श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९२ | ६३५
आठ सिद्धियों में एक भी सिद्धि के रहते मैं नहीं मिलता।
"एक बाबू आया था, वह कंजा था। उसने कहा, 'आप परमहंस हैं तो अच्छा है, परन्तु जरा आपको मेरे लिए स्वस्त्ययन करना होगा।' कितनी नीच बुद्धि है! परमहंस कहता है और फिर स्वस्त्ययन भी कराना चाहता है! स्वस्त्ययन करके अमंगलबाधा दूर कर देना विभूति का प्रयोग दिखलाना है। अहंकार से ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। अहंकार कैसा है जानते हो? जैसे ऊँची जमीन, वहाँ बरसात का पानी नहीं ठहरता, बह जाता है। नीची जमीन में पानी जमता है और अंकुर उगते हैं। फिर पेड़ होते हैं और फल लगते हैं।
"इसीलिए हाजरा से कहता हूँ कि मैं ही समझता हूँ और सब मूर्ख हैं, ऐसी बुद्धि न लाया करो। सबको प्यार करना चाहिए। कोई दूसरे नहीं हैं। सर्व भूतों में परमात्मा का ही वास है। उन्हें छोड़ किसी भी वस्तु का अस्तित्व नहीं है। प्रह्लाद से श्रीठाकुरजी ने कहा, तुम वरदान लो। प्रह्लाद ने कहा, आपके दर्शन हो गये, मुझे और कुछ न चाहिए। श्रीठाकुरजी ने न छोड़ा। तब प्रह्लाद ने कहा, 'अगर वर दोगे, तो यही वर दो – मुझे जिन लोगों ने कष्ट दिया है, उनका अपराध न हो।'
"इसका अर्थ यह है कि ईश्वर ने एक रूप से कष्ट दिया है। उन आदमियों को यदि कष्ट हो तो वह ईश्वर को ही कष्ट मिलता है।"
(३)
श्रीरामकृष्ण का ज्ञानोन्माद तथा जाति-विचार
श्रीरामकृष्ण – श्रीमती (राधिका) को प्रेमोन्माद था। और भक्ति का उन्माद भी है जैसे हनुमान को हुआ था। सीताजी को अग्नि में प्रवेश करते हुए देखकर वे रामचन्द्र को मारने चले थे। एक और ज्ञानोन्माद है। एक ज्ञानी को मैंने पागल की तरह देखा था। कालीमन्दिर की प्रतिष्ठा के कुछ ही समय बाद की बात है। लोगों ने कहा, वह राममोहन राय की ब्राह्मसभा का एक आदमी था। एक पैर में फटा जूता था, हाथ में बाँस की पतली छड़ी, और एक हण्डी और आम का पौधा। गंगाजी में उसने डुबकी लगायी, फिर कालीमन्दिर में गया। हलधारी उस समय काली मन्दिर में बैठा था। वह मस्त होकर स्तवपाठ करने लगा – 'क्षौं क्षौं खट्वांगधारिणी' आदि।
"कुत्ते के पास पहुँचकर उसने उसके कान पकड़ उसका जूठा खाया। कुत्ते ने कुछ भी न किया। मेरी भी उस समय यही अवस्था हो चली थी। मैं हृदय के गले से लिपटकर कहने लगा – क्यों रे हृदय, क्या मेरी भी यही दशा होगी?
"मेरी उन्माद-अवस्था थी। नारायण शास्त्री ने आकर देखा, कन्धे पर एक बाँस रखकर टहल रहा था। तब उसने आदमियों से कहा – अः! इसे तो उन्माद हो गया है। उस अवस्था में जाति का कोई विचार नहीं रहता था। एक आदमी नीच जाति का था,