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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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परिच्छेद ९२

चैतन्यलीला-दर्शन

(१)

भक्तों से वार्तालाप

आज रविवार है; श्रीरामकृष्ण के कमरे में बहुत से भक्त एकत्रित हुए हैं। राम, महेन्द्र, मुखर्जी, चुनीलाल, मास्टर आदि बहुत से भक्त हैं। २१ सितम्बर, १८८४।

चुनीलाल अभी हाल ही वृन्दावन से आये हैं। वे और राखाल, बलराम के साथ वहाँ गये थे। राखाल और बलराम अब भी नहीं लौटे। श्रीरामकृष्ण चुनीलाल से वृन्दावन की बातें कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – राखाल कैसा है?
चुनी – जी, अब वे अच्छे हैं।
श्रीरामकृष्ण – नृत्यगोपाल आयगा या नहीं?
चुनी – अभी तो मैं देखकर आ रहा हूँ, वहीं है।
श्रीरामकृष्ण – तुम्हारे परिवार के लोग किसके साथ आ रहे हैं?
चुनी – बलराम बाबू ने कहा है, मैं अच्छे आदमी के साथ भेज दूँगा। नाम उन्होंने नहीं बतलाया।

श्रीरामकृष्ण महेन्द्र मुखर्जी से नारायण की बातचीत कर रहे हैं। नारायण स्कूल में पढ़ता है। उम्र १६-१७ साल की है। श्रीरामकृष्ण के पास कभी-कभी आया-जाया करता है। श्रीरामकृष्ण उसे बड़ा प्यार करते हैं।

श्रीरामकृष्ण – बड़ा सरल है न?
'सरल' शब्द कहते ही श्रीरामकृष्ण का मन आनन्द से भर गया।
महेन्द्र – जी हाँ, बड़ा सरल है।
श्रीरामकृष्ण – उसकी माँ उस दिन आयी थी। अभिमानिनी थी, देखकर भय हुआ। इसके पश्चात् जब उसने देखा, यहाँ तुम आते हो, कप्तान आता है, तब उसने जरूर ही सोचा होगा, केवल नारायण और मैं कुल यही दो वहाँ नहीं जाते। (सब हँसने लगे।) इस कमरे में मिश्री रखी हुई थी। उसने देखकर कहा, अच्छी मिश्री है। साथ ही समझा होगा,

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