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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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६४८ श्रीरामकृष्णवचनामृत २६ सितम्बर, १८८४

कहना पड़ता है, क्यों चाचा कैसे हो? तो वह खूब प्रसन्न हो जायगा कहो तो तुम्हारे पास ही बैठकर तम्बाकू पीने लगे।

“बुरे आदमी को देखते ही मैं सावधान हो जाता हूँ। अगर कोई आकर पूछता है, क्या हुक्का-सुक्का है? तो मैं कहता हूँ, हाँ है।

“किसी का स्वभाव साँप के समान होता है। तुम्हारे बिना जाने ही कहो वह तुम्हें काट खाय। उसकी चोट से बचने के लिए बहुत विचार करना पड़ता है। नहीं तो तुम्हें ही ऐसा क्रोध आ जायगा कि उल्टे उसी के नाश करने की चिन्ता में पड़ जाओगे। इतने पर भी कभी कभी सत्संग की बड़ी आवश्यकता है। सत्संग करने पर ही सत् असत् का विचार आता है।”

विजय – अवकाश नहीं है, यहाँ काम में फँसा रहता हूँ।

श्रीरामकृष्ण – तुम लोग आचार्य हो, दूसरों को छुट्टी भी मिलती है, परन्तु आचार्य को छुट्टी नहीं मिलती, नायब जब एक हल्के का अच्छा इन्तजाम कर लेता है, तब जमींदार उसे दूसरे महाल के इन्तजाम के लिए भेजता है। इसीलिए तुम्हें छुट्टी नहीं मिलती। (सब हँसते हैं।)

विजय – (हाथ जोड़कर) – आप जरा आशीर्वाद दीजिये।

श्रीरामकृष्ण – ये सब अज्ञान की बातें हैं। आशीर्वाद ईश्वर देंगे।

गृही ब्राह्मभक्त को उपदेश

विजय – जी, आप कुछ उपदेश दीजिये।

श्रीरामकृष्ण – (समाज-गृह के चारों ओर नजर डालकर सहास्य) – यह (ब्राह्मसमाज) एक तरह से अच्छा है। इसमें राब भी है और शीरा भी। (सब हँसते हैं।) नक्श खेल जानते हो? सत्रह से अधिक होने पर बाजी बरबाद हो जाती है। यह एक प्रकार का ताशों का खेल है। जो लोग सत्रह नुक्ताओं से कम में रह जाते हैं – जो लोग पाँच में रहते हैं, सात या दस में, वे होशियार हैं। मैं अधिक चढ़कर जल गया हूँ।

“केशव सेन ने घर में लेक्चर दिया था। मैंने सुना था। बहुत से आदमी बैठे थे। चिक के भीतर औरतें भी थीं। केशव ने कहा, ‘हे ईश्वर, तुम आशीर्वाद दो कि हम लोग भक्ति की नदी में बिलकुल डूब जाय।’ मैंने हँसकर केशव से कहा, ‘भक्ति की नदी में अगर बिलकुल ही डूब जाओगे, तो चिक के भीतर जो बैठी हुई हैं, उनकी दशा क्या होगी? इसलिए एक काम याद रखना, जब डूबना है, तब कभी-कभी तट पर लग जाया करना। बिलकुल ही तलस्पर्श न कर लेना।’ यह बात सुनकर केशव तथा दूसरे लोग हँसने लगे।

“खैर, आन्तरिकता के रहने पर संसार में भी ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है। ‘मैं’ और

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