श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१९ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९१ | ६३१
“मेरी इच्छा हुई तुम लोगों के साथ नाचूँ। जाकर देखा मसाला पड़ चुका था – मेथी तक। (सब हँसते हैं।) तब मैं क्या डालकर उसे सुगन्धित करता?
“तुम लोग कभी कभी इसी तरह नाम-संकीर्तन करने के लिए आ जाया करो।”
मुखर्जी बन्धुओं ने श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके विदाई ली।
श्रीरामकृष्ण के कमरे के ठीक उत्तरवाले बरामदे के किनारे मुखर्जियों की गाड़ी में बत्ती जला दी गयी हैं।
श्रीरामकृष्ण उसी बरामदे के ठीक उत्तर-पूर्ववाले कोने में उत्तर की ओर मुँह किये खड़े हैं। एक भक्त रास्ता दिखाते हुए एक लालटेन ले आये हैं, भक्तों को चढ़ाने के लिए।
आज अमावस्या है। रात अँधेरी है। श्रीरामकृष्ण को क्रमशः प्रणाम करके भक्तगण गाड़ी पर बैठ रहे हैं। श्रीरामकृष्ण एक भक्त से कह रहे हैं – “ईशान से जरा उसके काम के लिए कहना।”
गाड़ी में ज्यादा आदमी देखकर, घोड़े को कष्ट होगा, यह सोचकर श्रीरामकृष्ण ने कहा – “क्या गाड़ी में इतने आदमी समा जायेंगे?”
श्रीरामकृष्ण खड़े हैं। उनकी निर्मल मूर्ति देखते हुए भक्तगण कलकत्ते की ओर चल दिये।
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