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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 647
६२४श्रीरामकृष्णवचनामृत१९ सितम्बर, १८८४

“परन्तु जिनका मन किसी देवता की ओर नहीं है, उनकी और बात है। वेश्या अपने आशिक की झाडू से खबर ले रही है, ऐसी मूर्ति भी वहाँ बनायी जाती है। उस तरह के आदमी मुँह फैलाये हुए वही मूर्ति देखते और अपने मित्रों को चिल्लाते हुए उधर ही बुलाते भी हैं, कहते हैं – 'अरे वह सब क्या खाक देखते हो? इधर आओ जरा, यहाँ तो देखो!'”

सब हँस रहे हैं। गोस्वामी प्रणाम करके बिदा हुए।

(४)

संस्कार तथा तपस्या का प्रयोजन। साधु-सेवा

दिन के पाँच बजे हैं। श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले बरामदे में हैं। बाबूराम, लाटू, दोनों मुखर्जी भाई, मास्टर आदि भक्त उनके साथ हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर आदि से) – मैं क्यों एक ढर्रे का होऊँ? वे लोग वैष्णव हैं, बड़े कट्टर हैं, सोचते हैं, हमारा ही धर्म ठीक है, और सब वाहियात है। मैंने जो बातें सुनायी हैं, उनसे उसे चोट पहुँची होगी। (हँसते हुए) हाथी के सिर पर अंकुश मारा जाता है। कहते हैं, वहीं उसके सिर पर कोष (कोमलअंग) रहता है। (सब हँसे।)

श्रीरामकृष्ण लड़कों के साथ हँसी करने लगे।

दोनों मुखर्जी बरामदे से चले गये। बगीचे में कुछ देर टहलेंगे।

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – कहीं मुखर्जियों ने हमारी हँसी को बुरा तो नहीं मान लिया?

मास्टर – क्यों? कप्तान ने तो कहा था, आपकी अवस्था बालक की है। ईश्वर-दर्शन करने पर बालक की अवस्था हो जाती है।

श्रीरामकृष्ण – और बाल्य, कैशोर और युवा। कैशोर अवस्था में दिल्लगी-मजाक सूझता है। कभी कुछ मुँह से निकल जाता है। पर युवावस्था में सिंह की तरह लोकशिक्षा देता है।

“तुम उन्हें मेरी मानसिक अवस्था समझा देना।”

मास्टर – जी, मुझे समझाना न होगा। क्या वे जानते नहीं?

श्रीरामकृष्ण लड़कों के साथ आमोद-प्रमोद करते हुए एक भक्त से कह रहे हैं – “आज अमावास्या है, माँ के मन्दिर में जाना।”

सन्ध्या के बाद आरती का शब्द सुनायी दे रहा है। श्रीरामकृष्ण बाबूराम से कह रहे हैं – “चल रे, चल काली-मन्दिर में।” श्रीरामकृष्ण बाबूराम के साथ जा रहे हैं। साथ मास्टर भी हैं। हरीश बरामदे में बैठे हुए हैं, श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, जान पड़ता है, इसे भावावेश हो गया।