भारतकोश
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२१ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९२ | ६४१

कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण – (बाबूराम और मास्टर से) – देखो, अगर मुझे भावसमाधि हो, तो तुम लोग शोरगुल न मचाना; संसारी आदमी समझेंगे – ढकोसला है।

निमाई का उपनयन हो रहा है। निमाई संन्यासी के वेश में हैं। शची और पड़ोसिनें चारों ओर खड़ी हैं। निमाई गाकर भिक्षा माँग रहे हैं।

सब चले गये। निमाई अकेले हैं। देव और देवियाँ ब्राह्मण और ब्राह्मणियों के वेश में उनकी स्तुति कर रहे हैं –

पुरुषगण – चन्द्रकिरण अंगे, नमो वामनरूपधारी।
स्त्रियाँ – गोपीगणमनमोहन, मंजुकुंजचारी।
निमाई – जय राधे, श्रीराधे!
पुरुष – व्रज-बालक-संग, मदन-मान-भंग।
स्त्रियाँ – उन्मादिनी व्रजकामिनी उन्माद-तरंग॥
पुरुष – दैत्य-छलन नारायणसुरगण-भय-हारी॥
स्त्रियाँ – व्रज-बिहारी, गोपनारी-मान-भिखारी॥
निमाई – जय राधे, श्रीराधे

श्रीरामकृष्ण यह गाना सुनते सुनते समाधिमग्न हो गये।

अब दूसरा अंक शुरू हुआ। अद्वैत के घर के सामने श्रीवास आदि बातें कर रहे हैं। मुकुन्द मधुर कण्ठ से गा रहे हैं।

निमाई घर में हैं। श्रीवास इनसे भेंट करने के लिए आये हैं। पहले शची से भेंट हुई। शची रोने लगीं, 'मेरा पुत्र संसार-धर्म में मन नहीं देता। जब से विश्वरूप चला गया है, तब से सदा ही मेरे प्राण काँपते रहते हैं कि कहीं निमाई भी संन्यासी न हो जाय।'

इसी समय निमाई आते हुए दीख पड़े। शची श्रीवास से कह रही हैं, 'देखो – जान पड़ता है पागल है – आँसुओं से हृदय प्लावित हुआ जा रहा है, कहो, कहो – किस तरह इसका यह भाव दूर हो?'

निमाई श्रीवास को देखकर रो रहे हैं – 'कहाँ, प्रभु! कहाँ मुझे कृष्णभक्ति हुई? अधम जन्म तो व्यर्थ ही कटा जा रहा हैं!'

श्रीरामकृष्ण मास्टर की ओर देखकर कुछ बोलना चाहते हैं पर बात नहीं निकलती। गला भर गया है। कपोलों पर आँसुओं की धारा बहती जा रही है। अनिमेष लोचनों से देख रहे हैं – निमाई श्रीवास के पैरों पर पड़े हुए कह रहे हैं – 'कहाँ, प्रभु! कृष्ण की भक्ति तो मुझे नहीं हुई!'

इधर निमाई पाठशाला के छात्रों को अब पढ़ा भी नहीं सकते। निमाई ने गंगादास से पढ़ा था। वे निमाई को समझाने आये हैं। उन्होंने श्रीवास से कहा – 'श्रीवासजी, हम