उसे उन्होंने वही दिया है।

“जिसकी जैसी प्रकृति, जिसका जैसा भाव, वह उसे ही लेकर रहता है।

“किसी धार्मिक मेले में अनेक तरह की मूर्तियाँ पायी जाती हैं, और वहाँ अनेक मतों के आदमी जाते हैं। राधा-कृष्ण, हर-पार्वती, सीता-राम, जगह जगह पर भिन्न भिन्न मूर्तियाँ रखी रहती हैं। और हरएक मूर्ति के पास लोगों की भीड़ होती है। जो लोग वैष्णव हैं उनकी अधिक संख्या राधा-कृष्ण के पास खड़ी हुई है, जो शाक्त हैं, उनकी भीड़ हर-पार्वती के पास लगी है। जो रामभक्त हैं, वे सीताराम की मूर्ति के पास खड़े हुए हैं।