श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| २८ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ९३ | ६४९ |
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'मेरा' यही अज्ञान है। हे 'ईश्वर, तुम और तुम्हारा' यह ज्ञान है।
"संसार में इस तरह रहो जैसे बड़े आदमियों के घर की दासी। सब काम करती है, बाबू के बच्चे की सेवा करके उसे बड़ा कर देती है, उसका नाम लेकर कहती है, यह मेरा हरि है। परन्तु मन ही मन खूब जानती है कि न यह घर मेरा है और न यह लड़का। वह सब काम तो करती है, परन्तु उसका मन उसके देश में लगा रहता है। उसी तरह संसार का सब काम करो, परन्तु मन ईश्वर पर रखो और समझो कि घर, परिवार, पुत्र सब ईश्वर के हैं। मेरा यहाँ कुछ भी नहीं है। मैं केवल उनका दास हूँ।
"मैं मन से त्याग करने के लिए कहता हूँ। संसार छोड़ने के लिए मैं नहीं कहता। अनासक्त होकर, संसार में रहकर, अन्तर से उनकी प्राप्ति की इच्छा रखने पर, उन्हें मनुष्य पा सकता है।
(विजय से) "मैं भी आँखें मूँदकर ध्यान करता था। उसके बाद सोचा, क्या इस तरह करने पर (आँखें मूँदने पर) ईश्वर रहते हैं और इस तरह करने पर (आँखें खोलने पर) ईश्वर नहीं रहते ? आँखें खोलकर भी मैंने देखा, सब भूतों में ईश्वर विराजमान हैं। मनुष्य, जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, सूर्य-चन्द्र, जल-स्थल और अन्य सब भूतों में वे हैं।
"मैं क्यों शिवनाथ को चाहता हूँ? जो बहुत दिनों तक ईश्वर की चिन्ता करता है, उसके भीतर सार पदार्थ रहता है। उसके भीतर ईश्वर की शक्ति रहती है। जो अच्छा गाता और बजाता है, कोई एक विद्या बहुत अच्छी तरह जानता है, उसके भीतर भी सार पदार्थ है, ईश्वर की शक्ति है। यह गीता का मत है। चण्डी में है, जो बहुत सुन्दर है, उसके भीतर भी सार पदार्थ है, ईश्वर की शक्ति है। (विजय से) अहा! केदार का कैसा स्वभाव हो गया है; आते ही रोने लगता है। दोनों आँखें सदा ही फूली हुई-सी दीख पड़ती हैं।"
विजय – वहाँ केवल आप ही की बातें होती हैं और वे आपके पास आने के लिए व्याकुल हो रहे हैं।
कुछ देर बाद श्रीरामकृष्ण उठे। ब्राह्मभक्तों ने नमस्कार किया। उन्होंने भी नमस्कार किया। श्रीरामकृष्ण गाड़ी पर बैठे। अधर के यहाँ श्री दुर्गा के दर्शन करने के लिए जा रहे हैं।
(३)
महाष्टमी के दिन राम के घर पर श्रीरामकृष्ण
आज रविवार, महाष्टमी है, २८ सितम्बर, १८८४। श्रीरामकृष्ण देवी-प्रतिमा के दर्शन के लिए कलकत्ता आये हुए हैं। अधर के यहाँ शारदीय दुर्गोत्सव हो रहा है। श्रीरामकृष्ण का तीनों दिन न्योता है। अधर के यहाँ प्रतिमादर्शन करने के पहले आप राम के घर जा रहे हैं। विजय, केदार, राम, सुरेन्द्र, चुनीलाल, नरेन्द्र, निरंजन, नारायण,