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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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६३६ श्री श्रीरामकृष्णवचनामृत २१ सितम्बर, १८८४

उसकी स्त्री शाक बनाकर भेजती थी और मैं खाता था।

“कालीमन्दिर में कंगले खा जाते थे, मैं उनकी जूठी पत्तलें सिर पर और मुँह में छुआता था। हलधारी ने तब मुझसे कहा, 'तू कर क्या रहा है? कंगलों का जूठा तूने खा लिया? अरे, तेरे बच्चों का अब विवाह कैसे होगा?' तब मुझे बड़ा गुस्सा आया। हलधारी मेरा दादा लगता था; परन्तु इससे क्या? मैंने कहा – 'क्यों रे! तू यही गीता और वेदान्त पढ़ता है? यही तू लोगों को सिखलाता है, ब्रह्म सत्य है और संसार मिथ्या? तूने खूब सोच रखा है, मेरे लड़के-बच्चे भी होंगे? आग लगे ऐसे तेरे गीता पढ़ने में।'

(मास्टर से) “देखो, सिर्फ पढ़ने और लिखने से कुछ नहीं होता। बाजे के बोल आदमी कह खूब सकता है, परन्तु हाथ से निकालना बड़ा मुश्किल है।”

श्रीरामकृष्ण फिर अपनी ज्ञानोन्माद-अवस्था का वर्णन कर रहे हैं –

“सेजो (मथुर) बाबू के साथ कुछ दिन नाव पर खूब सैर की। उसी यात्रा में नवद्वीप भी गया था। बजरे में देखा, केवट खाना पका रहे थे। उसके पास मैं खड़ा हुआ था। सेजो बाबू ने कहा, बाबा, वहाँ क्या कर रहे हो? मैंने हँसकर कहा, ये केवट बड़ा अच्छा खाना पका रहे हैं। सेजो बाबू समझ गये कि ये अब माँगकर भी खा सकते हैं। इसलिए कहा, बाबा, वहाँ से चले आओ।

“परन्तु अब वैसा नहीं होता। वह अवस्था अब नहीं है। अब तो ब्राह्मण हो, आचारी हो, श्रीठाकुरजी का प्रसाद हो, तभी खा सकता हूँ।

“कैसी कैसी अवस्थाएँ सब पार हो गयी हैं! कामारपुकुर के चीने शँखारी और दूसरे दूसरे जोड़वालों से मैंने कहा – देखो, तुम्हारे पैर पड़ता हूँ, बस एक बार उनका नाम लो। सबके पैर भी पड़ने चला था। तब चीने ने कहा – 'अरे तेरा यह पहला अनुराग है इसीलिए यह समभाव आया है।' पहले-पहल आँधी के आने पर जब धूल उड़ती है, तब आम और इमली सब एक जान पड़ते हैं। कौनसा आम है, और कौनसी इमली, यह समझ में नहीं आता।”

एक भक्त – यह भक्त का उन्माद, प्रेम का उन्माद या ज्ञान का उन्माद अगर संसारी आदमी को हो तो भला कैसे चल सकता है?

श्रीरामकृष्ण – (संसारी भक्तों को देखकर) – योगी दो तरह के होते हैं। एक व्यक्त योगी और दूसरे गुप्त योगी। संसार में गुप्त योगी होते हैं। उन्हें कोई समझते नहीं। संसारी के लिए मन से त्याग है, बाहर से नहीं।

राम – आपकी बच्चों को फुसलाकर समझानेवाली बात है। संसारी ज्ञानी हो सकता है, पर विज्ञानी नहीं हो सकता।

श्रीरामकृष्ण – वह अन्त में चाहे तो विज्ञानी हो सकता है। पर जबरन संसार छोड़ना अच्छा नहीं।

CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar