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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा

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पृष्ठ 684
२९ सितम्बर, १८८४परिच्छेद ९४६६१

नहीं किया। बस हँसकर बात उड़ा दी। एकाएक मतवाले होकर नृत्य करने लगे। गा रहे हैं – “माँ, अब मैं किसी दूसरे लालच में नहीं पड़ सकता, तुम्हारे अरुण चरणों को मैंने देख लिया।”

श्रीरामकृष्ण ने कहा – “अहा! राजनारायण चण्डी-गीत बहुत ही सुन्दर गाता है। वे लोग नाचते हुए गाते हैं, और उस देश* के नकुड़ आचार्य का गाना! अहा! कितना सुन्दर होता है और नृत्य भी वैसा ही मधुर!”

पञ्चवटी में एक साधु आये हुए हैं। बड़े क्रोधी स्वभाव के हैं। जिस तिसको गालियाँ दिया करते हैं – शाप देते हैं। खड़ाऊ पहने हुए वे आकर हाजिर हो गये।

साधु ने पूछा, 'क्या यहाँ आग मिल जायगी?' श्रीरामकृष्ण हाथ जोड़कर साधु को नमस्कार कर रहे हैं। जब तक वे साधु वहाँ पर रहे, तब तक हाथ जोड़े हुए खड़े रहे।

साधु के चले जाने पर भवनाथ हँसते हुए कहने लगे, साधु पर आपकी कितनी भक्ति है!

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – अरे, तमःप्रधान नारायण हैं। जिनका यही स्वभाव है, उन्हें ऐसे ही प्रसन्न करना चाहिए। ये साधु जो हैं!

गोलोकधाम (एक तरह का खेल) खेला जा रहा है। भक्त भी खेलते हैं और हाजरा भी खेलते हैं, श्रीरामकृष्ण आकर खड़े हो गये। मास्टर और किशोरी की गोटियाँ पक गयीं। श्रीरामकृष्ण ने दोनों को नमस्कार किया। कहा – “तुम दोनों भाई धन्य हो! (मास्टर से एकान्त में) अब न खेलना।”

श्रीरामकृष्ण खेल रहे हैं। हाजरा की गोटी एक बार नरक में पड़ी थी। श्रीरामकृष्ण ने कहा – “हाजरा को क्या हो गया! फिर!” अर्थात् हाजरा की गोटी दुबारा नरक में पड़ी। इस पर सब लोग जोर से हँसने लगे।

संसारवाले कोठे में लाटू की गोटी थी। एक बार ही सातों कौड़ियाँ चित्त पड़ीं, इससे एक ही चाल में गोटी लाल हो गयी। लाटू मारे आनन्द के नाचने लगे। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – “लाटू को कितना आनन्द है, जरा देखो। उसकी गोटी अगर लाल न होती तो उसको दुःख होता। (भक्तों से अलग) इसका एक अर्थ है। हाजरा को बड़ा अहंकार है कि इसमें भी मेरी जीत होगी। ईश्वर की इच्छा ऐसी भी होती है कि सच्चे आदमी की हार कहीं नहीं होती। कहीं भी उसका अपमान नहीं होने देते।”

(४)

मातृभाव से साधना

कमरे में छोटे तख्त पर श्रीरामकृष्ण बैठे हुए हैं। नरेन्द्र, भवनाथ, बाबूराम, मास्टर


* उनके जन्मस्थान से मतलब है – कामारपुकुर के आसपास।

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