श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ६५८ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | २९ सितम्बर, १८८४ |
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खिड़की से मैं गला बढ़ाये हुए गया, ताकि खूब ओस लगे। बस दूसरे ही दिन बीमार पड़ गया।” (सब हँसते हैं।)
अब श्रीरामकृष्ण कमरे के भीतर जाकर बैठे। उनके पैर कुछ फुले हुए थे। उन्होंने भक्तों को हाथ लगाकर देखने के लिए कहा कि दोनों उँगली से दबाने पर गङ्ढा पड़ता है या नहीं। थोड़ा-थोड़ा गङ्ढा पड़ने लगा। परन्तु लोगों ने कहा, यह कुछ नहीं है।
श्रीरामकृष्ण – (भवनाथ से) – सींती के महेन्द्र को बुला देना। उसके कहने से मेरा मन अच्छा हो जायगा।
भवनाथ – (सहास्य) – आप दवा पर बड़ा विश्वास करते हैं, हम लोग उतना नहीं करते।
श्रीरामकृष्ण – दवाएँ भी उन्हीं की हैं। एक रूप से वे ही चिकित्सक हैं। गंगाप्रसाद ने बतलाया, आप रात को पानी न पिया कीजिये। मैं उसकी बात को वेदवाक्य की तरह पकड़े हुए हूँ। मै मानता हूँ, वह साक्षात् धन्वन्तरि है।
(२)
समाधि में श्रीरामकृष्ण
हाजरा आकर बैठे। दो-एक बातें इधर-उधर की करके श्रीरामकृष्ण ने कहा – “देखो, कल राम के यहाँ उतने आदमी बैठे हुए थे, विजय, केदार, आदि फिर भी नरेन्द्र को देखकर मुझे इतना उद्दीपन क्यों हुआ? केदार, मैंने देखा, कारणानन्द के घर का है।”
श्रीरामकृष्ण महाष्टमी के दिन कलकत्ता गये हुए थे – देवी-प्रतिमा के दर्शनों के लिए। अधर के यहाँ प्रतिमा-दर्शन करने के लिए जाने से पहले राम के यहाँ गये थे। वहाँ बहुत से भक्त आये थे। नरेन्द्र को देखकर श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये थे। नरेन्द्र के घुटने पर उन्होंने अपना पैर रख दिया था और खड़े हुए समाधि-मग्न हो गये थे।
देखते ही देखते नरेन्द्र भी आ गये। उन्हें देखकर श्रीरामकृष्ण के आनन्द की सीमा नहीं रही। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करने के पश्चात् भवनाथ आदि के साथ उसी कमरे में नरेन्द्र बातचीत करने लगे। पास मास्टर हैं। कमरे में लम्बी चटाई बिछी हुई है। नरेन्द्र बातचीत करते हुए पेट के बल चटाई पर लेट गये। उन्हें देखते ही देखते श्रीरामकृष्ण समाधिस्थ हो गये। वे नरेन्द्र की पीठ पर जा बैठे, वहीं समाधि में डूब गये।
भवनाथ गा रहे हैं – (भाव) –
“माँ, आनन्दमयी होकर मुझे निरानन्द न करना। तेरे कमलचरणों को छोड़ मेरा मन और कुछ नहीं चाहता। यह मुझे दोषदुष्ट बतलाता है, परन्तु मेरी समझ में नहीं आता कि मेरा दोष क्या है। तू मुझे बतला दे। माँ, मेरी तो यह इच्छा थी कि भवानी का नाम लेकर मैं भव-सागर से पार हो जाऊँ। मैं स्वप्न में भी नहीं जानता था कि अछोर समुद्र में मुझे