श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९४ ६५७
हुए ही फूट-फूटकर रोने लगे थे। उन्हें कृष्ण की याद आ गयी थी। जीव का स्वभाव है कि उसकी बुद्धि संशयात्मक होती है। वे कहते हैं 'हाँ यह सच तो है, परन्तु -'
'हाजरा किसी तरह भी विश्वास नहीं करना चाहता कि ब्रह्म और शक्ति, शक्ति और शक्तिमान दोनों अभेद हैं। जब वे निष्क्रिय हैं, तब उन्हें हम ब्रह्म कहते हैं और जब सृष्टि, स्थिति और प्रलय करते हैं, तब उन्हीं को शक्ति कहते हैं। हैं वे एक ही वस्तु - अभेद। अग्नि कहने के साथ ही दाहिका शक्ति का बोध हो जाता है और दाहिका शक्ति के कहने पर आग की याद आती है। एक को छोड़कर दूसरे को सोचने की गुंजाइश नहीं है।
"तब मैंने प्रार्थना की, 'माँ, हाजरा यहाँ का मत उलट देना चाहता है। या तो तू उसे समझा दे या उसे यहाँ से हटा दो।' उसके दूसरे दिन उसने आकर कहा, हाँ मानता हूँ। तब उसने कहा, विभु सब जगह हैं।"
भवनाथ – (हँसकर) – हाजरा की इसी बात पर आपको इतना दुःख हुआ था?
श्रीरामकृष्ण – मेरी अवस्था बदल गयी है। अब आदमियों के साथ वादविवाद नहीं कर सकता। इस समय मेरी ऐसी अवस्था नहीं है कि हाजरा के साथ तर्क और झगड़ा कर सकूँ। यदु मल्लिक के बगीचे में हृदय ने कहा, 'मामा, क्या मुझे रखने की तुम्हारी इच्छा नहीं है?' मैंने कहा, 'नहीं, अब मेरी वैसी अवस्था नहीं है कि तेरे साथ गला फाड़ता रहूँ।'
"ज्ञान और अज्ञान किसे कहते हैं? जब तक यह बोध है कि ईश्वर दूर हैं तब तक अज्ञान है और जब यह बोध है कि ईश्वर यहीं तथा सर्वत्र है, तभी ज्ञान है।
"जब यथार्थ ज्ञान होता है, तब सब चीजें चेतन जान पड़ती हैं। मैं शिबू के साथ खूब मिलता-जुलता था। तब शिबू निरा बच्चा था। चार-पाँच साल का रहा होगा। उस समय मैं देश में था, बादल घिरे हुए थे और मेघों की गर्जना हो रही थी। शिबू मुझसे कहता था, चाचा, देखो, चकमक पत्थर घिस रहा है। (सब हँसते हैं।) एक दिन देखा, वह अकेला पतिंगे पकड़ने जा रहा था। इधर-उधर के पौधे हिल रहे थे। तब वह पत्तियों से कह रहा था, चुप-चुप, मैं पतिंगे पकडूंगा। बालक सब चेतन देख रहा है! सरल विश्वास, बालक की तरह का विश्वास जब तक नहीं होता, तब तक ईश्वर नहीं मिलते। उफ! मेरी कैसी अवस्था थी! एक दिन घास के वन में किसी कीड़े ने काट लिया। मुझे इससे बड़ा भय हुआ। सोचा कहीं साँप ने न काटा हो। तब क्या करता? मैंने सुना था, अगर वह फिर काटे तो विष उठा लेता है। बस वहीं बैठा हुआ मैं बिल खोजने लगा कि वह फिर काटे। इसी तरह बैठा था कि एक नें पूछा, यह आप क्या कर रहे हैं? मैंने कहा, बिल खोज रहा हूँ। उसने सब कुछ सुनकर कहा, ठीक वहीं पर उसे दुबारा काटना चाहिए, तब कहीं विष उतरता है। तब मैं उठकर चला आया। शायद गोजर या किसी कीड़े ने काटा था।
"एक दूसरे दिन मैंने रामलाल से सुना, शरद् काल की ओस देह में लगाना अच्छा होता है। क्या एक श्लोक है, रामलाल ने कहा था। कलकत्ते से जाते समय गाड़ी की