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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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२९ सितम्बर, १८८४परिच्छेद १४६५९

इस तरह डूबना होगा। दिन-रात मैं दुर्गानाम की रट लगाये रहता हूँ, फिर भी मेरी दुःख-राशि दूर नहीं होती है। हर-सुन्दरी, अबकी बार अगर मैं मरा, तो तेरा दुर्गा नाम और कोई न लेगा।”

श्रीरामकृष्ण की समाधि छूटी। उन्होंने दो गाने गाये। एक का भाव यह है –

“श्रीदुर्गा नाम का जप करो, ऐ मेरे मन! ... माँ! दुखी दास पर दया करो, तो तुम्हारा गुण भी मेरी समझ में आये। माँ, तुम सन्ध्या हो, तुम दीपक हो, तुम्हीं यामिनी हो। कभी तो तुम पुरुष होती हो और कभी स्त्री। माँ, रामरूप में तो तुम धनुर्धारण करती हो और कृष्ण रूप में तुम वंशी हाथ में लेती हो। माँ, मुक्त-कुन्तला होकर तुमने शिव को मुग्ध कर लिया था। तुम्हीं दस महाविद्याएँ हो और तुम्हीं दस अवतार। अबकी बार किसी तरह, माँ, मुझे पार करो। माँ, जवापुष्पों और बिल्वदलों से यशोदा ने तुम्हारी पूजा की थी। तुमने कृष्ण को उनकी गोद में डालकर उनकी मनोकामना पूरी की। माँ, जहाँ-तहाँ पड़ा रहा करता हूँ; कभी तो जंगल में ही पड़ा रहता हूँ, परन्तु मेरा मन तेरे श्रीचरणों में ही लगा रहता है। माँ, मैं जहाँ-तहाँ दुर्भाग्य के फेर में पड़ा अपने भाग्य पर रोया करता हूँ। खैर, मुझे इसका भी दुःख नहीं, प्रार्थना है कि अन्त समय में जिह्वा तेरे नाम का उच्चारण करे। अगर तू मुझे किसी दूसरी जगह चले जाने के लिए कहे, तो माँ, इतना तो बतला, मैं किसके पास जाऊँ? माँ, दूसरी जगह यह सुधा-मधुर तेरा नाम मुझे कहाँ मिल सकता है? तू चाहे कितना ही ‘छोड़ छोड़’ क्यों न करे, परन्तु मैं तुझे न छोड़ूँगा। मैं नुपुर बनकर तेरे श्रीचरणों में बजता रहूँगा। माँ, जब तू शिव के निकट बैठेगी तब तेरे चरणों में मैं ‘जय शिव जय शिव’ कहकर बजता रहूँगा।”

(३)

समाधि और नृत्य

हाजरा उत्तर-पूर्ववाले बरामदे में हरिनाम् की माला हाथ में लिए हुए जप कर रहे हैं। श्रीरामकृष्ण सामने आकर बैठे और हाजरा की माला लेकर जप करने लगे। साथ में मास्टर और भवनाथ हैं। दिन के दस बजे का समय होगा।

श्रीरामकृष्ण – (हाजरा से) – देखो, मुझसे जप नहीं होता – नहीं, नहीं, होता है! बायें हाथ से होता है, परन्तु उधर (नाम-जप) फिर नहीं होता।

इतना कहकर श्रीरामकृष्ण नाम-जप की चेष्टा करने लगे, परन्तु जप का आरम्भ करते ही समाधि लग गयी।

श्रीरामकृष्ण इसी समाधि-अवस्था में बड़ी देर से बैठे हुए हैं। हाथ में माला अब भी लिए हुए हैं। भक्तगण निर्वाक् होकर देख रहे हैं। हाजरा अपने आसन पर बैठे हुए हैं। वे भी चुपचाप श्रीरामकृष्ण की समाधि-अवस्था देख रहे हैं। बड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण को