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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 67
४४श्रीरामकृष्णवचनामृत५ अगस्त, १८८२

जाता। 'अहं' नहीं मिटता; तब मनुष्य देखता है कि ब्रह्म ही 'मैं', जीव, जगत – सब कुछ हुआ है। इसी का नाम विज्ञान है।

“ज्ञानी की राह भी राह है, ज्ञान-भक्ति की राह भी राह है, फिर भक्ति की भी राह एक राह है। ज्ञानयोग भी सत्य है, और भक्तिपथ भी सत्य है सभी रास्ते से ईश्वर के समीप जाया जा सकता है। ईश्वर जब तक जीवों में 'मैं' बोध रखता है, तब तक भक्तिपथ ही सरल है।

“विज्ञानी देखता है कि ब्रह्म अटल, निष्क्रिय, सुमेरुवत् है। यह संसार उसके सत्त्व, रज और तम – इन तीन गुणों से बना है, पर वह निर्लिप्त है।

“विज्ञानी देखता है कि जो ब्रह्म है वही भगवान् है, – जो गुणातीत है वही षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् है। ये जीव और जगत्, मन और बुद्धि, भक्ति, वैराग्य और ज्ञान – सब उसके ऐश्वर्य हैं। (सहास्य) जिस बाबू के घरद्वार नहीं है – या तो बिक गया – वह बाबू कैसा! (सब हँसे।) ईश्वर षडैश्वर्यपूर्ण है। यदि उसके ऐश्वर्य न होता तो कौन उसकी परवाह करता? (सब हँसे।)

विभु के रूप में एक – किन्तु शक्तिविशेष

“देखो न, यह जगत् कैसा विचित्र है! कितने प्रकार की वस्तुएँ – चन्द्र, सूर्य, नक्षत्र – कितने प्रकार के जीव इसमें हैं! बड़ा-छोटा, अच्छा-बुरा; किसी में शक्ति अधिक है, किसी में कम।”

विद्यासागर – क्या ईश्वर ने किसी को अधिक शक्ति दी है और किसी को कम?

श्रीरामकृष्ण – वह विभु के रूप में सब प्राणियों में है – चींटियों तक में है। पर शक्ति का तारतम्य होता है; नहीं तो क्यों कोई दस आदमियों को हरा देता है, और कोई एक ही आदमी से भागता है? और ऐसा न हो तो भला तुम्हें ही सब कोई क्यों मानते हैं? क्या तुम्हारे दो सींग निकले हैं? (हास्य।) औरों की अपेक्षा तुममें अधिक दया है, विद्या है, इसीलिए तुमको लोग मानते हैं और देखने आते हैं। क्या तुम यह बात नहीं मानते हो?

विद्यासागर मुसकराते हैं।

केवल पाण्डित्य, पुस्तकी विद्या असार है – भक्ति ही सार है।

श्रीरामकृष्ण – केवल पण्डिताई में कुछ नहीं है। लोग किताबें इसलिए पढ़ते हैं कि वे ईश्वरलाभ में सहायता करेंगी – उनसे ईश्वर का पता लगेगा। 'आपकी पोथी में क्या है?' – किसी ने एक साधु से पूछा। साधु ने उसे खोलकर दिखाया। हरएक पन्ने में 'ॐ रामः' लिखा था, और कुछ नहीं।

“गीता का अर्थ क्या है? उसे दस बार कहने से जो होता है वही। दस बार 'गीता' 'गीता' कहने से 'त्यागी' 'त्यागी' निकल आता है। गीता यह शिक्षा दे रही है कि हे जीव,