श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५ अगस्त, १८८२ परिच्छेद ७ ४५
तू सब छोड़कर ईश्वर-लाभ की चेष्टा कर। कोई साधु हो चाहे गृहस्थ, मन से सारी आसक्ति दूर करनी चाहिए।
“जब चैतन्यदेव दक्षिण में तीर्थ-भ्रमण कर रहे थे तो उन्होंने देखा कि एक आदमी गीता पढ़ रहा है। एक दूसरा आदमी थोड़ी दूर बैठ उसे सुन रहा है और सुनकर रो रहा है – आँखों से आँसू बह रहे हैं। चैतन्यदेव ने पूछा, ‘क्या तुम यह सब समझ रहे हो?’ उसने कहा, ‘प्रभु, इन श्लोकों का अर्थ तो मैं नहीं समझता हूँ।’ उन्होंने पूछा, ‘तो रोते क्यों हो?’ भक्त ने जवाब दिया, मैं देखता हूँ कि अर्जुन का रथ है और उसके सामने भगवान् और अर्जुन बातचीत कर रहे हैं। बस, यही देखकर मैं रो रहा हूँ।’ ”
(५)
भक्तियोग का रहस्य
श्रीरामकृष्ण – विज्ञानी क्यों भक्ति लिए रहते हैं? इसका उत्तर यह है कि ‘मैं’ नहीं दूर होता। समाधि-अवस्था में दूर तो होता है, परन्तु फिर आ जाता है। साधारण जीवों का ‘अहम्’ नहीं जाता। पीपल का पेड़ काट डालो, फिर उसके दूसरे दिन अंकुर निकल आता है। (सब हँसे।)
“ज्ञानलाभ के बाद भी, न जाने कहाँ से ‘मैं’ फिर आ जाता है। स्वप्न में तुमने बाघ देखा; इसके बाद जागे, तो भी तुम्हारी छाती धड़कती है। जीवों को जो दुःख होता है, ‘मैं’ से ही होता है। बैल ‘हम्बा, हम्बा’ (हम, हम) करता है, इसी से तो इतनी यातना मिलती है। हल में जोता जाता है, वर्षा और धूप सहनी पड़ती है और फिर कसाई लोग काटते हैं, चमड़े से जूते बनते हैं, ढोल बनता है, – तब खूब पिटता है। (हास्य)
“फिर भी निस्तार नहीं। अन्त में आँतों से ताँत बनती है और उसे धुनिया अपने धनुहे में लगाता है। तब वह ‘मैं’ नहीं कहता, तब कहता है ‘तू-ऊँ, तू-ऊँ’ (अर्थात् तुम, तुम)। जब ‘तुम’ ‘तुम’ कहता है तब निस्तार होता है। हे ईश्वर! मैं दास हूँ, तुम प्रभु हो; मैं सन्तान हूँ, तुम माँ हो।
“राम ने पूछा, हनुमान, तुम मुझे किस भाव से देखते हो? हनुमान ने कहा, राम! जब मुझे ‘मैं’ का बोध रहता है, तब देखता हूँ, तुम पूर्ण हो, मैं अंश हूँ, तुम प्रभु हो, मैं दास हूँ; और राम! जब तत्त्वज्ञान होता है तब देखता हूँ, तुम्हीं ‘मैं’ हो और मैं ही ‘तुम’ हूँ।
“सेव्य-सेवक भाव ही अच्छा है। ‘मैं’ जब कि हटने का ही नहीं तो बना रहने दो साले को ‘दास मैं’।