श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६० श्रीरामकृष्णवचनामृत २९ सितम्बर, १८८४
होश हुआ। वे कह उठे, मुझे भूख लगी है। साधारण अवस्था को लाने के लिए श्रीरामकृष्ण प्रायः इस तरह कहा करते हैं।
मास्टर खाना लाने के लिए जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण बोल उठे, “नहीं भाई, पहले काली-मन्दिर जाऊँगा।”
पक्के आँगन से होकर श्रीरामकृष्ण काली-मन्दिर जा रहे हैं। जाते हुए द्वादश शिवालयों के शिवजी को प्रणाम कर रहे हैं। बाई ओर राधाकान्तजी का मन्दिर है। राधाकान्तजी को देखकर श्रीरामकृष्ण ने प्रणाम किया। कालीमन्दिर में पहुँचकर माता को प्रणाम किया और आसन पर बैठकर माता के पादपद्मों में उन्होंने फूल चढ़ाये। फिर अपने सिर पर फूल रखा। लौटते हुए भवनाथ से बोले, यह सब ले चल – माता का प्रसाद, नारियल और चरणामृत। श्रीरामकृष्ण कमरे में लौट आये। साथ में भवनाथ हैं और मास्टर।
हाजरा के सामने पहुँचते ही उन्होंने प्रणाम किया। ‘यह आप क्या कर रहे हैं – यह क्या कर रहे हैं’ कहकर हाजरा चिल्ला उठे।
श्रीरामकृष्ण – तुम कह सकते हो कि यह अन्याय है?
हाजरा तर्क करके प्रायः यह बात कहते थे कि ईश्वर सब के भीतर हैं, साधना करके सब लोग ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।
दिन बहुत चढ़ गया है। भोग की आरती का घण्टा बज चुका है। ब्राह्मण, वैष्णव और कंगाल सब अतिथिशाला की ओर जा रहे हैं। सब लोग माता का प्रसाद पायेंगे। अतिथिशाला में काली-मन्दिर के कर्मचारी जहाँ बैठकर प्रसाद पाते हैं, वहीं भक्तों के लिए भी प्रसाद पाने का बन्दोबस्त हो रहा है। श्रीरामकृष्ण ने कहा – “सब लोग वहीं जाकर प्रसाद पाओ – क्यों? (नरेन्द्र से) नहीं, तू यहाँ भोजन कर।
“अच्छा, नरेन्द्र तथा मेरे लिए यहीं प्रसाद की व्यवस्था हो।”
प्रसाद पाने के बाद श्रीरामकृष्ण ने थोड़ी देर विश्राम किया। भक्त-मण्डली बरामदे में बातचीत करने लगी। श्रीरामकृष्ण भी वहीं आकर बैठे। दो बजे का समय होगा। एकाएक भवनाथ दक्षिण-पूर्ववाले बरामदे से ब्रह्मचारी के वेश में आकर उपस्थित हुए। भगवा धारण किये, हाथ में कमण्डलु लिए हुए हँस रहे हैं। श्रीरामकृष्ण और भक्त सब हँस रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – उसके मन का भाव भी यही है, इसीलिए तो यह भेष धारण किया।
नरेन्द्र – वह ब्रह्मचारी बना तो मैं अब वामाचारी बनूँ। (सब हँसते हैं।)
हाजरा – उसमें पञ्चमकार, चक्र, यह सब करना पड़ता है।
श्रीरामकृष्ण वामाचार की बात से चुप हो रहे हैं। इस बात पर उन्होंने कोई मत प्रकट