श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६४२ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २१ सितम्बर, १८८४ |
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लोग भी तो ब्राह्मण हैं, विष्णुपूजा भी किया करते हैं, परन्तु अब देखा जाता है, आप लोग उसके संसार को नष्ट-भ्रष्ट कर डालेंगे।'
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – यह संसारी की शिक्षा है, यह भी करो और वह भी करो। संसारी मनुष्य जब शिक्षा देता है, तब दोनों ओर सम्हालने के लिए कहता हैं।
मास्टर – जी हाँ।
गंगादास निमाई को फिर समझा रहे है – “क्यों जी, निमाई तुम्हें तो अब शास्त्रज्ञान भी हो गया है। तुम हमारे साथ तर्क करो। संसार-धर्म से बड़ा और कौन धर्म है? हमें समझाओ – तुम गृही हो, गृही की तरह आचरण न करके विपरीत आचरण क्यों करते हो?”
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – देखा? दोनों ओर सम्हालने के लिए कह रहा है।
मास्टर – जी हाँ।
निमाई ने कहा, “मैं अपनी इच्छा से संसार-धर्म की उपेक्षा नहीं कर रहा हूँ। मेरी तो यही इच्छा है कि लोक परलोक दोनों बनें। परन्तु प्रभु, न जाने क्यों प्राण उधर को खींचते हैं। समझाने पर भी नहीं समझते। अगाध समुद्र में कुदाना चाहते हैं।”
श्रीरामकृष्ण – अहा!
(७)
थियेटर में नित्यानन्द के वंशज; तथा श्रीरामकृष्ण का उद्दीपन
नवद्वीप में नित्यानन्द आये हुए हैं। वे निमाई को खोज रहे हैं, उसी समय निमाई से भेंट हो गयी। निमाई भी उनको खोज रहे थे। मुलाकात होने पर निमाई कह रहे हैं – “मेरा जीवन सार्थक है। मेरा स्वप्न सत्य हुआ। तुम मुझे स्वप्न में दर्शन देकर छिप गये थे।”
श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से गद्गद स्वरों में) – निमाई कहते हैं कि स्वप्न में मैंने देखा है।
श्रीवास ने षड्भुजा मूर्ति देखी है और स्तव कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण भावावेश में षड्भुजा-मूर्ति के दर्शन कर रहे हैं।
गौरांग को ईश्वरावेश हुआ हैं। वे अद्वैत, श्रीवास, हरिदास आदि के साथ भावावेश में बातचीत कर रहे हैं।
गौरांग का भाव समझकर नित्यानन्द गा रहे हैं – “क्यों री सखी, कुंज में श्रीकृष्ण कब आये?”
श्रीरामकृष्ण गाना सुनते ही समाधिमग्न हो गये। बड़ी देर तक उसी अवस्था में रहे। वाद्य बज रहे हैं। श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। अब खड़दह के एक बाबू आये, वे