श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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| २१ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९२ | ६३७ |
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राम – केशव सेन कहते थे, उनके पास आदमी इतना क्यों जाते हैं? एक दिन चुपचाप चुभो देंगे तब भागना होगा।
श्रीरामकृष्ण – चुभों क्यों दूँगा? मैं तो आदमियों से कहता हूँ, यह भी करो और वह भी करो। संसार भी करो और ईश्वर को भी पुकारो। सब कुछ छोड़ने के लिए तो मैं कहता नहीं। (हँसकर) केशव सेन ने एक दिन लेक्चर दिया। कहा 'हे ईश्वर ऐसा करो कि हम लोग भक्ति-नदी में गोते लगा सकें और गोते लगाकर सच्चिदानन्द-सागर में पहुँच जायँ।' स्त्रियाँ सब 'चिक' की ओट में बैठी थीं। मैंने केशव से कहा, 'एक ही साथ सब आदमियों के गोते लगाने से कैसे होगा? तो इन लोगों (स्त्रियों) की दशा क्या होगी? कभी कभी किनारे पर लग जाया करना। फिर गोते लगाना, फिर ऊपर आना।' केशव और दूसरे लोग हँसने लगे। हाजरा कहता है, 'तुम रजोगुणी आदमियों को बड़ा प्यार करते हो, जिनके रुपया-पैसा, मान-मर्यादा खूब है।' अगर ऐसी बात है तो हरीश, लाटू, इन्हें क्यों प्यार करता हूँ? नरेन्द्र को क्यों प्यार करता हूँ? उसके तो भूना भाँटा खाने को नमक भी नहीं है।
श्रीरामकृष्ण कमरे से बाहर आये; मास्टर से बातचीत करते हुए झाऊतल्ले की ओर जा रहे है। एक भक्त गड़ुआ और अँगोछा लेकर साथ साथ जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण कलकत्ते में आज 'चैतन्यलीला' नाटक देखने जायेंगे, उसी की बाते हो रही हैं।
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – राम सब रजोगुण की बातें कह रहा है। इतने अधिक दाम खर्च करके बैठने की क्या जरूरत है?
बाक्स का टिकट न लिया जाय, श्रीरामकृष्ण का यह उद्देश्य है।
(४)
हाथीबागान में भक्त के घर। श्री महेन्द्र मुखर्जी की सेवा
श्रीरामकृष्ण श्रीयुत महेन्द्र मुखर्जी की गाड़ी पर चढ़कर दक्षिणेश्वर से कलकत्ता आ रहे हैं। आज रविवार है, २१ सितम्बर, १८८४। दिन के पाँच का समय है। गाड़ी में महेन्द्र मुखर्जी, मास्टर और दो-एक व्यक्ति और हैं। गाड़ी के कुछ बढ़ते ही ईश्वरचिन्तन करते हुए श्रीरामकृष्ण भाव-समाधि में मग्न हो गये।
बड़ी देर के बाद समाधि छूटी। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, हाजरा भी मुझे शिक्षा देता है! कुछ देर बाद फिर कह रहे हैं – मैं पानी पीऊँगा। बाह्य संसार में मन को उतारने के लिए समाधि के भंग होने पर प्रायः श्रीरामकृष्ण यह बात कहते थे।
महेन्द्र मुखर्जी – (मास्टर से) – तो कुछ जलपान के लिए मँगा लिया जाय।
मास्टर – नहीं, इस समय ये न खायेंगे।
श्रीरामकृष्ण – (भावस्थ) – मैं खाऊँगा और शौच भी जाऊँगा।
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar