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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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६३० श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ सितम्बर, १८८४

तब भी वे ही हैं।”

दोनों मुखर्जी भाई और बाबूराम आदि आश्चर्यचकित हो श्रीरामकृष्ण की बातें सुन रहे हैं।

(७)

शम्भू मल्लिक की अनासक्ति। महापुरुष का आश्रय

श्रीरामकृष्ण – (मुखर्जी आदि से) – कप्तान की भी यथार्थ साधक जैसी अवस्था है।

“केवल ऐश्वर्य के रहने से ही मनुष्य की उसमें बिलकुल आसक्ति हो जाती है सो बात नहीं। शम्भू कहता था, 'हृदू! मैं बोरिया-बधना समेटकर चलने के लिए बैठा हुआ हूँ।' मैंने कहा, यह क्या अशुभ बातें बक रहे हो?

“तब शम्भू ने कहा, 'नहीं, कहो, यह सब फेंककर जैसे उनके पास पहुँच सकूँ।'

“उनके भक्त को किसी बात का भय नहीं है। भक्त उनका आत्मीय है। वे उसे खींच लेंगे। गन्धर्वों के हाथों दुर्योधन आदि के बँध जाने पर युधिष्ठिर ने ही उनका उद्धार किया था। कहा था, आत्मीयों की ऐसी अवस्था होने पर हमारे ही सर पर कलंक का टीका लगता है।”

रात के नौ बज चुके हैं। दोनों मुखर्जी भाई कलकत्ता लौटने के लिए तैयार हो रहे हैं। कमरे में और बरामदे में टहलते हुए श्रीरामकृष्ण ने सुना, विष्णु-मन्दिर में उच्च स्वर से संकीर्तन हो रहा है। उनके पूछने पर एक भक्त ने कहा, उनके साथ लाटू और हरीश भी गा रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – अच्छा, इतना (शोर) इसीलिए हो रहा है!

श्रीरामकृष्ण विष्णु-मन्दिर गये। साथ साथ भक्तगण भी गये। श्रीरामकृष्ण ने राधाकान्त को भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण ने देखा, ठाकुर-मन्दिर के ब्राह्मण जो पाककर्म करते हैं, नैवेद्य सजाते हैं, अतिथियों को प्रसाद परोसते हैं, वे तथा अन्य सब सेवक-टहलुए एकत्र होकर नामसंकीर्तन कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण ने जरा देर खड़े रहकर उनका उत्साह बढ़ाया।

आँगन के बीच से लौटते समय उन्होंने भक्तों से कहा – “देखो, इनमें से कोई वेश्या के यहाँ जाता है और कोई बर्तन धोया करता है!”

कमरे में आकर श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठे। जो लोग संकीर्तन कर रहे थे, उन लोगों ने श्रीरामकृष्ण को आकर प्रणाम किया। श्रीरामकृष्ण उनसे कह रहे हैं – “रुपये के लिए जिस तरह देह का पसीना बहाते हो उसी तरह उनका नाम लेकर नाच-कूद कर बहाना चाहिए।