श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
| ६२४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १९ सितम्बर, १८८४ |
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“परन्तु जिनका मन किसी देवता की ओर नहीं है, उनकी और बात है। वेश्या अपने आशिक की झाडू से खबर ले रही है, ऐसी मूर्ति भी वहाँ बनायी जाती है। उस तरह के आदमी मुँह फैलाये हुए वही मूर्ति देखते और अपने मित्रों को चिल्लाते हुए उधर ही बुलाते भी हैं, कहते हैं – 'अरे वह सब क्या खाक देखते हो? इधर आओ जरा, यहाँ तो देखो!'”
सब हँस रहे हैं। गोस्वामी प्रणाम करके बिदा हुए।
(४)
संस्कार तथा तपस्या का प्रयोजन। साधु-सेवा
दिन के पाँच बजे हैं। श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले बरामदे में हैं। बाबूराम, लाटू, दोनों मुखर्जी भाई, मास्टर आदि भक्त उनके साथ हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर आदि से) – मैं क्यों एक ढर्रे का होऊँ? वे लोग वैष्णव हैं, बड़े कट्टर हैं, सोचते हैं, हमारा ही धर्म ठीक है, और सब वाहियात है। मैंने जो बातें सुनायी हैं, उनसे उसे चोट पहुँची होगी। (हँसते हुए) हाथी के सिर पर अंकुश मारा जाता है। कहते हैं, वहीं उसके सिर पर कोष (कोमलअंग) रहता है। (सब हँसे।)
श्रीरामकृष्ण लड़कों के साथ हँसी करने लगे।
दोनों मुखर्जी बरामदे से चले गये। बगीचे में कुछ देर टहलेंगे।
श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – कहीं मुखर्जियों ने हमारी हँसी को बुरा तो नहीं मान लिया?
मास्टर – क्यों? कप्तान ने तो कहा था, आपकी अवस्था बालक की है। ईश्वर-दर्शन करने पर बालक की अवस्था हो जाती है।
श्रीरामकृष्ण – और बाल्य, कैशोर और युवा। कैशोर अवस्था में दिल्लगी-मजाक सूझता है। कभी कुछ मुँह से निकल जाता है। पर युवावस्था में सिंह की तरह लोकशिक्षा देता है।
“तुम उन्हें मेरी मानसिक अवस्था समझा देना।”
मास्टर – जी, मुझे समझाना न होगा। क्या वे जानते नहीं?
श्रीरामकृष्ण लड़कों के साथ आमोद-प्रमोद करते हुए एक भक्त से कह रहे हैं – “आज अमावास्या है, माँ के मन्दिर में जाना।”
सन्ध्या के बाद आरती का शब्द सुनायी दे रहा है। श्रीरामकृष्ण बाबूराम से कह रहे हैं – “चल रे, चल काली-मन्दिर में।” श्रीरामकृष्ण बाबूराम के साथ जा रहे हैं। साथ मास्टर भी हैं। हरीश बरामदे में बैठे हुए हैं, श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, जान पड़ता है, इसे भावावेश हो गया।
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आँगन से जाते हुए श्रीरामकृष्ण ने जरा श्रीराधाकान्त की आरती देखी। फिर काली-मन्दिर की ओर जाने लगे। जाते ही जाते हाथ उठाकर जगन्माता को पुकारने लगे – “माँ – ओ – माँ – ब्रह्ममयी!” मन्दिर के चबूतरे पर मूर्ति के सामने पहुँचकर भूमिष्ठ हो माता को प्रणाम करने लगे। माता की आरती हो रही है। श्रीरामकृष्ण मन्दिर में प्रवेश कर चामर लेकर व्यजन करने लगे।
आरती समाप्त हो गयी। जो लोग आरती देख रहे हैं, सब ने एक ही साथ भूमिष्ठ हो प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण ने मन्दिर के बाहर आकर प्रणाम किया। महेन्द्र मुखर्जी आदि भक्तों ने भी प्रणाम किया।
आज अमावस्या है। श्रीरामकृष्ण को पूर्ण मात्रा में भावावेश हो गया। बाबूराम का हाथ पकड़कर मतवाले की तरह झूमते हुए अपने कमरे में जा रहे हैं।
कमरे के पश्चिमवाले गोल बरामदे में एक बत्ती जला दी गयी है।
श्रीरामकृष्ण उसी बरामदे में जाकर जरा बैठे। ‘हरि ॐ’ ‘हरि ॐ’ ‘हरि ॐ’ कहते हुए अनेक प्रकार के तन्त्रोक्त बीज-मन्त्रों का भी उच्चारण कर रहे हैं।
कुछ देर पश्चात् कमरे में अपने आसन पर पूर्वांस्य होकर बैठे। भाव अभी भी पूर्ण मात्रा में हैं।
दोनों मुखर्जी भाई, बाबूराम आदि भक्त जमीन पर आकर बैठे।
श्रीरामकृष्ण भावावेश में माता से बातचीत कर रहे हैं। कहते हैं – ‘माँ, मैं कहूँ तब तू करे, यह भी कोई बात हैं? बातचीत करना क्या है – इशारा ही तो है। – कोई कहता है ‘मैं खाऊँगा’ – कोई कहता है, ‘जा, मैं न सुनूँगा।’
“अच्छा माँ, मान लो मैंने भले ही प्रकट रूप में यह न कहा हो कि मुझे भूख लगी है, तो क्या मुझे असल में भूख नहीं लगी है? क्या यह सम्भव है कि तुम केवल उसी की प्रार्थना सुनो जो जोर जोर से पुकारता है और उसकी न सुनो जो भीतर ही भीतर व्याकुलतापूर्वक प्रार्थना करता रहता है?
“तुम जो हो सो हो, फिर मैं क्यों बोलता हूँ, क्यों प्रार्थना करता हूँ?
“हाँ! जैसा कराती हो, वैसा करता हूँ।
“लो! सब गोलमाल हो गया! – क्यों विचार कराती हो?”
श्रीरामकृष्ण जगन्माता के साथ बातचीत कर रहे हैं। – भक्तगण आश्चर्यचकित हो सुन रहे हैं।
अब भक्तों पर श्रीरामकृष्ण की दृष्टि पड़ी।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – उन्हें प्राप्त करने के लिए संस्कार चाहिए। कुछ किये रहना चाहिए। तपस्या – वह इस जन्म में ही हो या उस जन्म में।
“द्रौपदी का जब वस्त्रहरण किया गया था तब उसका विकल होकर रोना
६२६ श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ सितम्बर, १८८४
श्रीठाकुरजी ने सुना था, तभी उन्होंने दर्शन दिये। और कहा, तुमने अगर किसी को कभी वस्त्र दिया हो तो याद करो, उससे लज्जा का निवारण होगा। द्रौपदी ने कहा एक ऋषि नहा रहे थे, उनका कौपीन बह गया था, मैंने अपने कपड़े से आधा फाड़कर उन्हें दिया था। श्रीठाकुरजी ने कहा, तो अब तुम कोई चिन्ता न करो।”
मास्टर श्रीरामकृष्ण के आसन के पूर्व की तरफ पाँवपोश पर बैठे हुए हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – तुम यह समझे?
मास्टर – जी, संस्कार की बात।
श्रीरामकृष्ण – एक बार कह तो जाओ, मैंने क्या कहा।
मास्टर – द्रौपदी नहाने गयी थी – आदि।
(हाजरा आये।)
(५)
क्या ईश्वर प्रार्थना सुनते हैं? साधना
हाजरा महाशय यहाँ दो साल से हैं। उन्होंने श्रीरामकृष्ण की जन्म-भूमि कामारपुकुर के पास सिऊड़ ग्राम में पहले-पहल उनके दर्शन किये थे, सन् १८८० ई. में। इस मौजे में श्रीरामकृष्ण के भांजे श्रीयुत हृदय मुखोपाध्याय रहते हैं। उस समय श्रीरामकृष्ण हृदय के यहाँ रहते थे।
सिऊड़ के पास मरागोड़ मौजे में हाजरा महाशय रहते हैं। उनके कुछ जमीन-जायदाद भी हैं। स्त्री-परिवार और लड़के-बच्चे भी हैं। घरगृहस्थी का काम किसी तरह चल जाता है। कुछ ऋण भी है, लगभग हजार रुपया होगा।
यौवनकाल से ही उनमें वैराग्य का भाव है। साधु कहाँ है, भक्त कहाँ है, यही सब खोजते फिरते थे। जब पहले-पहल दक्षिणेश्वर काली-मन्दिर में आये और वहाँ रहना चाहा तब श्रीरामकृष्ण ने उनके भक्तिभाव को देखकर, और उन्हें अपने देश का परिचित मनुष्य जानकर, यत्नपूर्वक अपने पास रख लिया।
हाजरा का ज्ञानियों जैसा भाव है। श्रीरामकृष्ण का भक्तिभाव और लड़कों के लिए उनकी व्याकुलता उन्हें पसन्द नहीं। कभी कभी वे श्रीरामकृष्ण को महापुरुष सोचते हैं और कभी कभी साधारण आदमी।
वे श्रीरामकृष्ण के दक्षिणपूर्ववाले बरामदे में आसन लगाकर बैठे हैं। वहीं माला लेकर बड़ी देर तक जप किया करते हैं। राखाल आदि भक्त अधिक जप नहीं करते, इसलिए लोगों से वे उनकी निन्दा किया करते हैं।
वे आचार का पक्ष बहुत लेते हैं। ‘आचार-आचार’ करके उन्हें एक तरह शुचिता का रोग हो गया है। उनकी उम्र ३८ साल की होगी।
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हाजरा महाशय कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण को फिर कुछ भावावेश हो गया है और उसी अवस्था में वे बातचीत कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (हाजरा से) – तुम जो कुछ कर रहे हो, वह ठीक है। परन्तु पटरी ठीक नहीं बैठती।
“किसी की निन्दा न किया करो – एक कीड़े की भी नहीं। तुम खुद भी तो लोमस मुनि की बात कहते हो। जब भक्ति की प्रार्थना करोगे तब साथ ही यह भी कहा करो कि कभी मुझसे दूसरे की निन्दा न हो।”
हाजरा – (भक्ति की) – प्रार्थना करने पर वे सुनेंगे?
श्रीरामकृष्ण – एक सौ बार! – अगर प्रार्थना ठीक हो – आन्तरिक हो। विषयी आदमी जिस तरह बच्चे या स्त्री के लिए रोता है, उसी तरह ईश्वर के लिए कहाँ रोता है?
“उस देश में एक आदमी की स्त्री बीमार हो गयी। वह अच्छी न होगी, यह सोचकर वह आदमी थर थर काँपने लगा – बेहोश होने को आ गया था।
“इस तरह ईश्वर के लिए किसकी अवस्था होती है?”
हाजरा श्रीरामकृष्ण की पद-रेणु ले रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (संकुचित होकर) – यह सब क्या है?
हाजरा – जिनके पास मैं हूँ उनके श्रीचरणों की धूलि न लूँ?
श्रीरामकृष्ण – ईश्वर को तुष्ट करो, सब तुष्ट हो जायेंगे। ‘तस्मिन् तुष्टे जगत् तुष्टम्।’ ठाकुरजी ने जब द्रौपदी का शाक खाकर कहा, मैं तृप्त हो गया हूँ, तब संसार भर के जीव तृप्त हो गये थे – गले तक भर गये थे – डकार लेने लगे थे। मुनियों के खाने से क्या संसार तुष्ट हुआ था – डकारें ली थीं?
“ज्ञानलाभ के बाद भी लोक-शिक्षा के लिए पूजा आदि कर्मों को लोग किया करते हैं।
“मैं काली-मन्दिर जाता हूँ, और इस कमरे के सब चित्रों को भी प्रणाम करता हूँ – इस तरह दूसरे भी प्रणाम करते हैं। फिर तो अभ्यास हो जाने पर मनुष्य से वैसा किये बिना रहा ही नहीं जाता।
“बटतल्ले के संन्यासी को मैंने देखा; उसने जिस आसन पर गुरु की पादुका रखी थी उसी पर शालग्राम भी रखा था और पूजा कर रहा था! मैंने पूछा, ‘अगर इतना ज्ञान हो गया है, तो इस तरह क्यों करते हो?’ उसने कहा, ‘सब कुछ किया जाता है, यह भी एक किया। कभी एक फूल इस पैर पर (गुरु के) चढ़ाया और कभी एक फूल उस पैर (शालग्राम) पर।’
“देह के रहते कोई कर्म छोड़ नहीं सकता – पंक रहते उससे बुलबुले उठेंगे ही।
(हाजरा से) “एक ज्ञान है तो अनेक का भी ज्ञान है।
६२८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ सितम्बर, १८८४
“केवल शास्त्र पढ़ने से क्या होगा? शास्त्रों में बालू और चीनी का-सा मेल है। उससे चीनी का अंश निकालना बड़ा मुश्किल है। इसीलिए शास्त्रों का मर्म गुरु के श्रीमुख से, साधु के श्रीमुख से सुन लेना चाहिए। तब फिर ग्रन्थों की क्या जरूरत है?
“चिट्ठी में खबर आई है, 'पाँच सेर सन्देश भेजियेगा – और एक धारीदार धोती।' चिट्ठी खो गयी, तब तुरन्त चारों ओर ढूँढ-तलाश होने लगी। बहुत कुछ खोजने के बाद कहीं चिट्ठी मिली। पढ़कर देखा, लिखा हैं – 'पाँच सेर सन्देश भेजियेगा और एक धारीदार धोती।' तब फिर उसने चिट्ठी फेंक दी। अब उसकी क्या जरूरत है? – अब तो सन्देश और धोती संग्रह करने से ही काम है।
(मुखर्जी, बाबूराम, आदि भक्तों से) “भलीभाँति खोज लेकर तब डूबो। तालाब में अमुक स्थान पर लोटा गिर गया है, जगह की ठीक जाँच करके डुबकी लगानी चाहिए।
“शास्त्रों का मर्म गुरु के श्रीमुख से सुनकर तब साधना की जाती है। यह साधना ठीक ठीक करने पर तब कहीं प्रत्यक्ष दर्शन होते हैं।
“डुबकी लगाओगे तब ठीक ठीक साधना होगी। बैठे बैठे शास्त्रों की बात पर केवल विचार करते रहने से क्या होगा? साधक को डुबकी लगानी चाहिए।
“अगर कहो कि डुबकी लगाने से भी तो मगर और घड़ियाल का डर हैं, – काम क्रोधादि का भय है, तो हल्दी लगाकर डुबकी लगाओ तो फिर वे पास न आ सकेंगे। विवेक और वैराग्य हल्दी हैं।”
(६)
पूर्व कथा। श्रीरामकृष्ण की पुराण, तन्त्र तथा वेद मत की साधना
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – उन्होंने मुझसे अनेक प्रकार की साधनाएँ करायीं। पहली पुराण मत की थी, फिर तन्त्र मत की थी, इसके बादवाली वेद मत की थी। पहले मैं पंचवटी में साधना करता था। वहाँ तुलसी-वन लगाया गया, मैं उसके भीतर बैठकर ध्यान करता था। कभी विकल होकर 'माँ-माँ' कहकर पुकारता था, कभी 'राम-राम' कहता था।
“जब 'राम-राम' कहता था, तब हनुमान के भाव में आकर एक पूँछ लगाकर बैठा रहता था – उन्माद की अवस्था थी। उस समय पूजा करते हुए मैं पीताम्बर पहनता था तो बड़ा आनन्द आता था। वह पूजा का ही आनन्द था।
“तन्त्र मत की साधना बेल के नीचे की थी। तब तुलसी का पेड़ और सहजन की फल्ली ये एक जैसे जान पड़ते थे।
“उस अवस्था में शिवानी की जूठन तमाम रात पड़ी रहती थी, साँप खाता था या कौन खाता था इसका कुछ ख्याल न था, वही जूठन मैं खाता था।
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परिच्छेद ११
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“कभी कभी मैं कुत्ते पर चढ़कर उसे पूड़ियाँ खिलाता और उसकी जूठी पूड़ियाँ खुद खाता था। सर्वं विष्णुमयं जगत्।
“अविद्या का नाश बिना किये न होगा। इसलिए मैं बाघ बन जाता था और अविद्या को खा जाता था।
“वेदमत से साधना करते समय संन्यास लिया। उस समय चाँदनी में पड़ा रहता था। हृदय से कहता था, मैंने संन्यास लिया है, मेरे लिए चाँदनी में खाने को दे जाया करो।
(भक्तों से) “धरना दिया था। पड़ा हुआ मैं माँ से कहता था – मैं मूर्ख हूँ, तुम मुझे बतला दो, वेदों, पुराणों, तन्त्रों और शास्त्रों में क्या हैं।
“माँ ने कहा, 'वेदान्त का सार है ब्रह्म, उसी को सत्य और संसार को मिथ्या माना है। जिस सच्चिदानन्द ब्रह्म की बात वेदों में है, उन्हें तन्त्रों में ‘सच्चिदानन्दः शिवः’ कहते हैं। और पुराणों में उन्हें ही ‘सच्चिदानन्दः कृष्णः’ कहते हैं।
“दस बार गीता का उच्चारण करने पर जो कुछ होता है, वही गीता का सार है। अर्थात् त्यागी – त्यागी।
“उन्हें जब कोई प्राप्त कर लेता है, तब वेद, वेदान्त, पुराण, तन्त्र सब इतने नीचे पड़े रहते हैं कि कुछ कहना ही नहीं। (हाजरा से) ॐ का भी उच्चारण नहीं किया जा सकता; समाधि से जब मैं बहुत नीचे उतर आता हूँ, तब कहीं जरूर ॐ का उच्चारण कर सकता हूँ।
“प्रत्यक्ष दर्शन के पश्चात् जो-जो अवस्थाएँ शास्त्रों में लिखी हैं, वे सब मुझे हुई थीं। बालवत्, उन्मत्तवत्, पिशाचवत्, जड़वत्।
“और शास्त्रों में जैसा लिखा है, वैसा दर्शन भी होता था।
“कभी देखता था, तमाम संसार जलता हुआ अंगार है।
“कभी देखता था, चारों ओर पारे जैसा सरोवर – झिलमिल झिलमिल कर रहा है। और कभी गली हुई चाँदी की तरह देखता था।
“कभी देखता था मानो मसालेवाली सलाई का चारों ओर उजाला हो रहा है।
“इनसे शास्त्रों की बातें मिल जाती हैं।
“फिर दिखलाया, वे ही जीव हैं, वे ही जगत् हैं और चौबीसों तत्त्व भी वे ही हुए हैं। छत पर चढ़कर फिर सीढ़ियों से उतरना। अनुलोम और विलोम!
“उः! किस अवस्था में उसने रखा है! – एक अवस्था जाती है तो दूसरी आती है! जैसे ढेकी के वार। एक ओर नीचा होता है तो दूसरी ओर ऊँचा हो जाता है।
“जब अन्तर्मुख होकर समाधिलीन हो जाता हूँ, तब भी देखता हूँ, वे ही हैं और जब बाहरी संसार में मन आता है, तब भी देखता हूँ, वे ही हैं।
“जब आईने के इस ओर देखता हूँ, तब भी वे ही हैं और जब उस ओर देखता हूँ,
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तब भी वे ही हैं।”
दोनों मुखर्जी भाई और बाबूराम आदि आश्चर्यचकित हो श्रीरामकृष्ण की बातें सुन रहे हैं।
(७)
शम्भू मल्लिक की अनासक्ति। महापुरुष का आश्रय
श्रीरामकृष्ण – (मुखर्जी आदि से) – कप्तान की भी यथार्थ साधक जैसी अवस्था है।
“केवल ऐश्वर्य के रहने से ही मनुष्य की उसमें बिलकुल आसक्ति हो जाती है सो बात नहीं। शम्भू कहता था, 'हृदू! मैं बोरिया-बधना समेटकर चलने के लिए बैठा हुआ हूँ।' मैंने कहा, यह क्या अशुभ बातें बक रहे हो?
“तब शम्भू ने कहा, 'नहीं, कहो, यह सब फेंककर जैसे उनके पास पहुँच सकूँ।'
“उनके भक्त को किसी बात का भय नहीं है। भक्त उनका आत्मीय है। वे उसे खींच लेंगे। गन्धर्वों के हाथों दुर्योधन आदि के बँध जाने पर युधिष्ठिर ने ही उनका उद्धार किया था। कहा था, आत्मीयों की ऐसी अवस्था होने पर हमारे ही सर पर कलंक का टीका लगता है।”
रात के नौ बज चुके हैं। दोनों मुखर्जी भाई कलकत्ता लौटने के लिए तैयार हो रहे हैं। कमरे में और बरामदे में टहलते हुए श्रीरामकृष्ण ने सुना, विष्णु-मन्दिर में उच्च स्वर से संकीर्तन हो रहा है। उनके पूछने पर एक भक्त ने कहा, उनके साथ लाटू और हरीश भी गा रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – अच्छा, इतना (शोर) इसीलिए हो रहा है!
श्रीरामकृष्ण विष्णु-मन्दिर गये। साथ साथ भक्तगण भी गये। श्रीरामकृष्ण ने राधाकान्त को भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया।
श्रीरामकृष्ण ने देखा, ठाकुर-मन्दिर के ब्राह्मण जो पाककर्म करते हैं, नैवेद्य सजाते हैं, अतिथियों को प्रसाद परोसते हैं, वे तथा अन्य सब सेवक-टहलुए एकत्र होकर नामसंकीर्तन कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने जरा देर खड़े रहकर उनका उत्साह बढ़ाया।
आँगन के बीच से लौटते समय उन्होंने भक्तों से कहा – “देखो, इनमें से कोई वेश्या के यहाँ जाता है और कोई बर्तन धोया करता है!”
कमरे में आकर श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे। जो लोग संकीर्तन कर रहे थे, उन लोगों ने श्रीरामकृष्ण को आकर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – “रुपये के लिए जिस तरह देह का पसीना बहाते हो उसी तरह उनका नाम लेकर नाच-कूद कर बहाना चाहिए।
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“मेरी इच्छा हुई तुम लोगों के साथ नाचूँ। जाकर देखा मसाला पड़ चुका था – मेथी तक। (सब हँसते हैं।) तब मैं क्या डालकर उसे सुगन्धित करता?
“तुम लोग कभी कभी इसी तरह नाम-संकीर्तन करने के लिए आ जाया करो।”
मुखर्जी बन्धुओं ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके विदाई ली।
श्रीरामकृष्ण के कमरे के ठीक उत्तरवाले बरामदे के किनारे मुखर्जियों की गाड़ी में बत्ती जला दी गयी हैं।
श्रीरामकृष्ण उसी बरामदे के ठीक उत्तर-पूर्ववाले कोने में उत्तर की ओर मुँह किये खड़े हैं। एक भक्त रास्ता दिखाते हुए एक लालटेन ले आये हैं, भक्तों को चढ़ाने के लिए।
आज अमावस्या है। रात अँधेरी है। श्रीरामकृष्ण को क्रमशः प्रणाम करके भक्तगण गाड़ी पर बैठ रहे हैं। श्रीरामकृष्ण एक भक्त से कह रहे हैं – “ईशान से जरा उसके काम के लिए कहना।”
गाड़ी में ज्यादा आदमी देखकर, घोड़े को कष्ट होगा, यह सोचकर श्रीरामकृष्ण ने कहा – “क्या गाड़ी में इतने आदमी समा जायेंगे?”
श्रीरामकृष्ण खड़े हैं। उनकी निर्मल मूर्ति देखते हुए भक्तगण कलकत्ते की ओर चल दिये।
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परिच्छेद ९२
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परिच्छेद ९२
चैतन्यलीला-दर्शन
(१)
भक्तों से वार्तालाप
आज रविवार है; श्रीरामकृष्ण के कमरे में बहुत से भक्त एकत्रित हुए हैं। राम, महेन्द्र, मुखर्जी, चुनीलाल, मास्टर आदि बहुत से भक्त हैं। २१ सितम्बर, १८८४।
चुनीलाल अभी हाल ही वृन्दावन से आये हैं। वे और राखाल, बलराम के साथ वहाँ गये थे। राखाल और बलराम अब भी नहीं लौटे। श्रीरामकृष्ण चुनीलाल से वृन्दावन की बातें कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – राखाल कैसा है?
चुनी – जी, अब वे अच्छे हैं।
श्रीरामकृष्ण – नृत्यगोपाल आयगा या नहीं?
चुनी – अभी तो मैं देखकर आ रहा हूँ, वहीं है।
श्रीरामकृष्ण – तुम्हारे परिवार के लोग किसके साथ आ रहे हैं?
चुनी – बलराम बाबू ने कहा है, मैं अच्छे आदमी के साथ भेज दूँगा। नाम उन्होंने नहीं बतलाया।
श्रीरामकृष्ण महेन्द्र मुखर्जी से नारायण की बातचीत कर रहे हैं। नारायण स्कूल में पढ़ता है। उम्र १६-१७ साल की है। श्रीरामकृष्ण के पास कभी-कभी आया-जाया करता है। श्रीरामकृष्ण उसे बड़ा प्यार करते हैं।
श्रीरामकृष्ण – बड़ा सरल है न?
'सरल' शब्द कहते ही श्रीरामकृष्ण का मन आनन्द से भर गया।
महेन्द्र – जी हाँ, बड़ा सरल है।
श्रीरामकृष्ण – उसकी माँ उस दिन आयी थी। अभिमानिनी थी, देखकर भय हुआ। इसके पश्चात् जब उसने देखा, यहाँ तुम आते हो, कप्तान आता है, तब उसने जरूर ही सोचा होगा, केवल नारायण और मैं कुल यही दो वहाँ नहीं जाते। (सब हँसने लगे।) इस कमरे में मिश्री रखी हुई थी। उसने देखकर कहा, अच्छी मिश्री है। साथ ही समझा होगा,
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२१ सितम्बर, १८८४ । परिच्छेद ९२ । ६३३
२१ सितम्बर, १८८४ । परिच्छेद ९२ । ६३३
इसके खाने की विशेष असुविधा नहीं है।
“शायद उन लोगों के सामने मैंने बाबूराम से कहा था, नारायण के लिए और अपने लिए ये सन्देश रख दे। इसके बाद गणी की माँ और वे सब कहने लगीं - ‘नारायण अपनी माँ को नित्य प्रति यहाँ आने के लिए नाव का किराया माँगकर परेशान किया करता है।’
“मुझसे कहा आप नारायण से कहिये जिससे विवाह करे। इस बात पर मैंने कहा, ये सब भाग्य की बातें हैं। क्यों मैं ऐसी बात के लिए जोर दूँ? (सब हँसते हैं।)
“नारायण अच्छी तरह पढ़ने में जी नहीं लगाता। इस पर उसने कहा, आप कहिये, जरा अच्छी तरह पढ़े। मैंने कहा, पढ़ना रे! तब उसने कहा, जरा अच्छी तरह कहिये। (सब हँसते हैं।)
(चुनी से) “क्यों जी भला गोपाल क्यों नहीं आता?”
चुनी – उसे खून जा रहा है – आँव के साथ।
श्रीरामकृष्ण – दवा खा रहा है न?
श्रीरामकृष्ण आज स्टार थियेटर में ‘चैतन्यलीला’ नाटक देखने जायेंगे। (पहले स्टार थियेटर का अभिनय जहाँ पर होता था, वहाँ आजकल कोहिनूर थियेटर है।) महेन्द्र मुखर्जी के साथ उन्ही की गाड़ी पर चढ़कर अभिनय देखने जायेंगे। कहाँ बैठने पर अच्छी तरह दीख पड़ता है, यही बात हो रही है। किसी ने कहा, एक रुपयेवाली जगह से खूब दीख पड़ता है। राम ने कहा, ये ‘बाक्स’ से देखेंगे।
श्रीरामकृष्ण हँस रहे हैं। किसी किसी ने कहा, वेश्याएँ अभिनय करती है। चैतन्यदेव, निताई, इनका पार्ट वे ही करती है।
श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – मैं उन्हे माँ आनन्दमयी देखूँगा।
“वे चैतन्य सजकर निकली हैं तो इससे क्या हुआ? नकली फल देखिये तो यथार्थ फल की बात याद आ जाती है।
“किसी भक्त ने रास्ते पर जाते हुए देखा, कुछ बबूल के पेड़ थे। देखते ही भक्त को भावावेश हो गया। उसे यह याद आया कि इसकी लकड़ी से श्यामसुन्दर के बगीचे की कुदार के लिए अच्छा बेंट हो सकता है। उसे श्यामसुन्दर की बात याद आ गयी थी। जब किले के मैदान में मुझे बेलून दिखाने के लिए ले गये थे, तब एक साहब का लड़का पेड़ के सहारे तिरछा होकर खड़ा था। उसे देखने के साथ ही कृष्ण की उद्दीपना हो गयी और मैं समाधिमग्न हो गया।
“चैतन्यदेव मेड़गाँव से होकर जा रहे थे। सुना, गाँव की मिट्टी से खोल बनते हैं। सुनने के साथ ही उन्हें भावावेश हो गया था।
“श्रीमती (राधा) मेघ या मोरों की गरदन देख लेने पर फिर स्थिर नहीं रह सकती
| ६३४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २१ सितम्बर, १८८४ |
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थीं। श्रीकृष्ण की ऐसी उद्दीपना होती थी कि उनका बाह्यज्ञान लुप्त हो जाता था।
श्रीरामकृष्ण जरा देर चुपचाप बैठे हैं। कुछ देर बाद फिर बातचीत करते हैं – “श्रीमती को महाभाव होता था। गोपियों के प्रेम में कोई कामना नहीं है। जो सच्चा भक्त है, वह कोई कामना नहीं करता। केवल शुद्धा भक्ति की प्रार्थना करता है। कोई शक्ति या विभूति नहीं चाहता।”
(२)
तोतापुरीजी की शिक्षा - अष्ट सिद्धियाँ ईश्वर-लाभ में विघ्नरूप हैं
श्रीरामकृष्ण – विभूति का होना एक आफत है। नागे (तोतापुरी) ने मुझे सिखलाया – एक सिद्ध समुद्र के तट पर बैठा हुआ था। उसी समय एक तूफान आया। तूफान से कष्ट होने का भय हुआ। उसने कहा, 'तूफान रुक जा।' उसकी बात झूठ होने की नहीं थी, तूफान रुक गया। उधर एक जहाज जा रहा था। उसमें पाल लगा हुआ था। तूफान ज्योंही एकाएक रुक गया कि जहाज डूब गया। जहाज भर के आदमी उसीके साथ डूब गये। अब इतने आदमियों के मरने से जो पाप होने को था, सब उसी को हुआ। उसी पाप से उसकी विभूति भी चली गयी और उसे नरक भी हुआ।
“एक साधु के बहुत सी विभूतियाँ हुई थीं। और उनका उसे अहंकार भी था, परन्तु था वह कुछ अच्छा आदमी। उसमें तपस्या भी थी। भगवान् छद्मवेश धारण कर एक दिन साधु के पास आये। आकर कहा, महाराज, मैंने सुना है, आपके पास बहुत सिद्धियाँ हैं। साधु ने उनकी खातिर करके बैठाया। उसी समय एक हाथी उधर से जा रहा था। तब छद्मवेशधारी साधु ने कहा, अच्छा महाराज, आप चाहें तो क्या इस हाथी को मार सकते हैं? साधु ने कहा, हाँ, क्यों नहीं? यह कहकर साधु ने धूल पढ़कर हाथी पर ज्योंही छोड़ी कि वह छटपटाकर मर गया। तब जो साधु आया था, उसने कहा, 'वाह! आपमें तो बड़ी शक्ति है। हाथी को आपने मार डाला!’ वह साधु हँसने लगा। तब नये साधु ने कहा, अच्छा इसे आप अब जिला सकते हैं? उसने कहा, ‘हाँ, ऐसा भी हो सकता है। यह कहकर ज्योंही धूल पढ़कर उसने हाथी पर छोड़ी कि हाथी तुरन्त उठकर खड़ा हो गया। तब इस साधु ने कहा – ‘आप में बड़ी शक्ति है; परन्तु एक बात मैं आपसे पूछता हूँ। आपने हाथी को मारा और फिर से जिला दिया, इससे आपका क्या हुआ? आपकी अपनी उन्नति क्या हुई? इससे क्या आप ईश्वर को पा गये?’ यह कहकर वह साधु अन्तर्धान हो गये।
“धर्म की सूक्ष्म गति है। जरासी कामना रहने पर भी कोई ईश्वर को पा नहीं सकता। सुई के भीतर सूत को जाना है, जरा सा रोवाँ भी बाहर रह गया तो फिर नहीं जा सकता।
“कृष्ण ने अर्जुन से कहा था, भाई, मुझे अगर पाना चाहते हो, तो समझ लो कि
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आठ सिद्धियों में एक भी सिद्धि के रहते मैं नहीं मिलता।
"एक बाबू आया था, वह कंजा था। उसने कहा, 'आप परमहंस हैं तो अच्छा है, परन्तु जरा आपको मेरे लिए स्वस्त्ययन करना होगा।' कितनी नीच बुद्धि है! परमहंस कहता है और फिर स्वस्त्ययन भी कराना चाहता है! स्वस्त्ययन करके अमंगलबाधा दूर कर देना विभूति का प्रयोग दिखलाना है। अहंकार से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। अहंकार कैसा है जानते हो? जैसे ऊँची जमीन, वहाँ बरसात का पानी नहीं ठहरता, बह जाता है। नीची जमीन में पानी जमता है और अंकुर उगते हैं। फिर पेड़ होते हैं और फल लगते हैं।
"इसीलिए हाजरा से कहता हूँ कि मैं ही समझता हूँ और सब मूर्ख हैं, ऐसी बुद्धि न लाया करो। सबको प्यार करना चाहिए। कोई दूसरे नहीं हैं। सर्व भूतों में परमात्मा का ही वास है। उन्हें छोड़ किसी भी वस्तु का अस्तित्व नहीं है। प्रह्लाद से श्रीठाकुरजी ने कहा, तुम वरदान लो। प्रह्लाद ने कहा, आपके दर्शन हो गये, मुझे और कुछ न चाहिए। श्रीठाकुरजी ने न छोड़ा। तब प्रह्लाद ने कहा, 'अगर वर दोगे, तो यही वर दो – मुझे जिन लोगों ने कष्ट दिया है, उनका अपराध न हो।'
"इसका अर्थ यह है कि ईश्वर ने एक रूप से कष्ट दिया है। उन आदमियों को यदि कष्ट हो तो वह ईश्वर को ही कष्ट मिलता है।"
(३)
श्रीरामकृष्ण का ज्ञानोन्माद तथा जाति-विचार
श्रीरामकृष्ण – श्रीमती (राधिका) को प्रेमोन्माद था। और भक्ति का उन्माद भी है जैसे हनुमान को हुआ था। सीताजी को अग्नि में प्रवेश करते हुए देखकर वे रामचन्द्र को मारने चले थे। एक और ज्ञानोन्माद है। एक ज्ञानी को मैंने पागल की तरह देखा था। कालीमन्दिर की प्रतिष्ठा के कुछ ही समय बाद की बात है। लोगों ने कहा, वह राममोहन राय की ब्राह्मसभा का एक आदमी था। एक पैर में फटा जूता था, हाथ में बाँस की पतली छड़ी, और एक हण्डी और आम का पौधा। गंगाजी में उसने डुबकी लगायी, फिर कालीमन्दिर में गया। हलधारी उस समय काली मन्दिर में बैठा था। वह मस्त होकर स्तवपाठ करने लगा – 'क्षौं क्षौं खट्वांगधारिणी' आदि।
"कुत्ते के पास पहुँचकर उसने उसके कान पकड़ उसका जूठा खाया। कुत्ते ने कुछ भी न किया। मेरी भी उस समय यही अवस्था हो चली थी। मैं हृदय के गले से लिपटकर कहने लगा – क्यों रे हृदय, क्या मेरी भी यही दशा होगी?
"मेरी उन्माद-अवस्था थी। नारायण शास्त्री ने आकर देखा, कन्धे पर एक बाँस रखकर टहल रहा था। तब उसने आदमियों से कहा – अः! इसे तो उन्माद हो गया है। उस अवस्था में जाति का कोई विचार नहीं रहता था। एक आदमी नीच जाति का था,
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६३६ श्री श्रीरामकृष्णवचनामृत २१ सितम्बर, १८८४
उसकी स्त्री शाक बनाकर भेजती थी और मैं खाता था।
“कालीमन्दिर में कंगले खा जाते थे, मैं उनकी जूठी पत्तलें सिर पर और मुँह में छुआता था। हलधारी ने तब मुझसे कहा, 'तू कर क्या रहा है? कंगलों का जूठा तूने खा लिया? अरे, तेरे बच्चों का अब विवाह कैसे होगा?' तब मुझे बड़ा गुस्सा आया। हलधारी मेरा दादा लगता था; परन्तु इससे क्या? मैंने कहा – 'क्यों रे! तू यही गीता और वेदान्त पढ़ता है? यही तू लोगों को सिखलाता है, ब्रह्म सत्य है और संसार मिथ्या? तूने खूब सोच रखा है, मेरे लड़के-बच्चे भी होंगे? आग लगे ऐसे तेरे गीता पढ़ने में।'
(मास्टर से) “देखो, सिर्फ पढ़ने और लिखने से कुछ नहीं होता। बाजे के बोल आदमी कह खूब सकता है, परन्तु हाथ से निकालना बड़ा मुश्किल है।”
श्रीरामकृष्ण फिर अपनी ज्ञानोन्माद-अवस्था का वर्णन कर रहे हैं –
“सेजो (मथुर) बाबू के साथ कुछ दिन नाव पर खूब सैर की। उसी यात्रा में नवद्वीप भी गया था। बजरे में देखा, केवट खाना पका रहे थे। उसके पास मैं खड़ा हुआ था। सेजो बाबू ने कहा, बाबा, वहाँ क्या कर रहे हो? मैंने हँसकर कहा, ये केवट बड़ा अच्छा खाना पका रहे हैं। सेजो बाबू समझ गये कि ये अब माँगकर भी खा सकते हैं। इसलिए कहा, बाबा, वहाँ से चले आओ।
“परन्तु अब वैसा नहीं होता। वह अवस्था अब नहीं है। अब तो ब्राह्मण हो, आचारी हो, श्रीठाकुरजी का प्रसाद हो, तभी खा सकता हूँ।
“कैसी कैसी अवस्थाएँ सब पार हो गयी हैं! कामारपुकुर के चीने शँखारी और दूसरे दूसरे जोड़वालों से मैंने कहा – देखो, तुम्हारे पैर पड़ता हूँ, बस एक बार उनका नाम लो। सबके पैर भी पड़ने चला था। तब चीने ने कहा – 'अरे तेरा यह पहला अनुराग है इसीलिए यह समभाव आया है।' पहले-पहल आँधी के आने पर जब धूल उड़ती है, तब आम और इमली सब एक जान पड़ते हैं। कौनसा आम है, और कौनसी इमली, यह समझ में नहीं आता।”
एक भक्त – यह भक्त का उन्माद, प्रेम का उन्माद या ज्ञान का उन्माद अगर संसारी आदमी को हो तो भला कैसे चल सकता है?
श्रीरामकृष्ण – (संसारी भक्तों को देखकर) – योगी दो तरह के होते हैं। एक व्यक्त योगी और दूसरे गुप्त योगी। संसार में गुप्त योगी होते हैं। उन्हें कोई समझते नहीं। संसारी के लिए मन से त्याग है, बाहर से नहीं।
राम – आपकी बच्चों को फुसलाकर समझानेवाली बात है। संसारी ज्ञानी हो सकता है, पर विज्ञानी नहीं हो सकता।
श्रीरामकृष्ण – वह अन्त में चाहे तो विज्ञानी हो सकता है। पर जबरन संसार छोड़ना अच्छा नहीं।
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२१ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९२ | ६३७
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राम – केशव सेन कहते थे, उनके पास आदमी इतना क्यों जाते हैं? एक दिन चुपचाप चुभो देंगे तब भागना होगा।
श्रीरामकृष्ण – चुभों क्यों दूँगा? मैं तो आदमियों से कहता हूँ, यह भी करो और वह भी करो। संसार भी करो और ईश्वर को भी पुकारो। सब कुछ छोड़ने के लिए तो मैं कहता नहीं। (हँसकर) केशव सेन ने एक दिन लेक्चर दिया। कहा 'हे ईश्वर ऐसा करो कि हम लोग भक्ति-नदी में गोते लगा सकें और गोते लगाकर सच्चिदानन्द-सागर में पहुँच जायँ।' स्त्रियाँ सब 'चिक' की ओट में बैठी थीं। मैंने केशव से कहा, 'एक ही साथ सब आदमियों के गोते लगाने से कैसे होगा? तो इन लोगों (स्त्रियों) की दशा क्या होगी? कभी कभी किनारे पर लग जाया करना। फिर गोते लगाना, फिर ऊपर आना।' केशव और दूसरे लोग हँसने लगे। हाजरा कहता है, 'तुम रजोगुणी आदमियों को बड़ा प्यार करते हो, जिनके रुपया-पैसा, मान-मर्यादा खूब है।' अगर ऐसी बात है तो हरीश, लाटू, इन्हें क्यों प्यार करता हूँ? नरेन्द्र को क्यों प्यार करता हूँ? उसके तो भूना भाँटा खाने को नमक भी नहीं है।
श्रीरामकृष्ण कमरे से बाहर आये; मास्टर से बातचीत करते हुए झाऊतल्ले की ओर जा रहे है। एक भक्त गड़ुआ और अँगोछा लेकर साथ साथ जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण कलकत्ते में आज 'चैतन्यलीला' नाटक देखने जायेंगे, उसी की बाते हो रही हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – राम सब रजोगुण की बातें कह रहा है। इतने अधिक दाम खर्च करके बैठने की क्या जरूरत है?
बाक्स का टिकट न लिया जाय, श्रीरामकृष्ण का यह उद्देश्य है।
(४)
हाथीबागान में भक्त के घर। श्री महेन्द्र मुखर्जी की सेवा
श्रीरामकृष्ण श्रीयुत महेन्द्र मुखर्जी की गाड़ी पर चढ़कर दक्षिणेश्वर से कलकत्ता आ रहे हैं। आज रविवार है, २१ सितम्बर, १८८४। दिन के पाँच का समय है। गाड़ी में महेन्द्र मुखर्जी, मास्टर और दो-एक व्यक्ति और हैं। गाड़ी के कुछ बढ़ते ही ईश्वरचिन्तन करते हुए श्रीरामकृष्ण भाव-समाधि में मग्न हो गये।
बड़ी देर के बाद समाधि छूटी। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, हाजरा भी मुझे शिक्षा देता है! कुछ देर बाद फिर कह रहे हैं – मैं पानी पीऊँगा। बाह्य संसार में मन को उतारने के लिए समाधि के भंग होने पर प्रायः श्रीरामकृष्ण यह बात कहते थे।
महेन्द्र मुखर्जी – (मास्टर से) – तो कुछ जलपान के लिए मँगा लिया जाय।
मास्टर – नहीं, इस समय ये न खायेंगे।
श्रीरामकृष्ण – (भावस्थ) – मैं खाऊँगा और शौच भी जाऊँगा।
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हाथीबागान में महेन्द्र मुखर्जी की आटे की चक्की है। उसी कारखाने में श्रीरामकृष्ण को लिए जा रहे हैं। वहाँ जरा देर विश्राम करके स्टार थियेटर में चैतन्यलीला नाटक देखने जायेंगे। महेन्द्र का मकान बाग-बाजार में है, श्रीमदनमोहनजी के कुछ उत्तर तरफ। श्रीरामकृष्ण को उनके पिता नहीं जानते; इसीलिए महेन्द्र उन्हें घर नहीं ले गये। उनके भाई प्रियनाथ भी श्रीरामकृष्ण के भक्त हैं।
महेन्द्र के कारखाने में तख्त पर दरी बिछी हुई है। उसी पर श्रीरामकृष्ण बैठे हुए ईश्वर-प्रसंग कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण — (मास्टर और महेन्द्र से) — चैतन्यचरितामृत सुनते हुए हाजरा कहता है, 'यह सब शक्ति की लीला है — इसके भीतर विभु नहीं हैं।' विभु को छोड़कर शक्ति कभी रह सकती है? यहाँ के मत को उलट देने की चेष्टा!
"मैं जानता हूँ, ब्रह्म और शक्ति अभेद हैं। जैसे जल और उसकी हिमशक्ति, अग्नि और उनकी दाहिका शक्ति। वे विभु के रूप से सर्व भूतों में विराजमान हैं, परन्तु कहीं उनकी शक्ति का अधिक और कहीं कम प्रकाश है। हाजरा यह भी कहता है, 'ईश्वर को पा जाने पर उन्हीं की तरह मनुष्य षडैश्वर्यशाली हो जाता है। षडैश्वर्य रहेंगे जरूर, फिर वह उन्हें अपने काम में लाये या न लाये।' "
मास्टर — षडैश्वर्य मुट्ठी में रहने चाहिए। (सब हँसते हैं।)
श्रीरामकृष्ण — (सहास्य) — हाँ, मुट्ठी में रहने चाहिए। कैसी हीन बुद्धि हैं! जिसने ऐश्वर्य का कभी भोग नहीं किया, वह 'ऐश्वर्य ऐश्वर्य' चिल्लाकर अधीर होता है। जो शुद्ध भक्त है, वह कभी ऐश्वर्य के लिए प्रार्थना नहीं करता।
श्रीरामकृष्ण शौच को जायेंगे। महेन्द्र ने गडुए में पानी मँगवाया और गडुए को खुद हाथ में ले लिया। श्रीरामकृष्ण को साथ लेकर मैदान की ओर जायेंगे।
श्रीरामकृष्ण ने सामने मणि को देखकर महेन्द्र से कहा, तुम्हें न लेना होगा, इन्हें दे दो।
मणि गड़ुआ लेकर श्रीरामकृष्ण के साथ कारखाने के भीतरवाले मैदान की ओर गये। हाथ-मुख धो चुकने के बाद श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं, "क्या सन्ध्या हो गयी? सन्ध्या होने पर सब काम छोड़कर ईश्वरचिन्तन करना चाहिए।"
यह कहकर श्रीरामकृष्ण हाथ के रोएँ देख रहे हैं — गिने जा सकते हैं या नहीं। रोएँ अगर न गिने जा सकें तो समझना चाहिए कि सन्ध्या हो गयी।
(५)
थियेटर में चैतन्यलीला। समाधि में श्रीरामकृष्ण
श्रीरामकृष्ण बीडन स्ट्रीट में स्टार थियेटर के सामने आ गये। रात के साढ़े आठ बजे
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२१ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९२ ६३९
का समय होगा। साथ में मास्टर, बाबूराम, महेन्द्र, मुखर्जी तथा दो-एक भक्त और हैं। टिकट खरीदने का बन्दोबस्त हो रहा है। नाट्यागार के मैनेजर श्रीयुत गिरीश घोष कुछ कर्मचारियों के साथ श्रीरामकृष्ण की गाड़ी के पास आये। स्वागत करके आदरपूर्वक उन्हें ऊपर ले गये। गिरीश बाबू ने श्रीरामकृष्णदेव का नाम सुना था। वे चैतन्यलीला-अभिनय देखने के लिए आये हैं, यह सुनकर उन्हें बड़ा आनन्द हुआ है। श्रीरामकृष्ण को लोगों ने दक्षिण-पश्चिमवाले बाक्स में बैठाया। पीछे बाबूराम तथा और भी दो-एक भक्त बैठे।
रंगमंच में बत्ती जल गयी। नीचे बहुत से आदमी बैठे हुए थे। श्रीरामकृष्ण की बाईं ओर ड्रापसीन दीख पड़ रहा है। कितने ही बाक्सों में भी आदमी आ गये हैं। बाक्स के पीछे से हवा करने के लिए एक एक पंखा झलनेवाला नौकर है। श्रीरामकृष्ण को भी हवा करने के लिए गिरीश आदमी ठीक कर गये।
रंगमंच देखकर श्रीरामकृष्ण को बालकों की तरह प्रसन्नता हुई है।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से हँसते हुए) – वाह! यहाँ तो बड़ा अच्छा है। आकर बड़ा अच्छा हुआ। बहुत से आदमियों के एक साथ होने से उद्दीपना होती है। तब मैं यथार्थ ही देखता हूँ कि वे ही सब हुए हैं।
मास्टर – जी हाँ।
श्रीरामकृष्ण – यहाँ कितना लेगा?
मास्टर – जी, कुछ न लेंगे। आप आये हैं, इसलिए उन्हें बड़ा हर्ष है।
श्रीरामकृष्ण – सब माँ का माहात्म्य है।
ड्रापसीन उठ गया। एक साथ ही दर्शकों की दृष्टि रंगमंच पर पड़ी। पहले पाप और छः रिपुओं की सभा थी। फिर अरण्य-मार्ग में विवेक, वैराग्य और भक्ति की बातचीत थी।
भक्ति कह रही है – नदिया में गौरांग ने जन्म ग्रहण किया है, इसलिए विद्याधरियाँ और ऋषि-मुनि छद्मवेश धारण कर उनके दर्शन करने जा रहे हैं।
विद्याधरियाँ और ऋषि-मुनि गौरांग को अवतार मानकर उनकी स्तुति कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें देखकर भाव में विभोर हो रहे हैं। मास्टर से कह रहे हैं, अहा! देखो, कैसा है!
विद्याधरियाँ और ऋषि-मुनि गाकर श्रीगौरांग की स्तुति कर रहे हैं –
पुरुषगण – केशव कुरु करुणा दीने कुंज-कानन-चारी।
स्त्रियाँ – माधव मनमोहन मोहन-मुरलीधारी॥
सब मिलकर – हरि बोल, हरि बोल, हरि बोल, मन आमार।
पुरुष – ब्रजकिशोर कालीय-हर कातर-भय-भंजन।
स्त्रियाँ – नयन बाँका, बाँका शिखिपाखा, राधिका-हृदिरंजन।
पुरुष – गोवर्धन धारण, वनकुसुम – भूषण, दामोदर कंसदर्पहारी।
Digitized by Arya Samaj Foundation.Chennai and eGangotri ६४० | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २१ सितम्बर, १८८४
स्त्रियाँ – श्याम रासरसबिहारी॥
सब – हरि बोल, हरि बोल, हरि बोल, मन आमार।
विद्याधरियों ने जब गाया – 'नयन बाँका, बाँका शिखिपाखा राधिका-हृदिरंजन', तब श्रीरामकृष्ण गम्भीर समाधि में मग्न हो गये। कन्सर्ट (concert) में कई वाद्य एक साथ बज रहे हैं। श्रीरामकृष्ण को कोई होश नहीं।
(६)
चैतन्यलीला-दर्शन। गौर-प्रेम में उन्मत्त श्रीरामकृष्ण
जगन्नाथ मिश्र (श्रीगौरांग के पिता) के घर एक अतिथि आये हैं। बालक निमाई अपने साथियों के साथ आनन्दपूर्वक गा रहे हैं।
अतिथि आँखें मूँदकर भगवान को भोग लगा रहे हैं। निमाई दौड़कर अतिथि के पास पहुँचे और अतिथि के नैवेद्य को खाने लगे। अतिथि समझ गये कि ये ईश्वर के अवतार हैं। वे दस अवतारों की स्तुति को बालक के सामने पढ़कर उसे प्रसन्न करने लगे। मिश्र और शची के पास से विदा होते समय उन्होंने फिर गाकर स्तुतिपाठ किया –
“जय नित्यानन्द गौरचन्द्र जय जय भवतारण!
अनाथत्राण जीवप्राण भीतभयवारण!
युगे युगे रंग, नव लीला नव रंग,
नव तरंग, नव प्रसंग, धराभार-धारण!
तापहारी प्रेमवारि वितर रासरस-बिहारी,
दीनआश, कलुषनाश, दुष्टत्रासकारण!”
स्तुति सुनते ही सुनते श्रीरामकृष्ण को फिर भावावेश हो रहा है।
अब नवद्वीप के गंगातट का दृश्य आया। गंगा नहाकर ब्राह्मणों की स्त्रियाँ और पुरुष घाट पर बैठे हुए पूजा कर रहे हैं। निमाई नैवेद्य छीन-छीनकर खा रहे हैं। एक ब्राह्मण बहुत गुस्सा हो गये। उन्होंने कहा, क्यों रे दुष्ट, विष्णुपूजा का नैवेद्य छीनता है? – तेरा सर्वनाश होगा। निमाई ने फिर भी नैवेद्य छीनकर खाया और फिर वहाँ से चल दिया। बहुत सी औरतें थीं, जो उसे बड़ा प्यार करती थीं। निमाई को जाते देखकर उन्हें जो हार्दिक कष्ट हुआ, उसे वे सह न सकीं। वे उच्च स्वर से पुकारने लगीं, 'निमाई, लौट आ, निमाई लौट आ', पर निमाई ने उनकी एक न सुनी। स्त्रियों में एक निमाई को लौटाने का महामन्त्र जानती थीं। उसने 'हरि बोल, हरि बोल' कहना आरम्भ कर दिया। बस निमाई 'हरि बोल, हरि बोल' कहते हुए लौट पड़े।
मणि श्रीरामकृष्ण के पास बैठे हुए हैं। कहा – अहा!
श्रीरामकृष्ण स्थिर न रह सके। 'अहा' कहते हुए मणि की ओर देखकर प्रेमाश्रु वर्षण
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२१ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९२ | ६४१
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कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (बाबूराम और मास्टर से) – देखो, अगर मुझे भावसमाधि हो, तो तुम लोग शोरगुल न मचाना; संसारी आदमी समझेंगे – ढकोसला है।
निमाई का उपनयन हो रहा है। निमाई संन्यासी के वेश में हैं। शची और पड़ोसिनें चारों ओर खड़ी हैं। निमाई गाकर भिक्षा माँग रहे हैं।
सब चले गये। निमाई अकेले हैं। देव और देवियाँ ब्राह्मण और ब्राह्मणियों के वेश में उनकी स्तुति कर रहे हैं –
पुरुषगण – चन्द्रकिरण अंगे, नमो वामनरूपधारी।
स्त्रियाँ – गोपीगणमनमोहन, मंजुकुंजचारी।
निमाई – जय राधे, श्रीराधे!
पुरुष – व्रज-बालक-संग, मदन-मान-भंग।
स्त्रियाँ – उन्मादिनी व्रजकामिनी उन्माद-तरंग॥
पुरुष – दैत्य-छलन नारायणसुरगण-भय-हारी॥
स्त्रियाँ – व्रज-बिहारी, गोपनारी-मान-भिखारी॥
निमाई – जय राधे, श्रीराधे
श्रीरामकृष्ण यह गाना सुनते सुनते समाधिमग्न हो गये।
अब दूसरा अंक शुरू हुआ। अद्वैत के घर के सामने श्रीवास आदि बातें कर रहे हैं। मुकुन्द मधुर कण्ठ से गा रहे हैं।
निमाई घर में हैं। श्रीवास इनसे भेंट करने के लिए आये हैं। पहले शची से भेंट हुई। शची रोने लगीं, 'मेरा पुत्र संसार-धर्म में मन नहीं देता। जब से विश्वरूप चला गया है, तब से सदा ही मेरे प्राण काँपते रहते हैं कि कहीं निमाई भी संन्यासी न हो जाय।'
इसी समय निमाई आते हुए दीख पड़े। शची श्रीवास से कह रही हैं, 'देखो – जान पड़ता है पागल है – आँसुओं से हृदय प्लावित हुआ जा रहा है, कहो, कहो – किस तरह इसका यह भाव दूर हो?'
निमाई श्रीवास को देखकर रो रहे हैं – 'कहाँ, प्रभु! कहाँ मुझे कृष्णभक्ति हुई? अधम जन्म तो व्यर्थ ही कटा जा रहा हैं!'
श्रीरामकृष्ण मास्टर की ओर देखकर कुछ बोलना चाहते हैं पर बात नहीं निकलती। गला भर गया है। कपोलों पर आँसुओं की धारा बहती जा रही है। अनिमेष लोचनों से देख रहे हैं – निमाई श्रीवास के पैरों पर पड़े हुए कह रहे हैं – 'कहाँ, प्रभु! कृष्ण की भक्ति तो मुझे नहीं हुई!'
इधर निमाई पाठशाला के छात्रों को अब पढ़ा भी नहीं सकते। निमाई ने गंगादास से पढ़ा था। वे निमाई को समझाने आये हैं। उन्होंने श्रीवास से कहा – 'श्रीवासजी, हम
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लोग भी तो ब्राह्मण हैं, विष्णुपूजा भी किया करते हैं, परन्तु अब देखा जाता है, आप लोग उसके संसार को नष्ट-भ्रष्ट कर डालेंगे।'
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – यह संसारी की शिक्षा है, यह भी करो और वह भी करो। संसारी मनुष्य जब शिक्षा देता है, तब दोनों ओर सम्हालने के लिए कहता हैं।
मास्टर – जी हाँ।
गंगादास निमाई को फिर समझा रहे है – “क्यों जी, निमाई तुम्हें तो अब शास्त्रज्ञान भी हो गया है। तुम हमारे साथ तर्क करो। संसार-धर्म से बड़ा और कौन धर्म है? हमें समझाओ – तुम गृही हो, गृही की तरह आचरण न करके विपरीत आचरण क्यों करते हो?”
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – देखा? दोनों ओर सम्हालने के लिए कह रहा है।
मास्टर – जी हाँ।
निमाई ने कहा, “मैं अपनी इच्छा से संसार-धर्म की उपेक्षा नहीं कर रहा हूँ। मेरी तो यही इच्छा है कि लोक परलोक दोनों बनें। परन्तु प्रभु, न जाने क्यों प्राण उधर को खींचते हैं। समझाने पर भी नहीं समझते। अगाध समुद्र में कुदाना चाहते हैं।”
श्रीरामकृष्ण – अहा!
(७)
थियेटर में नित्यानन्द के वंशज; तथा श्रीरामकृष्ण का उद्दीपन
नवद्वीप में नित्यानन्द आये हुए हैं। वे निमाई को खोज रहे हैं, उसी समय निमाई से भेंट हो गयी। निमाई भी उनको खोज रहे थे। मुलाकात होने पर निमाई कह रहे हैं – “मेरा जीवन सार्थक है। मेरा स्वप्न सत्य हुआ। तुम मुझे स्वप्न में दर्शन देकर छिप गये थे।”
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से गद्गद स्वरों में) – निमाई कहते हैं कि स्वप्न में मैंने देखा है।
श्रीवास ने षड्भुजा मूर्ति देखी है और स्तव कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण भावावेश में षड्भुजा-मूर्ति के दर्शन कर रहे हैं।
गौरांग को ईश्वरावेश हुआ हैं। वे अद्वैत, श्रीवास, हरिदास आदि के साथ भावावेश में बातचीत कर रहे हैं।
गौरांग का भाव समझकर नित्यानन्द गा रहे हैं – “क्यों री सखी, कुंज में श्रीकृष्ण कब आये?”
श्रीरामकृष्ण गाना सुनते ही समाधिमग्न हो गये। बड़ी देर तक उसी अवस्था में रहे। वाद्य बज रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। अब खड़दह के एक बाबू आये, वे
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नित्यानन्द के वंशज थे। वे श्रीरामकृष्ण की कुर्सी के पीछे खड़े हुए। उम्र तीस पैंतीस की होगी। श्रीरामकृष्ण को उन्हें देखकर अपार आनन्द हुआ। उनका हाथ पकड़कर उनसे कितनी ही बातें कह रहे हैं। कभी कभी उनसे कहते हैं - 'यहाँ बैठो, बैठो न, तुम्हारे यहाँ रहने पर बड़ी उद्दीपना होगी।' स्नेहपूर्वक उनका हाथ पकड़ मानो खेल कर रहे हैं। उनके मुँह पर हाथ फेरकर कितना ही स्नेह कर रहे हैं।
गोस्वामी के चले जाने पर मास्टर से कह रहे हैं - "वह बड़ा पण्डित है। उसका बाप बड़ा भक्त है। जब मैं खड़दह के श्यामसुन्दर का दर्शन करने गया था, तब सौ रुपये देने पर भी जो भोग नहीं मिलता, वही भोग लाकर मुझे उसने खिलाया था।
"इसके लक्षण बड़े अच्छे हैं। जरा हिला-डुला देने से चेतना हो जायगी। उसे देखते ही उद्दीपना होती है और खूब होती है। और जरा देर रहता तो मैं खड़ा हो जाता।"
पर्दा उठ गया। राजपथ पर नित्यानन्द सिर पर हाथ लगाये हुए खून का बहना रोक रहे हैं। मधाई ने कलसी का टुकड़ा फेंककर मारा है। परन्तु नित्यानन्द का ध्यान मधाई की ओर नहीं है। गौरांग के प्रेम से वे पूरे मतवाले हो रहे हैं। श्रीरामकृष्ण को भावावेश हुआ है। देख रहे हैं, मारकर पश्चाताप करनेवाले मधाई को और उसके साथी जगाई को नित्यानन्द गले से लगा रहे हैं।
अब निमाई शची देवी से संन्यास की बात कह रहे हैं।
सुनकर शची देवी मूर्च्छित हो गयीं। उनको मूर्च्छित देखकर कितने ही दर्शक हाहाकार कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण तिल भर भी विचलित न होकर एकदृष्टि से देख रहे हैं। केवल आँखों के कोरों में एक एक बूँद आँसू झलक रहा हैं।
(८)
श्रीरामकृष्ण का भक्त-प्रेम
अभिनय समाप्त हो गया। श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर चढ़ रहे हैं। एक भक्त ने पूछा, आपने कैसा देखा? श्रीरामकृष्ण ने हँसते हुए कहा, असल और नकल एक देखा।
गाड़ी महेन्द्र मुखर्जी के कारखाने में जा रही है। एकाएक श्रीरामकृष्ण को भावावेश हो गया। कुछ देर बाद प्रेमपूर्वक आप ही आप कह रहे हैं - "हा कृष्ण! हे कृष्ण! ज्ञान कृष्ण! प्राण कृष्ण! मन कृष्ण! आत्मा कृष्ण! देह कृष्ण!" फिर कह रहे हैं - "प्राण हे गोविन्द मेरे जीवन!"
गाड़ी मुखर्जी के कारखाने में पहुँची। बड़े आदर-सत्कार के साथ महेन्द्र ने श्रीरामकृष्ण को भोजन कराया। मणि पास बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण स्नेहपूर्वक उनसे कह रहे हैं, तुम भी कुछ खाओ। हाथ से उठाकर मिष्टान्न प्रसाद दिया।
अब श्रीरामकृष्ण दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर जा रहे हैं। गाड़ी में महेन्द्र मुखर्जी तथा और