श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५ अगस्त, १८८२
परिच्छेद ७
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निकलता है। जब कच्ची पूरी को पका डाला, तब वह फिर चुप हो जाता है। वैसे ही समाधिस्थ पुरुष लोकशिक्षण के लिए फिर नीचे उतरता है, फिर बोलता है।
“जब तक मधुमक्खी फूल पर नहीं बैठती, तब तक भनभनाती रहती है। फूल पर बैठकर मधु पीना शुरू करने के बाद वह चुप हो जाती है। हाँ, मधुपान के उपरान्त मस्त होकर फिर कभी कभी भनभनाती है।
“तालाब में घड़ा भरते समय भक् भक् आवाज होती है। घड़ा भर जाने के बाद फिर आवाज नहीं होती। (सब हँसे।) हाँ, यदि एक घड़े से पानी दूसरे में डाला जाय, तो फिर शब्द होता है।” (हास्य)
(४)
ज्ञान एवं विज्ञान। अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद तथा द्वैतवाद का समन्वय
श्रीरामकृष्ण – ऋषियों को ब्रह्मज्ञान हुआ था – विषयबुद्धि का लेशमात्र रहते यह ब्रह्मज्ञान नहीं होता। ऋषि लोग कितना परिश्रम करते थे! सबेरे आश्रम से चले जाते थे। दिनभर अकेले ध्यान-चिंतन करते और रात को आश्रम में लौटकर कुछ फलमूल खाते थे। देखना, सुनना, छूना इन सब विषयों से मन को अलग रखते थे; तब कहीं उन्हें ब्रह्म का बोध होता था।
“कलियुग में लोगों के प्राण अन्न पर निर्भर हैं, देहात्मबुद्धि जाती नहीं। इस दशा में ‘सोऽहम्’ – मैं ब्रह्म हूँ – कहना अच्छा नहीं। सभी काम किए जाते हैं, फिर ‘मैं ही ब्रह्म हूँ’ यह कहना ठीक नहीं। जो विषय का त्याग नहीं कर सकते, जिनका अहंभाव किसी तरह जाता नहीं, उनके लिए ‘मैं दास हूँ’, ‘मैं भक्त हूँ’ यह अभिमान अच्छा है। भक्तिपथ में रहने से भी ईश्वर का लाभ होता है।
“ज्ञानी ‘नेति नेति’ – ब्रह्म यह नहीं, वह नहीं, अर्थात् कोई भी ससीम वस्तु नहीं – यह विचार करके सब विषयबुद्धि छोड़े तब ब्रह्म को जान सकता है। जैसे कोई जीने की एक एक सीढ़ी पार करते हुए छत पर पहुँच सकता है। पर विज्ञानी – जिसने विशेष रूप से ईश्वर से मेल-मिलाप किया है – और भी कुछ दर्शन करता है वह देखता है कि जिन चीजों से छत बनी है – उन ईंटों, चूने, सुर्खी से जीना भी बना है। ‘नेति नेति’ करके जिस ब्रह्मवस्तु का ज्ञान होता है, वही जीव और जगत् होती है। विज्ञानी देखता है कि जो निर्गुण है, वही सगुण भी है।
“छत पर बहुत देर तक लोग ठहर नहीं सकते फिर उतर आते हैं। जिन्होंने समाधिस्थ होकर ब्रह्मदर्शन किया है वे भी नीचे उतरकर देखते हैं कि वही जीव-जगत् हुआ है। सा, रे, ग, मं, प, ध, नि। ‘नि’ में – चरमभूमि में – बहुत देर तक रहा नहीं